Tuesday, January 26, 2016

8> कामनाऐं ही दुःखों का कारण+सुख दुःख+डर और चिंताओं से बचना चाहिये+बुद्धि बल श्रेष्ठ+जीवन का सत्य+जिंदगी का सार"

8>आ =Post=8>***मायिक कामनाऐं ही दुःखों का कारण है।***( 1 to 7 )

1-------------------मायिक कामनाऐं ही दुःखों का कारण है।
2-------------------बुरा अच्छा समय - सुख दुःख
3-------------------हर परिस्थितियों में मनुष्य को डर और चिंताओं से बचना चाहिये।
4-------------------बुद्धि बल ही श्रेष्ठ है:
5--------------------हमारे जीवन का सत्य :-
6-------------------"जिंदगी का सार"
7-------------------অমৃতত্ব  লাভের পথ 

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1>मायिक कामनाऐं ही दुःखों का कारण है।

जिस प्रकार खाज को खुजलाने से वर्तमानकाल में सुखानुभूति तो होती है किन्तु पुनः उसका कितना भयंकर स्वरूप हो जाता है ।
उसी प्रकार अभिलाशित पदार्थों के देने से, क्षणभंगुर वासना की पूर्ति से, आनन्द तो मिलता है किन्तु वह आनन्द सीमित होता है। कुछ क्षण के पश्चात् ही दूसरी वासना का विराट् स्वरूप समक्ष मे आ जाता है।
वास्तव में सांसारिक पदार्थों द्वारा इच्छापूर्ति होने पर लोभ उत्पन्न होता है-

‘ज्यों प्रतिलाभ लोभ अधिकाई’
एवं उसकी अपूर्ति होने पर क्रोध होता है। अतएव वासना के उत्पन्न होते ही दुःख स्वयं साकार होकर आ जाता है। उससे कोई भी भौतिकवादी नहीं बच सकता।

संत जन कहते है कि बहुत होने पर भी जो सन्यासी का जीवन बिताता है वह मनुष्य श्रेष्ठ है l संतोषी पुरुष सच्चा धनवान है l
भोजन ,सेवा, पाणिग्रहण और मरण इन चार कामों में किसी दूसरे की बदली नहीं चलती lये चार तो स्वयं को ही करने होते हैं l
जिसको सुख भोगने की इच्छा नहीं रहती वह कभी दुखी नहीं होता l जगत काल के वश में है पर काल तो प्रभु के आधीन है l प्रभु का आश्रय लेने वाला ही भयमुक्त होता है l
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2>बुरा अच्छा समय - सुख दुःख

समय सूर्य की किरण जैसे दमकता व् चलता रहता है सब ठीक चलता है हर वस्तु सुख देती है हर चीज़ सही दिशा में है. फिर लगता है सूर्य की नन्ही सी किरण भी कहीं दृष्टिगोचर नहीं होती, लगता है काले बादलो में घनघोर अँधेरा अपनी छाया से जैसे सारे प्रकाश को खा जाता है. अशुभ, अति क्रूर, दुखदायी व् आघातक समय जब आता है लगता है सब समाप्त हो जाएगा।

क्या समय कभी ख़राब या अच्छा होता है?

समय तो सूर्य की तरह सदैव चमकता, चलायमान है हम जो चाहे करें, प्रतिक्रिया करें अथवा उपेक्षित कर कुछ न करें सूर्य देव एक ज्वाला बने अपनी सत्ता में रहते हैं और जीवनदायनी पृथ्वी जैसे ग्रह को ऊर्जा देते रहते हैं. काल भी इसी तरह चलता रहता है.

समय है क्या? समय काल रूप में एक आयाम है, जो दिखे न दिखे चलता रहता है कभी नहीं रुकता। समय रेखीय नहीं अर्थात एक रेखा में नहीं चक्र में घूमता है. हमारे आकाशिक ब्रह्माण्ड में मनुष्य व् देवों के लिए समय चक्र घूमता है जैसे हर ग्रह अपने कक्ष में घूमता है. युगों पूर्व जब भारत धरती के गोलाकर अटूट भूखंड का केंद्र भाग था तभी से उसके ऋषिओं को खगोल व् काल चक्रों का ज्ञान था.

समय के चक्रो को हम ३६० अंशो में बांटते हैं उनका अध्ययन करने के लिए. हर ग्रह का अपना समय चक्र है जब हम दो भिन्न ग्रहो के समय चक्रों का अध्ययन करतें हैं तो उसे नक्षत्र-विद्या भी कहते है पर उसके अंतर सूक्ष्म प्रकाशमान ऊर्जा के प्रभावों व् पृथ्वी पर तत्वों व् जीवों पर उनके पड़ने वाले प्रभावों के अध्ययन को हम ज्योतिष भी कहते हैं. ज्योतिष शास्त्र इन्ही काल चक्रों का नियमबद्ध अध्ययन हैं. ३६० अंशो को हम ३० अंशो के १२ भागों में इसलिए बांटते हैं ताकि इनको अच्छी तरह समझा जाए, ज्ञान आत्मसार करने समझने के लिए अध्ययन को अध्यायों में बाँटना पड़ता है, जैसे पूरी रोटी आदमी के मुँह में नहीं डाल सकते उसके टुकड़े करने पड़ते हैं. पृथ्वी के अतिरिक्त अन्य दृश्य मान व् अदृश्य ग्रह हमारे आकाशगंगा ब्रह्मांड में स्थित हैं ज्योतिष विज्ञान पृथ्वी को या सूर्य को केंद्र मानकर किसी भी जन्मी सत्ता या घटना की तिथि अनुसार काल चक्रो, ग्रहो व् उपग्रहों के प्रभाव अनुसार, उसका विश्लेषण करता है.

समय ख़राब या अच्छा नहीं होता पर हर जन्मे जीव व् सत्ता पर समय चक्रो का प्रभाव बहुत सूक्षम रूप से पड़ता है. यह कोई जादू या चमत्कार नहीं है न ही कोई ज्योतिष किसी जीव या सत्ता पर केंद्रित ऊर्जा के प्रभाव से बचा सकता है, हाँ हम जान कर कोई निवारण ढूंढ सकते हैं.

समय बुरा नहीं होता, जीव के जीवन काल के कुछ हिस्से इस अवतरित जन्म में बुरे या भले होते हैं.

आप ने देखा होगा संभवतः अनुभव भी किया होगा जब हमारा अच्छा समय होता है हम नशे जैसी कृत्रम आनंद अवस्था में होते हैं. जब दुःख के काले बादल छाते हैं तो हम ईश्वर को स्मरण करते हैं, शास्त्रों के पठन व् मन्त्र उच्चारित करके मांगते हैं के हे प्रभु रक्षा करो मुझे बचा लो, अमुक को बचा लो, वो गिर रहा है उसे संभाल लो इत्यादि।

अदृश्य जगत से संसर्ग व् सम्पर्क

भारत के महा ज्ञानी संतो महात्माओं ने कई बार दोहराया है गाया भी है जिसे संभवतः आपने सुना भी है, की प्रार्थना अदृश्य जगत से संपर्क करने के लिए ऐसा यन्त्र है जिसका प्रभाव है पर - वह तभी होता है जब प्रार्थना अपने सुखमय, आनंदित व् अच्छे समय में करें. चाहे हम धन्यवाद दें, उपासना करें वह कहीं नहीं जायेगी जब हम उसे अपने स्वार्थ हेतु केवल दुःख में करें। इसीलिए शायद ज्ञानी अन्तरध्यानी सत्ताओं को दुःख के समय में भी इतनी पीड़ा नहीं होती जितना जन साधारण को होती है. प्रभु वह परम आत्मा सुहृदय स्थायी सत्ता है जो स्थायी रूप से सदा आनंदित है वहां पहुँच या संसर्ग का साधन केवल वह "समय" है जब हम आनंद और सुख की चरम अवस्था में हों तभी हमारी प्रार्थना कहीं जायेगी. इस अवस्था में सम्पर्क बिना शब्दों के होता है. हमारे भाव प्रभु तक पहुँच सकते हैं और अपनी आत्मा के केंद्र में द्रवित हो मन के ऊपर पड़े विकार भी धो डालेंगे.

दुःख ? सुख में तो सब हमें मित्र समझेंगे पर दुःख में अपने कर्म या कोई भी साथ न दे तो हम अदृश्य जगत की शरण में जाते हैं. दुःख तो समुपस्थित या लगभग तय हैं के आएंगे ही बचना कठिन है चाहे कुछ भी करें इस जन्म में चाहे दुष्कर्म या पाप न भी हों पिछले जन्म के पाप उभरेंगे; वह भी तब जब हम कभी सोच भी नहीं सकते। सुनने में बुरा लगता है. बुरा नहीं सत्य है. सत्य सदैव कडुवा है ग्रहण करो या नहीं।

बुरे समय में प्रभु से प्रार्थना न कर उसे धन्यवाद दें के कृपया इन दुखों के सहने की क्षमता देना, जो भी हो रहा है मेरे ही अज्ञानता पूर्वक किये कार्यो के परिणाम हैं. जब समय पर पढ़े नहीं परीक्षा फल तो दुखद ही है.

बार बार धन्यवाद करें जीवन धारा अभी भी बहे जा रही है बस जल कम हो रहा है. दुःख के समय केवल तब आते हैं जब हम सुख में, मौज में आनंद में तो परमात्मा को भूले रहे और अब स्वार्थवश काम पड़ा तो उसे याद करलें, मंदिरो मस्जिदो में माथा रगड़ें - ऐसा करने से कुछ प्राप्त नहीं होता.


तो अच्छे समय में प्रार्थना कर सम्पर्क स्थापति करें। बुरे समय में धन्यवाद देते रहें। जब भी कभी परमात्मा के आँखों से दर्शन करने हों तो गायों के पास जाकर बैठ जाएँ उनकी सेवा करें; किसी भी जीव जो वेदना में हैं उसे अपनी निष्काम सेवा द्वारा आरोग्य करने की चेष्टा करें, ऐसा होने पर आपका सन्देश अदृश्य जगत तक तत्काल पहुंचेगा.
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3> हर परिस्थितियों में मनुष्य को डर और चिंताओं से बचना चाहिये।

हर परिस्थितियों में मनुष्य को डर और चिंताओं से बचना चाहिये। चिंता से ही डर की प्राप्ति होती है। डर से मन में कमजोरियां आती हैं। चिंता से नींद नहीं आती। नींद की कमी से मानसिक तनाव आता है एवं कई रोग आपके इर्द-गिर्द आकर खड़े हो जाते हैं। मस्तिष्क के तनाव के कारण रोगों का आक्रमण दुश्ननों की तरह शुरू हो जाता है। जिसको जहां मौका मिलता है, वहीं अपना अस्तित्व दिखाना चालू करता है। चिता और चिंता में इतनी ही फर्क है, चिता एक बार मानव शरीर को जलाती है और चिंता चौबीस घंटा आपको जला-जलाकर अस्त-व्यस्त कर देती है। एक परिवार के दो भाईयों पर एक केस दर्ज हुआ। पुलिस दोनों परिवारों के घर पर पूछताछ करने गयी। सहयोग ऐसा कि दोनों ही घर पर नहीं मिले। संध्या के समय घर में आने पर परिवार ने जानकारी दीं। छोटा भाई तुरंत पुलिस स्टेशन पहुंच गया, अधिकारी से मुलाकात की एवं घर पर आने की जानकारियां प्राप्त की। पूछताछ पूरी कराकर घर लौट चैन की नींद सो गया। दूसरी ओर बड़े भाई ने सोचना शुरू किया, मेरे यहां पुलिस क्यों आई, अगर मुझे पकड़ कर ले जाएगी तो मेरी बेइज्जती हो जाएगी, मैं अपने रिश्तेदारों से राय मांगूंगा तो वे क्या सोचेंगे, मैं क्या करुं इस चिंता में घर में रात में सोना बंद कर दिया। फिस जाना बंद कर दिया। सिर्फ खाना खाने आते थे। मौका-बेमौका घर में आते थे, दरवाजे की घंटी सुनते ही बाथरूम में भाग जाते थे। इसी तरह 15 दिन निकल गये। संयोग से छोटे भाई ने बड़े भाई को अपने घर निमंत्रण दिया। सभी परिवार शामिल हुए। दुःखी आदमी की शक्ल दूर से पहचान में आती है। भाई ने अपनी भाभी से पूछा क्या बात आप सब इतने परेशान क्यों नजर आ रहे हो? भाभी ने डरते-डरते सब बातें बताई। सुनते ही भाई के चेहरे पर हंसी आ गयी। भइया को बोला मेरे साथ पुलिस स्टेशन चलिये। मैं, जिस दिन पुलिस आयी थी, उसी दिन जाकर आ गया था। आप भी चलिए और पूछताछ करवा आइये। दोनों भाइयों में क्या फर्क है। एक डरता है, एक डटकर परिस्थितियों का सामना करता है। आप इन दोनों में क्या बनना चाहते हैं। यह आप पर निर्भर करता है।चिंता से बचने का एक ही उपाय है। सीधा और सरल, बगैर पैसे का, ढेला न खर्च हो, अंटी का सब काम हो जाए। सभी डर और चिंताओं को परमपिता पिता परमेश्वर को समर्पित कर दीजिए। आप चिंता मुक्त हो जायेंगे। हर मुश्किलें आसान हो जायेगी। व्यापार अपने तीर्व गति से चलने लगेगा। क्योंकि आपने समर्पण कर दिया। समर्पण की शक्ति एक सैनिक से पूछिए कि समर्पण के बाद वो देश पर मर मिटने को तैयार रहता है। एक भक्त से पूछिये समर्पण क्या होता है, उसका जवाब आपको यही मिलेगा, समर्पण के बाद चिंता मुक्त हो गया, स्वस्थ हो गया, मस्त हो गया। इसका मुख्य कारण क्या है। उसने परमपिता परमात्मा को अपना अभिभावक बना लिया है। बंदर से आप जब डर कर भागते हैं, आपके पीछे-पीछे भगता है। आप तनकर खड़े हो जाते हैं, बंदर भाग जाता है। डर भी बंदर की तरह ही है। विवेक और पुरुषार्थ की शक्तियों के साथ तन कर खड़े हो जाइये। डर और चिंता भाग जायेगी। 🚩

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4>बुद्धि बल ही श्रेष्ठ है:

बुद्धि के बल को ही सबसे श्रेष्ठ क्यों माना गया है?

इस सवाल के जवाब में पहले हमें उन बातों पर विचार करना होगा, जिनके मुताबिक अगर किसी कारणवश बुद्धि भ्रष्ट हो जाए, तो इंसान अपना भला- बुरा नहीं सोच पाता है और इस वजह से उसका पतन हो जाता है। गीता में कहा गया है, 'विषयों का चिंतन करने वाले मनुष्यों की उन्हीं विषयों में आसक्ति हो जाती है। आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघन् पड़ने पर क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से मूढ़ता उत्पन्न होती है, यानी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। बुद्धि भ्रष्ट होने से स्मरण-विलुप्त हो जाता है, अर्थात् ज्ञान शक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि अथवा स्मृति के विनाश होने पर सब कुछ नष्ट हो जाता है।'

महाभारत के उद्योग पर्व में यह सवाल उठाया गया है कि जब सर्वशक्तिमान ईश्वर किसी की रक्षा करना चाहता है या उसे नष्ट करना चाहता है, तो वह क्या करता है? इसके प्रत्युत्तर में कहा गया है कि इसके लिए ईश्वर किसी को विष नहीं देता या कोई तेज धार वाले शस्त्र का प्रयोग नहीं करता। न ही ईश्वर अपने किसी प्रतिनिधि को ऐसा करने के लिए भेजता है। ईश्वर जिसकी रक्षा करना चाहता है, उसे संकट के समय उत्तम बुद्धि देता है। जिसे नष्ट करना होता है, उस मनुष्य की बुद्धि का हरण कर लेता है, यानी बुद्धि को भ्रष्ट कर देता है, ताकि वह व्यक्ति स्वयं ही कुमार्ग पर अग्रसर होकर अपना सर्वस्व नष्ट कर ले। भ्रष्ट बुद्धि वाला व्यक्ति अपना सर्वनाश स्वयं कर लेता है। जब बुद्धि का हरण हो जाता है, तो परिणामस्वरूप उसकी दृष्टि कुकर्मों की ओर झुक जाती है। बुद्धि भ्रष्ट होने के कारण ही कौरवों का विनाश हुआ था।

बुद्धि किस तरह ईश्वर का सर्वश्रेष्ठ वरदान है?

वैदिक विचारधारा कहती है कि बुद्धि ईश्वर का सर्वश्रेष्ठ वरदान है। बुद्धि के द्वारा व्यक्ति अपना, समाज और राष्ट्र का कल्याण कर सकता है। कल्याणकारी कर्मों से व्यक्ति लौकिक संपदा का स्वामी तो बनता ही है, साथ ही, वह ईश्वर के अपार आनन्द का उत्तराधिकारी भी बन जाता है। मेधा प्राप्त व्यक्ति कठिन और सूक्ष्म विषयों को सरलता से समझ पाता है। ऐसे व्यक्ति का ज्ञान निश्चयात्मक होता है। उसके मन में किसी प्रकार का संदेह या दुविधा नहीं रहती। विद्या-अविद्या, धर्म- अधर्म, सत्य-असत्य के मर्म को जानने की क्षमता उसमें रहती है। इसी कारण सभी समझदार व्यक्ति बुद्धि की याचना करते हैं। बुद्धि की तीव्रता व सूक्ष्मता को पुरुषार्थ से बढ़ाया जा सकता है।

आखिर सद्बुद्धि किस प्रकार हासिल हो सकती है?

ईश्वर उपासना सद्बुद्धि की प्राप्ति का सवोर्त्तम साधन है। ईश्वर ज्ञान स्वरूप है, उसके ज्ञान की कोई सीमा नहीं। हमारे पास जो ज्ञान है, उसका मूल स्त्रोत वह सर्वव्यापक ईश्वर ही है। जब हम श्रद्धा से मन को एकाग्र कर प्रतिदिन ईश्वर की सात्विक भाव से उपासना करेंगे, तो हमारे भीतर ज्ञान का प्रकाश बढ़ेगा। ईश्वर के ध्यान से हमारी बुद्धि पवित्र बनेगी और उससे विवेक जागृत होगा। विवेकवान होने पर हम कभी कोई गलत काम नहीं कर सकते। विवेक ही हमें सच और झूठ का अंतर बताता है? उससे यह भी पता चलता है कि धर्म क्या है और अधर्म क्या है? इस बारे में चाणक्य का कहना है कि जिसके पास बुद्धि है, उसके पास बल है। बुद्धिहीन के पास बल कहां?

क्या मंत्रों के उच्चारण भी बुद्धि बढ़ती है?

सभी महान संतों व महात्माओं ने गायत्री मंत्र को पवित्र मेधा (बुद्धि) प्राप्त करने का महत्वपूर्ण साधन बताया है। गायत्री मंत्र एक वैदिक छंद है, जिसमें ईश्वर-आराधना की तीनों अवस्थाएं अर्थात् स्तुति, प्रार्थना और उपासना सम्मिलित हैं। गायत्री मंत्र का नियमित जप, ध्यान और मनन करने से संकट के समय में धैर्य और विवेक के साथ आत्मबल का भी संचार होता है। इसके साथ ही, आधुनिक जीवन की चुनौतियों पर जीत हासिल करने के लिए मेधा-शक्ति को जागृत करता है। गायत्री मंत्र में सुखस्वरूप ईश्वर से हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करने की प्रार्थना की गई है। इस मंत्र के द्वारा हम सृष्टिपालक परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह हमारी बुद्धि और मन को श्रेष्ठ मार्ग पर ले जाए और उत्तम कार्यों में लगाए। नियमित रूप से गायत्री मंत्र के जप से आक्रोश, आत्मग्लानि पर विजय प्राप्त की जा सकती है और बुद्धि को स्थिर रखा जा सकता है।

यह सच है कि मानव की विशेषता उसकी बुद्धि से है। आज जिस स्तर पर भी हम जीवन जी रहे हैं, उसका मुख्य कारण हमारी बुद्धि है। यह जितनी सात्विक होगी, व्यक्ति का जीवन उतना ही पवित्र होता है।

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5>हमारे जीवन का सत्य :-

आदमी सुनता है मन भर, सुनने के बाद प्रवचन देता है टन भर, और खुद ग्रहण नही करता कण भर ॥

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6>"जिंदगी का सार"

एक नदी में हाथी की लाश बही जा रही थी। एक कौए ने लाश देखी, तो प्रसन्न हो उठा, तुरंत उस पर आ बैठा। यथेष्ट मांस खाया। नदी का जल पिया। उस लाश पर इधर-उधर फुदकते हुए कौए ने परम तृप्ति की डकार ली। वह सोचने लगा, अहा! यह तो अत्यंत सुंदर यान है, यहां भोजन और जल की भी कमी नहीं। फिर इसे छोड़कर अन्यत्र क्यों भटकता फिरूं?

कौआ नदी के साथ बहने वाली उस लाश के ऊपर कई दिनों तक रमता रहा। भूख लगने पर वह लाश को नोचकर खा लेता, प्यास लगने पर नदी का पानी पी लेता। अगाध जलराशि, उसका तेज प्रवाह, किनारे पर दूर-दूर तक फैले प्रकृति के मनोहरी दृश्य-इन्हें देख-देखकर वह विभोर होता रहा।


नदी एक दिन आखिर महासागर में मिली। वह मुदित थी कि उसे अपना गंतव्य प्राप्त हुआ। सागर से मिलना ही उसका चरम लक्ष्य था, किंतु उस दिन लक्ष्यहीन कौए की तो बड़ी दुर्गति हो गई। चार दिन की मौज-मस्ती ने उसे ऐसी जगह ला पटका था, जहां उसके लिए न भोजन था, न पेयजल और न ही कोई आश्रय। सब ओर सीमाहीन अनंत खारी जल-राशि तरंगायित हो रही थी।

कौआ थका-हारा और भूखा-प्यासा कुछ दिन तक तो चारों दिशाओं में पंख फटकारता रहा, अपनी छिछली और टेढ़ी-मेढ़ी उड़ानों से झूठा रौब फैलाता रहा, किंतु महासागर का ओर-छोर उसे कहीं नजर नहीं आया। आखिरकार थककर, दुख से कातर होकर वह सागर की उन्हीं गगनचुंबी लहरों में गिर गया। एक विशाल मगरमच्छ उसे निगल गया।

शारीरिक सुख में लिप्त मनुष्यों की भी गति उसी कौए की तरह होती है, जो आहार और आश्रय को ही परम गति मानते हैं और अंत में अनन्त संसार रूपी सागर में समा जाते है।

जीत किसके लिए, हार किसके लिए
ज़िंदगीभर ये तकरार किसके लिए....

जो भी आया है वो जायेगा एक दिन
फिर ये इतना अहंकार किसकेलिये

सिमरन करले तू ए बंदे ,
साँसे अभी भी काफी हैं ,

किए जो तुमने गुनाह हैं सारे ..
इस दर पर उनकीं माफी हैं !!!
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7>অমৃতত্ব  লাভের পথ--                  ( সংগ্রহ- নিবোধত -29শ বর্ষ -2 য় সংখ্যা )
  " অমৃতত্ব  লাভের পথ হল নিজের ক্ষুদ্রতা,ল্ঘুতাকে,জয় করে বিরাট,উদার,নিঃস্বার্থ ও মহৎ
হওয়া।
এবার শ্রী রামকৃষ্ণের কৃপা সকলের ওপর , তাঁর আশীর্বাদ :-"তোমাদের চৈতন্য হোক। "
আমরা কবে সব অনুদার চিন্তা ত্যাগ করে ওই বিরাটের অনুসারী হব। তখনই অমৃতের 
সরণি দৃশ্যমান হয়ে উঠবে। জগতের নাথ জাগ্রত হবেন জগতের প্রতিটি মানুষের অন্তরে। 
জগন্নাথ রুপী শ্রী রামকৃষ্ণ এবং শ্রী রামকৃষ্ণ রুপী জগন্নাথকে বার বার নত হয়ে আজ এই 
প্রার্থনাই নিবেদন করি। "রমা -শম্ভূ -সুরপতি-গণেশাচির্ত পদঃ। "
শ্রী জগন্নাথ আমাদের নয়নপথগামী হোন। জগতের সকলের মধ্যে যেন আমরা সেই জগতের 
নাথকেই দর্শণ করি। সত্যযুগ এগিয়ে আসছে। বহু বহু বৎসর যারা অস্পৃশ্য়, অনাথ ,অশিক্ষিত 
হয়ে সকলের ঘৃনাস্পদ হয়ে আছে , সেই সবার চিত্তবাসি জগন্নাথ এবার আমাদের "নয়নপথগামী"
হয়ে পূজা গ্রহণ করুণ।"
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Monday, January 25, 2016

7> दिशा प्रणाम+तप क्या है तपस्वी कौन है1+2+ ध्यान क्या है ++-योग ==( 1 to 8 )



7>आ =Post=7>***-दिशा प्रणाम : दिशा प्रणाम***( 1 to 8 )

1------------ दिशा प्रणाम : दिशा प्रणाम
2--------------तप क्या है और क्यों? तपस्वी कौन है? भाग १
3--------------तप क्या है? वास्तविक तपस्वी कौन है? २
4--------------तप क्या है और क्यों? तपस्वी कौन है? भाग 1 + 2
5--------------तप क्या है? वास्तविक तपस्वी कौन है? २
6-------------- ध्यान क्या है "
7>-------------योग क्या है ?
8>योग के बारे में 5 सूत्र

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1>   दिशा प्रणाम : दिशा प्रणाम
हमारे मन में लगातार कई तरह के विचार आते है जिन पर हमारा बस नहीं चलता। कई बार ये हमें चलाने लगते है। कई बार हम ध्यान नहीं लगा पाते। ऐसी नकारात्मक भावनाओं से छुटकारा पाने के लिए दिशा प्राणायाम जाता है।
इसके लिए सबसे पहले एक जगह पर खड़े हो जाए।पूर्व दिशा की और मुख कर ले। आँखें बंद कर नमस्कार की मुद्रा में ॐ का उच्चारण करें। निचे वज्रासन में बैठ कर सिर ज़मीन पर टिका दे और हाथ आगे की और फैला दे। पूरी भावना के साथ ये सोचे की मोह और बंधन की भावना हमें पूर्व दिशा के देवताओं से मिलती है। ये उन्हें समर्पित है।जब मन में खालीपन की भावना आ जाए ; तो उठ कर खड़े हो जाए।
दक्षिण - दक्षिण दिशा की ओर मुड जाए और आँख बंद कर नमस्कार कर ॐ बोले। फिर वज्रासन में प्रणाम कर हाथ आगे फैलाकर मन में सोचे काम की भावना हमें दक्षिण दिशा के देवताओं से मिलती है। ये सिर्फ सर्जन के लिए ही काम आये।अतिरिक्त काम विकार उन्हें समर्पित।फिर मन में खालीपन लगने पर उठे।
पश्चिम - अब उठ कर यही क्रिया पश्चिम दिशाभिमुख हो कर करें। क्रोध और लोभ की भावनाएं हमें पश्चिम दिशा के देवताओं से मिलती है ; ये उन्हें समर्पित।
उत्तर - अब उत्तराभिमुख हो कर यही प्रक्रिया करें। अहंकार और ईर्ष्या की भावना हमें उत्तर दिशा के देवताओं से मिलती है। ये उन्हें समर्पित।
अब उठ कर से पूर्व दिशा की और मुड खड़े हो जाए। एक एक कर अपने पितरों , माता -पिता , देवताओं और गुरु तत्व को याद कर उनके आशीर्वाद प्राप्त हुए ऐसा महसूस करें।
इसे एक ही बार भी पूरी भावना के साथ करने से आप अपनी नकारात्मक भावनाओं में आश्चर्यजनक रूप से कमी पायेंगे।इसे रोज़ करे।
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2>==तप क्या है और क्यों? तपस्वी कौन है? भाग १


तप करना, तपस्वी, तपोवन, तपोभूमि जैसे शब्द आपने कहीं न कहीं सुने होंगे.


तप अथवा तपस् का मूल अर्थ था प्रकाश अथवा प्रज्वलन जो सूर्य या अग्नि तत्व में अनुभव होता है। धीरे-धीरे उसका एक अर्थ विकसित होता गया, किसी उद्देश्य विशेष की प्राप्ति अथवा आत्मिक और शारीरिक अनुशासन के लिए उठाए जानेवाले दैहिक कष्ट को तप कहा जाने लगा।


कई सच्चे और झूठे लोग आपको कहते मिलेंगे के उन्होंने बहुत तप किया किसी सिद्धि के लिए - चाहे उनका उद्देश्य सकारात्मक हो या नकारात्मक. तपस् का वह स्वरूप, जिसका उद्देश्य दूसरे को हानि पहुँचाना अथवा दूसरे के आक्रमण से अपने को बचाना भी हो सकता है.
मूलत: मोक्ष की प्राप्ति का इच्छुक संन्यासी ही तपश्चर्या में रत हुआ। ब्रह्म ज्ञान व् ब्रह्म की प्राप्ति उसका उद्देश्य हो जाता है। सर्वस्व त्याग उसके लिये आवश्यक माना गया, यह समझा जाने लगा कि संसार में आवागमन के बंधनों से मुक्त होने के लिये वैराग्य ही नहीं नैतिक जीवन भी आवश्यक है। अत: जीवन के सभी सुखों का त्याग ही नहीं, शरीर को अनेक प्रकार से जलाना या तपस् अथवा कष्ट देना भी नियम सा बन गया.


उद्देश्यों की भिन्नता से तपस्या के अनेक प्रकार और रूप माने गए। विद्या ध्यायी ब्रह्मचारी:, धनसंपत्ति तथा ऐहिक सुखों के इच्छुक गृहस्थ, परमात्मा की प्राप्ति, ब्रह्म से लीन और मोक्षलाभ की इच्छा से प्रेरित संन्यासी मनोभिलषित वर अथवा पत्नी चाहने वाले व्यक्ति, ईश्वर में लीन भक्त एवं देवी देवताओं की कृपा चाहने वाले सर्वसाधारण स्त्री पुरुष, स्वधर्म और धर्म का पालन करने वाले साधारण जन आदि अनेक प्रकार के लोग भिन्न भिन्न रूपों में तपस का सिंद्धांत मानते और उसका प्रयोग करते रहें हैं।

तपस् की प्रवृति का केंद्र था शरीर को कष्ट देना। उसके जितने ही बहुविध रूप हुए अथवा कठोरता बढ़ी, तपस का उतना ही चरमोत्कर्ष माना गया। साधारण तपस्वी वो अल्पाहार, जटाजूट धारण, नखवृद्धि, वेदोच्चारण, यज्ञक्रियात्मकता और दयालुता के अभ्यास मात्र तक सीमित रहता था, किंतु उग्र तपस्वी गर्मी की ऋतु में पंचाग्नि - ऊपर से सूर्य और चारों ओर प्रज्जवलित अग्नि के ताप का सहन - , जाड़े में जलनिवास अथवा भीगे कपड़ों को पहन बाहर रहना, तीन समय स्नान, कंदमूल खाना, भिक्षाटन, बस्ती से दूर निवास और शरीर के सभी सुखों को त्याग कर उसे कष्ट देना तपस्या का लक्षण माना जाने लगा। यही नहीं, एक मुद्रा से, यथा--हाथों को उठाए रखना, चलते रहना अथवा इसी प्रकार के अन्य रूपकों का धारण्- कुछ दिनों अथवा जीवन भर बनाए रखना तप की पराकाष्ठा समझी जाने लगी। आज भी ऐसे अनेक तपस्वी और हठयोगी भारतवर्ष के सभी कोनों, विशेषत: तीर्थों, आश्रमों, नदी के किनारों और पर्वतों की कंदराओं में मिलेंगे। सर्वसाधारण वर्ग, व् कभी कभी तो सुबोध किंतु श्रद्धालु समाज भी, ऐसे तपस्वियों का आदर करता रहा है तथा उनमें किसी अतिमानवीय अथवा आध्यात्मिक शक्ति के प्रतिष्ठित होने में विश्वास भी करता रहा है।


संसार का त्याग, संन्यास, साधु जीवन, शरीर को कष्ट देना और इच्छाओं के दमन की अप्राकृतिक और अमनोवैज्ञानिक प्रवृति क्या वास्तव में तप है या नहीं?
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3>==तप क्या है? वास्तविक तपस्वी कौन है? २


तप का अर्थ है तपाना या अग्निपथ से गुजरना। जैसे भट्टी में गलाने के पश्चात ही स्वर्ण में प्रखरता आती है व् शुद्धता के उपरांत कैसे भी अकार दिया जा सकता है, इसी प्रकार अपने जीवन को विशेष आकार व् आयाम देने की सामर्थ्य तप, श्रम से ही प्राप्त होती है. तपस्वी वह है जिसने अपनी मानवीय दुर्बलताओं या कमजोरियों पर विजय पायी हो । अपनी इंद्रियों का निग्रह करना ही तप है। हम अपनी कर्मेंद्रियों-ज्ञानेंद्रियों पर संयम करें, तभी तपस्वी कहलाने के अधिकारी हैं। उत्तम तप है सात्विक जो श्रद्धापूर्वक फल की इच्छा से विरक्त होकर किया जाता है।
हमारे जीवन की सार्थकता श्रम व् तप में ही है. किसी भी कार्य को पूर्ण करने के लिए जो कर्म हम करते हैं, शरीर व् मन की कठिनाइयों की चिंता किये बिना जुटे रहते हैं वही तप है. इसके विपरीत सत्कार, मान और पूजा के लिये दंभपूर्वक किया जानेवाला रजस तप अथवा मूढ़तावश अपने को अनेक कष्ट देकर; दूसरे को कष्ट पहुँचाने के लिये जो भी तप किया जाता है, वह आदर्श नहीं हो सकता। समाचार यह है के वन में १० वर्ष रहना या शरीर को गलाना तप नहीं है यदि आप अपने कार्य को बहुत मन लगाकर श्रद्धा से करते हैं तो वह भी तप ही है.


सात्विक तप : देह की चिंता न करते हुए जो मनुष्य ईश्वर परम आत्मा की प्राप्ति में साधना में लगा है वह सात्विक तप है. उससे भी ऊपर प्रत्येक प्राणी में स्थित ईश्वर तत्व या आत्मिक अंश को पहचान कर जन सेवा में जिसने अपने को आजीवन समर्पित किया वह जीवन वास्तव में सात्विक तप है. यानि दुसरो की किसी भी रूप में सेवा करना ऐसा है जैसे चन्दन को घिसकर संसार में सुगंध फ़ैलाने जैसा है. सात्विक तप मन की प्रसन्नता, सौम्यता, आत्मनिग्रह, अहिंसा और भाव संशुद्धि से सिद्ध होता है।


राजसी तप : धन, कीर्ति, लोकप्रियता, प्रतिष्ठा, राज या अधिकार के लिए जो श्रम व् तप है या लाखो प्रयोग करने वाले उस वैज्ञानिक जो सृष्टि की अज्ञात शक्तिओ की खोज कर जन जीवन को आसान बनाये, या अपने लगातार अभ्यास से किसी कार्य में सिद्धि प्राप्त करे वह राजसी तप है. रजस तप वाणी, सत्य और प्रिय भाषण तथा स्वाध्याय से होता है.


तामसिक तप : द्वेष, ईर्ष्या, स्वार्थ या दुसरो को तकलीफ पहुंचा कर, उनका नाश कर या उन्हें पीड़ा दे कर, भ्रष्टाचार में लिप्त हो, पापो में लगन रह कर या अपनी शूद्र या निम्न लालसाओं, वासनाओं से ग्रसित हो जो कुकर्म करते समय कष्ट पूर्ण जीवन बिताये वह ही तामसिक तप है. चोरी, दुसरो की चीज़ हड़पना, बलपूर्वक किसी को वश करना, काला जादू, बलि देना, किसी भी जीव को दुःख देना या भले व् भोले लोगो को भ्रम व् कुबुद्धि के रास्ते पर ले जाकर उन्हें लूटने की विद्या तमस तप है और इसका परिणाम अत्यंत भयानक होता है.


तप या तपस्या वास्तव में तभी सम्भव है जब हमारा कोई लक्ष्य, उद्देश्य व् धेय्य है जो की सात्विक या रजस हो तो ठीक है पर तामसिक तप घोर अपराध व् पाप है. अगर आप विद्यार्थी है या कोई कार्य रत हैं सोचे के आपका ध्येय क्या है. आप किस दिशा में जाना चाहेंगे.जो भी करें उसके लिए घोर तप करें और साधना रत हो कर आगे बढ़ें, आपका तप आपके लक्ष्य तक ले जायेगा. कुछ भी हो तामसिक कार्य न करना चाहे उसके लिए कुछ सुख त्यागने पड़ें या कुछ दुःख उठाना पड़े।

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4>==तप क्या है और क्यों? तपस्वी कौन है? भाग 1 + 2


तप करना, तपस्वी, तपोवन, तपोभूमि जैसे शब्द आपने कहीं न कहीं सुने होंगे.

तप अथवा तपस् का मूल अर्थ था प्रकाश अथवा प्रज्वलन जो सूर्य या अग्नि तत्व में अनुभव होता है। धीरे-धीरे उसका एक अर्थ विकसित होता गया, किसी उद्देश्य विशेष की प्राप्ति अथवा आत्मिक और शारीरिक अनुशासन के लिए उठाए जानेवाले दैहिक कष्ट को तप कहा जाने लगा।

कई सच्चे और झूठे लोग आपको कहते मिलेंगे के उन्होंने बहुत तप किया किसी सिद्धि के लिए - चाहे उनका उद्देश्य सकारात्मक हो या नकारात्मक. तपस् का वह स्वरूप, जिसका उद्देश्य दूसरे को हानि पहुँचाना अथवा दूसरे के आक्रमण से अपने को बचाना भी हो सकता है.
मूलत: मोक्ष की प्राप्ति का इच्छुक संन्यासी ही तपश्चर्या में रत हुआ। ब्रह्म ज्ञान व् ब्रह्म की प्राप्ति उसका उद्देश्य हो जाता है। सर्वस्व त्याग उसके लिये आवश्यक माना गया, यह समझा जाने लगा कि संसार में आवागमन के बंधनों से मुक्त होने के लिये वैराग्य ही नहीं नैतिक जीवन भी आवश्यक है। अत: जीवन के सभी सुखों का त्याग ही नहीं, शरीर को अनेक प्रकार से जलाना या तपस् अथवा कष्ट देना भी नियम सा बन गया.

उद्देश्यों की भिन्नता से तपस्या के अनेक प्रकार और रूप माने गए। विद्या ध्यायी ब्रह्मचारी:, धनसंपत्ति तथा ऐहिक सुखों के इच्छुक गृहस्थ, परमात्मा की प्राप्ति, ब्रह्म से लीन और मोक्षलाभ की इच्छा से प्रेरित संन्यासी मनोभिलषित वर अथवा पत्नी चाहने वाले व्यक्ति, ईश्वर में लीन भक्त एवं देवी देवताओं की कृपा चाहने वाले सर्वसाधारण स्त्री पुरुष, स्वधर्म और धर्म का पालन करने वाले साधारण जन आदि अनेक प्रकार के लोग भिन्न भिन्न रूपों में तपस का सिंद्धांत मानते और उसका प्रयोग करते रहें हैं।
तपस् की प्रवृति का केंद्र था शरीर को कष्ट देना। उसके जितने ही बहुविध रूप हुए अथवा कठोरता बढ़ी, तपस का उतना ही चरमोत्कर्ष माना गया। साधारण तपस्वी वो अल्पाहार, जटाजूट धारण, नखवृद्धि, वेदोच्चारण, यज्ञक्रियात्मकता और दयालुता के अभ्यास मात्र तक सीमित रहता था, किंतु उग्र तपस्वी गर्मी की ऋतु में पंचाग्नि - ऊपर से सूर्य और चारों ओर प्रज्जवलित अग्नि के ताप का सहन - , जाड़े में जलनिवास अथवा भीगे कपड़ों को पहन बाहर रहना, तीन समय स्नान, कंदमूल खाना, भिक्षाटन, बस्ती से दूर निवास और शरीर के सभी सुखों को त्याग कर उसे कष्ट देना तपस्या का लक्षण माना जाने लगा। यही नहीं, एक मुद्रा से, यथा--हाथों को उठाए रखना, चलते रहना अथवा इसी प्रकार के अन्य रूपकों का धारण्- कुछ दिनों अथवा जीवन भर बनाए रखना तप की पराकाष्ठा समझी जाने लगी। आज भी ऐसे अनेक तपस्वी और हठयोगी भारतवर्ष के सभी कोनों, विशेषत: तीर्थों, आश्रमों, नदी के किनारों और पर्वतों की कंदराओं में मिलेंगे। सर्वसाधारण वर्ग, व् कभी कभी तो सुबोध किंतु श्रद्धालु समाज भी, ऐसे तपस्वियों का आदर करता रहा है तथा उनमें किसी अतिमानवीय अथवा आध्यात्मिक शक्ति के प्रतिष्ठित होने में विश्वास भी करता रहा है।

संसार का त्याग, संन्यास, साधु जीवन, शरीर को कष्ट देना और इच्छाओं के दमन की अप्राकृतिक और अमनोवैज्ञानिक प्रवृति क्या वास्तव में तप है या नहीं?
शेष भाग २ में पढ़े ...> वास्विक तप क्या है व् तपस्वी कौन है?
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5>==तप क्या है? वास्तविक तपस्वी कौन है? २

तप का अर्थ है तपाना या अग्निपथ से गुजरना। जैसे भट्टी में गलाने के पश्चात ही स्वर्ण में प्रखरता आती है व् शुद्धता के उपरांत कैसे भी अकार दिया जा सकता है, इसी प्रकार अपने जीवन को विशेष आकार व् आयाम देने की सामर्थ्य तप, श्रम से ही प्राप्त होती है. तपस्वी वह है जिसने अपनी मानवीय दुर्बलताओं या कमजोरियों पर विजय पायी हो । अपनी इंद्रियों का निग्रह करना ही तप है। हम अपनी कर्मेंद्रियों-ज्ञानेंद्रियों पर संयम करें, तभी तपस्वी कहलाने के अधिकारी हैं। उत्तम तप है सात्विक जो श्रद्धापूर्वक फल की इच्छा से विरक्त होकर किया जाता है।
हमारे जीवन की सार्थकता श्रम व् तप में ही है. किसी भी कार्य को पूर्ण करने के लिए जो कर्म हम करते हैं, शरीर व् मन की कठिनाइयों की चिंता किये बिना जुटे रहते हैं वही तप है. इसके विपरीत सत्कार, मान और पूजा के लिये दंभपूर्वक किया जानेवाला रजस तप अथवा मूढ़तावश अपने को अनेक कष्ट देकर; दूसरे को कष्ट पहुँचाने के लिये जो भी तप किया जाता है, वह आदर्श नहीं हो सकता। समाचार यह है के वन में १० वर्ष रहना या शरीर को गलाना तप नहीं है यदि आप अपने कार्य को बहुत मन लगाकर श्रद्धा से करते हैं तो वह भी तप ही है.

सात्विक तप : देह की चिंता न करते हुए जो मनुष्य ईश्वर परम आत्मा की प्राप्ति में साधना में लगा है वह सात्विक तप है. उससे भी ऊपर प्रत्येक प्राणी में स्थित ईश्वर तत्व या आत्मिक अंश को पहचान कर जन सेवा में जिसने अपने को आजीवन समर्पित किया वह जीवन वास्तव में सात्विक तप है. यानि दुसरो की किसी भी रूप में सेवा करना ऐसा है जैसे चन्दन को घिसकर संसार में सुगंध फ़ैलाने जैसा है. सात्विक तप मन की प्रसन्नता, सौम्यता, आत्मनिग्रह, अहिंसा और भाव संशुद्धि से सिद्ध होता है।

राजसी तप : धन, कीर्ति, लोकप्रियता, प्रतिष्ठा, राज या अधिकार के लिए जो श्रम व् तप है या लाखो प्रयोग करने वाले उस वैज्ञानिक जो सृष्टि की अज्ञात शक्तिओ की खोज कर जन जीवन को आसान बनाये, या अपने लगातार अभ्यास से किसी कार्य में सिद्धि प्राप्त करे वह राजसी तप है. रजस तप वाणी, सत्य और प्रिय भाषण तथा स्वाध्याय से होता है.

तामसिक तप : द्वेष, ईर्ष्या, स्वार्थ या दुसरो को तकलीफ पहुंचा कर, उनका नाश कर या उन्हें पीड़ा दे कर, भ्रष्टाचार में लिप्त हो, पापो में लगन रह कर या अपनी शूद्र या निम्न लालसाओं, वासनाओं से ग्रसित हो जो कुकर्म करते समय कष्ट पूर्ण जीवन बिताये वह ही तामसिक तप है. चोरी, दुसरो की चीज़ हड़पना, बलपूर्वक किसी को वश करना, काला जादू, बलि देना, किसी भी जीव को दुःख देना या भले व् भोले लोगो को भ्रम व् कुबुद्धि के रास्ते पर ले जाकर उन्हें लूटने की विद्या तमस तप है और इसका परिणाम अत्यंत भयानक होता है.

तप या तपस्या वास्तव में तभी सम्भव है जब हमारा कोई लक्ष्य, उद्देश्य व् धेय्य है जो की सात्विक या रजस हो तो ठीक है पर तामसिक तप घोर अपराध व् पाप है. अगर आप विद्यार्थी है या कोई कार्य रत हैं सोचे के आपका ध्येय क्या है. आप किस दिशा में जाना चाहेंगे.जो भी करें उसके लिए घोर तप करें और साधना रत हो कर आगे बढ़ें, आपका तप आपके लक्ष्य तक ले जायेगा. कुछ भी हो तामसिक कार्य न करना चाहे उसके लिए कुछ सुख त्यागने पड़ें या कुछ दुःख उठाना पड़े।
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6>" ध्यान क्या है "
ध्यान का अर्थ है : समर्पण |
ध्यान का अर्थ है :अपने को पूरी तरह छोड़ देना परमात्मा के हाथों में |
ध्यान कोई क्रिया नहीं है, जो आपको करनी है |
ध्यान का अर्थ है : कुछ भी नहीं करना है और छोड़ देना है उसके हाथों में , जो कि सचमुच ही हमें 
   सम्हाले हुए है |
ध्यान के लिए पहली बात तो स्मरण रखना : समर्पण , सरेंडर , टोटल सरेंडर |
जिसने अपने को थोडा भी पकड़ा वह ध्यान में नहीं जा सकेगा ; क्योंकि अपने को पकड़ना यानी 
   रुक जाना अपने तक और छोड़ देना यानी पहुंच जाना उस तक , जहां छोड़ कर हम पहुंच ही 
    जाते हैं |
ध्यान में जाने के लिए तीन सीढियां है :
पहला सीढ़ी है : बहने का अनुभव :-
बहने का मतलब है , नदी में तैरना नहीं बहना , नदी के साथ एक हो जाना है| नदी जहां ले जाए 
वहीं हमारी मंजिल है | तब फिर नदी से कोई दुश्मनी नहीं रह जाती है |
समर्पण का पहला अर्थ है : इस जीवन के साथ हमारी कोई दुश्मनी न रह जाए | इस जीवन के साथ हम बह सकें , तैरें न |

दूसरी सीढ़ी : मरने का , मृत्यु का , मिट जाने का |
जैसे कोई बीज मिटता है तो फिर अंकुर हो जाता है | जैसे कोई कली मिटतीं है तो फूल हो जाती है | 
जब कुछ मिटता है, तभी कुछ हो पाता है | जब हम आदमी की तरह मिटेंगे , तभी हम परमात्मा की 
तरह हो पाएंगे | जन्म की पहली कड़ी मृत्यु है | और जो मरना नहीं सीख पाता , मिटना नहीं सीख पाता , 
वह कभी भी उस विराट तक नहीं पहुंच पाता , जहां तक पहुंचने में सब कुछ छुट जाना जरूरी है|

तीसरी सीढ़ी है : तथाता
तथाता का अर्थ है : चीजें जैसी हैं वैसी हैं | हमे उनसे कोई विरोध नहीं | पक्षी आवाज कर रहें , 
कर रहे हैं | धूप गरम है , है | हवाएं चलती हैं और ठंड मालूम पडती है , मालूम पडती है | 
जिंदगी जैसी है वैसी हमें स्वीकार है | न हम उसमें कोई बदल करना चाहते हैं , न कोई हेर - फेर 
करना चाहते हैं | हमारा कोई विरोध नहीं , हमारी कोई अस्वीकृति नहीं |
तथाता का अर्थ है : परिपूर्ण राजी हो जाना , टोटल एक्सेप्टेबिलिटी |
परमात्मा को जानना है अगर , तो जीवन को पूरी तरह स्वीकार करके ही जान सकेंगे |
तथता , सब स्वीकार |
इन तीनों सीढ़ियों को पार कर ध्यान में प्रवेश होता है |
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7>योग क्या है ?
जय गुरू देवा🏻
प्राण नाथाय नमो नमः🏻


गीता में योग की परिभाषा योगःकर्मसु कौशलम् की गयी है । 

दूसरी परिभाषा समत्वं योग उच्यते है । 
कर्म की कुशलता और समता को इन परिभाषाओं में योग बताया गया है । 
पातंजलि योग दर्शन में योगश्चिय वृत्ति निरोधः 
== चित्त की वृत्तियों के निरोध को योग कहा गया है । 
इन परिभाषाओं पर विचार करने से योग कोई ऐसी रहस्यमय या अतिवादी वस्तु नही रह जाती
कि जिसका उपयोग सवर्साधारण द्वारा न हो सके । 

दो वस्तुओं के मिलने को योग कहते हैं ।
पृथकता वियोग है और सम्मिलन योग है ।
आत्मा का सम्बन्ध परमात्मा से जोड़ना योग होता है ।
जीवत्म परमात्म संयोगो योगःकहकर भगवान याज्ञवल्क्य ने जिस योग की विवेचना की वह
केवल कल्पना नहीं, अपितु हमारे दैनिक जीवन की एक अनुभूत साधना है और एक ऐसा उपाय है
जिसके द्वारा हम अपने साधारण मानसिक क्लेशों एवं जीवन की अन्यान्य कठिनाइयों का
बहुत सुविधापूर्वक निराकरण कर सकते हैं । 

हमारे अन्दर मृग के कस्तूरी के समान रहने वाली जीवात्मा एक ओर मन की चंचल चित्तवृत्तियों
द्वारा उसे ओर खींची जाती है और दूसरी ओर परमात्मा उसे अपनी ओर बुलाता है । 

इन्हीं दोनों रज्जुओं से बँध कर निरन्तर काल के झूले में झूलने वाली जीवात्मा चिर काल तक कर्म
कलापों में रत रहती है । यह जानते हुए भी कि जीवात्मा दोनों को एक साथ नहीं पा सकती
और एक को खोकर ही दूसरे को पा सकना सम्भव है वह दोनों की ही खींचतान की द्विविधा में
पड़ी रहती है । 

इसी द्विविधा द्वारा उत्पन्न संघर्षो को संकलन समाज और समाजों का सम्पादन विश्व कहलाता है ।
उर्पयुक्त विवेचना का एक दूसरा स्वरूप भी है और वह यह है कि जीवात्मा और परमात्मा के बीच
मन बाधक के रूप में आकर उपस्थित होता है । 

कुरुक्षेत्र में पार्थ ने मन की इस सत्ता से भयभीत होकर ही प्रार्थना की थी चंचलं हि मनः कृष्ण
प्रमाथि बलवदृढ़म । मन मनुष्य को वासना की ओर खींचकर क्रमशःउसे परमात्मा से दूर करता
जाता है । उसे सीमित करना पवन को बन्धन में लाने के समान ही दुष्कर है । 

आत्मा और परमात्मा के निकट आये बिना आनन्द का अनुभव नहीं होता । 
ज्यों-ज्यों जीवात्मा मन से सन्निकटता प्राप्त करती जाती है वह क्लेश एवं संघर्षों से लिपटती जाती । 
आत्मा का एकाकार ही परमानन्द की स्थिति है । 
सन्त कबीर ने इस एकाकार को ही आध्यात्मिक विवाह का रूप दिया है और गाया है ।
जिस डर से सब जग डरे, मेरे मन आनन्द ।
कब भारिहों कब पाइहों पूरन परमानन्द ॥
मन को वश में करने की मुक्ति ही योग है ।
महर्षि पातंजलि ने कहा भी है-योगश्चित्त वृत्ति निरोधः । 

चित्तवृत्ति के निरोध से ही योग की उत्पत्ति की उत्पत्ति होती है और इसी को प्राप्ति ही योग का लक्ष है । 
गीता में भगवान कृष्ण ने योग की महत्ता बतलाते हुए कहा है कि यद्यपि मन चंचल है फिर भी
योगाभ्यास तथा उसके द्वारा उत्पन्न वैराग्य द्वारा उसे वश में किया जा सकता है ।
व्यावहारिक रूप से योग का तात्पर्य होता है जोड़ना या बाँधना । 

जिस प्रकार घोड़े को एक स्थान पर बाँधकर उसकी चपलता को नष्ट कर दिया जाता है उसी प्रकार 
योग द्वारा मन को सीमित किया जा सकता है । विस्तार पाकर मन आत्मा को अच्छादित न करले 
इसलिए योग की सहायता आवश्यक भी हो जाती हे ।
भक्तियोग और राजयोग से ऊपर उठाकर त्रिकालयोग के दर्शन होते हैं और यही सर्वश्रेष्ठ
योग है ।
इन्हीं तीनों योगों का व्यावहारिक साधारणीकरण कर्मयोग है और आज के संघर्षमय
युग में कर्मयोग ही सबसे पुण्य साधना है ।
संसार और उसकी यथार्थता ही कर्मयोगी का कार्य क्षेत्र है । फल के प्रति उदासिन रहकर कर्म
के प्रति जागरूक होकर ही मनुष्य क्रमशः मन पर विजय पाता है और परमात्मा से अपना सम्बन्ध
सुदृढ़ करता है । कर्मयोग की प्रेरणा किसी कर्मयोगी के जीवन को आदर्श मानकर ही
प्राप्त होती है । 

अपने कर्तव्य के प्रति तल्लीनता तथा विषय जन्य भावनाओं के प्रति निराशक्ति ही कर्मयोग की पहली 
सीढ़ी है ।
कर्मयोगी के जीवन में निराशा अथवा असफलता के लिए कोई स्थान नहीं क्योंकि एक तो वह इनकी 

सत्ता ही स्वीकार नहीं करता और दूसरे उसकी दृष्टि कर्म से उठकर परिणाम तक पहुँच ही नहीं पाती । 
यहाँ तक की सच्चा कर्मयोगी परमात्मा की प्राप्ति के प्रति भी बीत राग हो जाता है । उस स्थिति पर
तस्माद्योगी भवाजुर्न के अनुसार कर्मयोगी वह पद प्राप्त कर लेता है जहाँ मैं तुमसे हूँ एक, एक हैं जैसे
रश्मि प्रकाश के रूप में आत्मा और परमात्मा में
कोई अन्तर नहीं रह जाता ।
।।मन ही मनुष्य के बंधन और मुक्ति का कारण है।।
!!अलख निरंजन!!

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8>योग के बारे में 5 सूत्र


योग केवल आसनों के अभ्यास तक ही सीमित नहीं है। योग जीवन के पूर्ण रूपांतरण से जुड़ा है। पढ़ें कुछ सूत्र योग के वास्तविक अर्थ के बारे में…

सच्ची खुशहाली को अनुभव करने का सिर्फ एक ही तरीका है – अपने भीतर की ओर मुड़ना। योग का यही अर्थ है – ऊपर नहीं, बाहर नहीं, बल्कि अंदर। बाहर निकलने की एकमात्र राह अंदर की ओर है।
योग का संबंध जीवन में सशक्‍त व सबल होकर जीने से है, यह सिर्फ सब्जियां खाने, खुद को तोड़ने-मरोड़ने, या अपनी आंखें बंद करना भर नहीं है।
योग का अर्थ है – जीवन की चक्रीय प्रक्रिया को तोड़कर इसे एक सीधी रेखा बनाना।
आपके मस्तिष्क की गतिविधियां, आपके शरीर की केमेस्ट्री, यहां तक कि आपके वंशानुगत गुण भी योगाभ्यास से बदले जा सकते हैं।
योग इस बारे में है कि हम अपनी पूंजी को शरीर, दिमाग, और भावनाओं से हटाकर अपनी अन्तरात्मा (जीव या प्राणों) में लगाएं – कल्पना से हटाकर वास्तविकता में लगाएं।

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Friday, January 22, 2016

6>घृणि सूर्याय नम+साधना-पथ+तुलसी के दोहो+तुलसी के पौधों

6>आ =Post=6>****ॐ घृणि सूर्याय नमः*=तुलसी ***( 1 to 4 )

1----------------ॐ घृणि सूर्याय नमः*
2-----------------साधना-पथ 
3-----------------तुलसी के दोहो से जुडी महाभारत की अनसुनी कहानिया=+mtl
4-----------------तुलसी के पौधों के बारे में चली आ रही परम्पराओ के ये है वैज्ञानिक कारण!=+mtl
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*ॐ घृणि सूर्याय नमः*

1>=ॐ घृणि सूर्याय नमः
भगवान् सूर्य देव के आशीर्वाद से ही यश की प्राप्ति होती हैं
आज आपको सूर्य से सम्बंधित हस्त रेखा विषय पर कुछ लिख रहे हैं


अनामिका अंगुली के मूल में सूर्य का स्थान होता है। सूर्य का उभार जितना अधिक होगा, प्रभाव भी उतना ही अधिक प्राप्त होता है। सूर्य पर्वत का उभार अच्छा हो तथा स्पष्ट और सरल सूर्य रेखा हो तो व्यक्ति श्रष्ेठ पशासक, पुलिसकर्मी, सफल उद्योग पति हातो है। पर्वत अधिक उभार वाला हो तथा रेखा कटी या टूटी हुई हो तो व्यक्ति घमंडी, अभिमानी, स्वार्थी, क्रूर, कंजूस तथा अविवेकी होता है। यदि हथेली में सूर्य पर्वत शनि की ओर झुका या संयुक्त होता है तो व्यक्ति न्यायाधीश, पंच या सफल अधिवक्ता होता है। दूषित पर्वत की स्थिति में अपराधी, कुखयात अपराधी या बदनाम व्यक्तित्व वाला होता है। सूर्य पर्वत तथा बुध पर्वत के संयुक्त उभार की स्थिति में योग्यता, चतुराई तथा निर्णय शक्ति अधिक होती है। श्रेष्ठवक्ता सफल व्यापारी या उच्च स्थानों का प्रबंधक होता है। ऐसे व्यक्तियों की धन पा्रप्ति की महत्वाकाक्षां असीमित होती है। दूषित उभार या अव्यवस्थित रेखाएं धनाभाव की स्थिति बनाती है तथा व्यक्ति जीवन के उत्तरार्ध में अवसाद से पीड़ित हो सकता है। हथेली में सूर्य पर्वत के साथ यदि बृहस्पति का पर्व उन्नत है तो व्यक्ति विद्वान, ज्ञानवान, मेधावी और धार्मिक विचारों वाला होता है और यदि सूर्य तथा शुक्र पर्वत उभार वाले है तो विपरीत लिंग के प्रति शीघ्र व स्थायी प्रभाव डालने वाला, धनवान, परोपकारी, सफल प्रशासक, सौंदर्य और विलासिताप्रिय होता है तथा दूषित पर्वत से कामी, लाभेी, लम्पट तथा घमडंी आरै दश्ुचरित्र वाला हो जाता है। सूर्य पर्वत पर जाली हो तो गर्व करने वाला किंतु कुटिल स्वभाव वाला होता है तथा किसी पर भी विश्वास न करने वाला होता है। तारा का चिन्ह हो तो धनहानि कारक किंतु प्रसिद्धि, अप्रत्याशित रूप से प्राप्त होती है। गुणा का चिन्ह हो तो सट्टा या शयेर में धन का नाश हो सकता है। सूर्य पर्वत पर त्रिभुज हो तो उच्च पद की प्राप्ति, प्रतिष्ठा तथा प्रशासनिक लाभ होते हैं। सूर्य पर्वत पर बिंदु या वृत्त हो तो निश्चित रूप से सूर्योदय के पहले या बाद का जन्म समय तथा आंखों में विशेष परेशानी होती है। सूर्य पर्वत पर चौकड़ी हो तो सर्वत्र लाभ तथा सफलता की प्राप्ति होती है। त्रिशूलाकार चिन्ह यश, आनंद, विलासिता व सफलता प्रदान करता है।
वैष्णव जन तेने कहिए जे पीर पराई जाने रे पर दु:खे उपकार करे तोए मन अभिमान ना आने
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2>साधना-पथ


संसार में अरबों मनुष्य हैं । उनमें किन्हीं इने-गिने मनुष्यों में साधना करने की पवित्र भावना जगती है और वे साधना के पथ पर चल पड़ते हैं । साधना के पथ पर वे चल पाते हैं, जिनके पूर्व जन्म के साधना विषयक संस्कार होते हैं अथवा होते हैं अथवा वर्तमान के परिवेश (माहौल )का गहरा प्रभाव रहता है, अरबों संख्या वाले समुदाय में साधना करने वालों की संख्या अत्यल्प है । अत्यल्प संख्या वाले साधक महानुभाव भी साधना के क्षेत्र में साधना करते-करते साधना को या तो सर्वथा छोड़ बैठते हैं, या साधना के क्षेत्र में रहते हुए ही जैसे-तैसे समय व्यतित कर रहे होते हैं । कोई विरले ही साधना के महत्त्व को, उपयोगिता को, लाभों को और न करने से हानियों को भली-प्रकार जानकर-समझकर साधना को यथोचित स्तर पर करते हुए साधना की गहराइयों को आत्मसात करते हुए साधना की उच्च स्थिति को प्राप्त होते हैं ।

जो साधक साधना को छोड बैठते हैं या साधना के पथ पर चलते हुए भी जैसे-तैसे समय व्यतित करते हैं । उनका इस प्रकार साधना को छोड देना या साधना पथ पर व्यर्थ समय व्यतीत करना, किन कारणों से होता हैं ? इस पर दृष्टि डालने से एक महत्वपूर्ण कारण सामने आता है और वह कारण है -ज्ञान (जानकारी )। ज्ञान एक ऐसा महत्वपूर्ण कारण है, जिस पर सम्पूर्ण मानव जीवन आश्रित है । मनुष्य का प्रत्येक कार्य ज्ञान पर आश्रित है । साधना रूपी कार्य, महत्वपूर्ण कार्य है। महत्वपूर्ण कार्य बिना ज्ञान के कैसे सम्भव हो पायेगा ? मानव का स्वभाव है कि सुख को प्राप्त करना और दुःख को दूर करना । सुख भी सामान्य नहीं, अनेकों विश्षणों से युक्त सुख चाहिए और सभी प्रकार के दुःखों से छुटकारा पाना ही मानव का ध्येय है । सुख पाना हो या दुःख दूर करना हो, बिना कार्य के नहीं हो सकता । कैसे-कैसे कर्म करने से कैसे-कैसे सुख प्राप्त होते है और कैसे-कैसे दुःख दूर होते हैं, यह सब ज्ञान पर आश्रित है । ऐसे महत्वपूर्ण ज्ञान को अपनाये बिना साधना का पथ प्रशस्त नहीं हो पायेगा ।


जो भी साधक साधना को छोड बैठते हैं या साधना के पथ पर चलते हुए समय व्यर्थ करते हैं । उनके जीवन में ज्ञान का अल्प होना एक महत्वपूर्ण कारण है । साधक साधना में रूचि रखते हैं, श्रद्धा रखते हैं, उसके लिए तप करते हैं, और नाना प्रकार के उपायों को भी अपनाते है । परन्तु उनकी दृष्टि ज्ञान पर प्रायः कम रहती हैं या न के बराबर रहती है । शास्त्र पड़ना, उनके मत में व्यर्थ समय बिताना है । शास्त्र पढना व शास्त्र चर्चा करना उनके लिए कोसों दूर है । वे ऐसा मानते हैं कि साधना के लिए शास्त्र पड़ने की आवश्यकता नहीं है । इसलिए वे शास्त्र नहीं पढ़ते हुए केवल साधना करना चाहते हैं और शास्त्र पढ़ने वालों से अलग एकांत में रहते हैं । वस्तुतः वे ज्ञान से दूर रहते हुए साधना से ही कोसों दूर होते जा रहे है । जितना अधिक ज्ञान बढ़ता है उतनी अधिक साधना उत्तम बनती जाती है । यह बात ज्ञान की गहराई को जानने पर ही ज्ञात हो सकती है ।

साधक गण इस बात को अच्छी प्रकार जान लें कि साधना का आधार अष्टांग-योग है । अर्थात जितना अधिक योग को अपनाया जाये, उतनी अधिक साधना उत्कृष्ट बनती है । योग स्पष्ट रूप से विधान करता है कि 'स्वाध्याय 'करना चाहिए। महर्षि वेदव्यास ने 'स्वाध्याय 'की परिभाषा इस प्रकार की है -

स्वाध्यायो माक्षशास्त्राणामध्ययनं प्रणवजपो वा ।

अर्थात मोक्ष को प्राप्त कराने वाले शास्त्रों का अध्ययन करना और प्रणव =ओ३म् का जप करना स्वाध्याय कहलाता है । महर्षि वेदव्यास के कथन से स्पष्ट होता है कि मोक्ष को प्राप्त करना है, तो मोक्ष को प्राप्त कराने वाले शास्त्र पढ़ने चाहिए । मोक्ष को प्राप्त कराने वाले शास्त्र पढ़ने से साधक को वह ज्ञान प्राप्त होता है, जिससे साधना का मार्ग प्रशस्त होता है । क्योंकि साधना में विशेष गति तब हो सकती है, जब विशेष जानकारी होती है और विशेष जानकारी बिना शास्त्र पढ़े नहीं हो सकती । शास्त्र पढ़ना साधक का परम कर्तव्य है क्योंकि 'स्वाध्याय 'से साधना उत्कृष्ट और पुष्ट होती है ।

स्वाध्याय करने का स्वरूप क्या हो सकता है? अर्थात मोक्ष शास्त्रों का अध्ययन करने का स्वरूप क्या हो सकता है? कोई साधक यह अभिप्राय ले सकता है कि किसी गुरु के सानिध्य में रह कर गुरु मुख से पढ़ना या किसी शास्त्रवेता के मुख से (प्रवचन के रूप में )सुनना या शास्त्र पढ़े हुए साधकों के क्रिया-कलापों को देखकर सीखना या और किसी भी रूप में हो । परन्तु शास्त्रों में मोक्ष को प्राप्त करने के लिए जो जानकारी दी गई है, उसे जानना साधक के लिए अनिवार्य है । क्योंकि मोक्ष को प्राप्त करना रूपी कर्म =कार्य संसार में सब से उत्कृष्ट कर्म है । जितना उत्कृष्ट कर्म होगा, उसके लिए उतने ही उत्कृष्ट ज्ञान की आवश्यकता होती है । चाहे साधक स्वयं स्वाध्याय करें या गुरु के माध्यम से करे या जो स्वाध्याय करके साधना को उत्कृष्ट बना रहे हैं, उनको देखकर करे । कैसे भी करे, किन्तु स्वाध्याय तो करना ही होगा । साधक बिना स्वाध्याय के साधना को साधना के रूप में नहीं कर सकता । इसलिए साधक को चाहिए कि शास्त्रों से मुख ना मोड़े और ज्ञान से उदासीन ना रहे । ऐसा न हो कि जिस साधना को करने के लिए साधक बनें, वही साधना साधक को ज्ञान के अभाव में साधना से कोसों दूर ले चले । इसलिए साधक ज्ञान के साथ ही साधना को लेकर चले । बिना ज्ञान के नहीं । अस्तु ।

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3>=तुलसी के दोहो से जुडी महाभारत की अनसुनी कहानिया

तुलसी नर का क्या बड़ा समय बड़ा बलवान, काबा लूटी गोपिया वही अर्जुन वाही बाण" इस दोहे से जुडी कहानी का अनुवाद हम करते है आप के लिए जो एक प्रेरक प्रसंग है.

महाभारत का युद्ध समाप्त हो गया था, मथुरा नगरी पर मुस्लिम काल यमन ने हमला कर दिया था. जरासंध वध के बाद सुरक्षित लग रही मथुरा अब फिर खतरे में थी. वरदान पाये हुए काल यमन को कृष्ण बलराम मार नहीं सकते थे इसलिए वो बार बार बड़ी सेना लेके आक्रमण करता था. एक बार कृष्ण युद्ध में घायल हो गए तब अर्जुन ने उनसे मिलाने का फैसला किया. जब अर्जुन रस्ते में थे तो उन्हें नारद मुनि मिले और उन्होंने कहा की, जा रहे हो अर्जुन पर कृष्ण के घावों को छूना मत नहो तो तुम्हारी शक्ति क्षीण हो जाएगी.

अर्जुन दुविधा में कृष्ण के पास पहुंचा, कृष्ण ने अर्जुन को अपने सिरहाने बैठने बोला पर अर्जुन हिचकिचा रहा था. भगवान ने अर्जुन का संशय समझ लिया और सीधे अर्जुन से कहा की कोई बात नहीं अर्जुन तुम में घाव हाथ से मत चुना पर तुम्हानी कमान से तो इसे छू कर देख ही सकते हो. अर्जुन को बात समझ में आ गई और उसने कृष्णा के घाव देखने के लिए अपनी कमान का इस्तेमाल किया और जायजा लिया. अर्जुन ने गुस्से में युद्ध में उतरने की इच्छा जाहिर की तो कृष्ण ने मना कर दिया, और बताया की कैसे वर प्राप्त कालयमन उसके लिए खतरा हो सकता है.

कृष्ण ने अर्जुन से कहा की में घायल हूँ और मुझसे मिलने के लिए गोपिया आ रही है, तुम इतना करना की यमनो से उनकी रक्षा करना. अर्जुन ने घमंड में हाँ बोला और दहाड़ा उसे अपने बल पर घमंड हो चूका था. जब अगले दिन गोपिया कृष्ण से मिलने आई तो यमन लुटेरो ने उन्हें लुटने के लिए घेर लिया. अर्जुन तैनात था पर उसके लाख चाहने पर भी वो उनका कुछ ना बिगाड़ सका.

कमान घावों पर लगाने से वो मन्त्र भूल गया और निशक्त हो गया, लुटेरो ने गोपियों को लूट लिया. अर्जुन शर्मिंदा था, कृष्णा से नजर मिलाने की उसकी हिम्मत नहीं हुई. उसे भी समझ में आ गया की महाभारत के युद्ध में ताकत मेरी नहीं समय की थी. समय ही व्यक्ति को सर्वश्रेष्ठ और कमजोर बनता है. तुलसीदास अंतर्यामी थे इस कारण उन्हें ये कथा मालूम थी जिसपे उन्होंने ये दोहा लिखा जो बहुत सम्मानित हुआ
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4==तुलसी के पौधों के बारे में चली आ रही परम्पराओ के ये है वैज्ञानिक कारण!

तुलसी के पौधे के बारे में ढेरो परम्पराए (मैिथस) चली आ रही है जिन्हे हम सही मान कर आज भी जारी रखे हुए है, जैसे की तुलसी को दांतो से मत चबाओ, रविवार के दिन तुलसी से पूछ के तोड़ो या द्वादशी के दिन तुलसी मत तोड़ो फ्ला फ्ला.. लेकिन क्या असल में इसके कोई मायने है?

आज बात करेंगे इन्ही परम्पराओ के वैज्ञानिक और परुानिक मान्यताओ पे, जो की साबित करती है की क्या सही है और क्यों है? तुलसी को छूने भर और पास से निकलने तक ई मनाही की भी बात होती है वोभी करेंगे, लेकिन सबसे पहले जान ले की तुलसी कौन है और क्यों है?

जालंधर असुर को मरने के लिए सती वृंदा की पूजा तोड़नी जरुरी थी जिसके लिए विष्णु जी जालंधर का रूप धार वृंदा के महल में पहुंचे. जैसे ह वृंदा उठी और उन्हें अपना पति समझ प्रणाम किया उसका सतीत्व भंग हुआ और जालंधर का शिव ने वध किया, लेकिन तब सती वृंदा ने विष्णु जी को पत्थर का कर दिया.

लक्ष्मी जी की विनती के बाद वृंदा ने अपना श्राप वापिस लिया लेकिन तब से विष्णु जी वृंदा के पति के रूप में पत्थर स्वरुप पूजे जाते है, वृंदा सती हुई तो उसकी राख की जगह तुलसी का पौधा उगा जो की आज भी उसी के रूप में और विष्णु पत्नी के रूप में पूजा जाता है, लोग दोनों के विवाह को मान्यता देते है.

अब बात करें परम्पराओ की तो तुलसी के पते में पारा बहुत ज्यादा मात्र में होता है जिसके दांतो से खाने से आपके दांत जल्दी कमजोर होके, काले भी होके टूट जाने का खतरा पैदा हो जाता है. इसलिए इसे निगला जाता है न की चबाया, वंही इसे इतवार को पूछ के तोड़ने और द्वादशी को न तोड़ने के पीछे भी पौराणिक तथ्य है.
तुलसी (वृंदा) के बारे में मान्यता है की वो द्वादशी के दिन उपवास रखती थी, इस लिए उस दिन वो भूखे पेट रहती है ऐसे में उसे परेशान न किया जाये ये सोच है जो की पौराणिक है. वंही इतवार के दिन पूछ के तोड़ने के पीछे शायद इसे बचाये जाने की प्रासंगिकता रही होगी.

महिलाओ के तुलसी न तोड़ने या पास से न गुजरने के पीछे वैज्ञानिक तथ्य है, महिलाओ में मासिकी होने के कारण उनके शरीर में ज्यादा ताप होता है. इसके चलते तुलसी का पौधा सुख कर मुरझा सकता है, इसी कारन महिलाये उस दौरान विशेष कर तुलसी के आसपास भी नही दिखती है.
तुसली एक आयुर्वेदिक औषधि भी है जो की मधुमेह, सरदर्द, अपचय, किडनी पथरी, त्वचा के रोगो, एंटी डैंड्रफ और एंटी कैंसर भी होतीं है. तो आज ही अगर नही है तो घर में लगाये तुलसी का पौधा और गिनते जाइये इसके फायदे...

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5>सर्वश्रेष्ठ भक्त+ त्रिदेवकेपिता+विष्णु के लक्ष्मीपैरदबाते+शुक्राचार्य बने दैत्यगुरु+ विष्णु कोबना दिया पत्थर का बूत=+

5>आ =Post=5>***सर्वश्रेष्ठ भक्त***( 1 to  5 )..

1----------------सर्वश्रेष्ठ भक्त..
2---------------ब्रह्मा, विष्णु और महेश का पिता कौन, जानिए.... त्रिदेव के पिता=+mtl
3---------------भगवान विष्णु के लक्ष्मी जी पैर दबाते हुए का क्या अर्थ है?=+mtl
4---------------भगवान विष्णु ने मारा था शुक्राचार्य की माँ को, बदले की भावना में बने दैत्यगुरु!=+mtl
5---------------सती ने सतीत्व से भगवान विष्णु को भी बना दिया पत्थर का बूत==mtl
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1>सर्वश्रेष्ठ भक्त..अर्जुन को वहम हो गया कि वो ही कृष्ण के सर्वश्रेष्ठ भक्त है,

महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था, ऐसे में अर्जुन को वहम हो गया कि वो ही कृष्ण के सर्वश्रेष्ठ भक्त है,
वो सोचता था कि कन्हैया ने मेरा रथ चलाया, मेरे साथ रहे.. इसलिए मै भगवान का सर्वश्रेष्ठ भक्त हूँ. उस मुर्ख को क्या पता था कि वह केवल भगवान के धर्म की स्थापना का जरिया था, फिर भी भगवान ने उसका घमंड तोड़ने के लिए उसे एक परीक्षा का गवाह बनाने अपने साथ ले गए.l
श्रीकृष्ण और अर्जुन ने जोगियों का वेश बनाया और वन को चले जहाँ एक शेर पकड़कर पालतू बनाते है और पहुँच जाते है भगवान विष्णु के परम-भक्त राजा मोरध्वज के द्वार पर... राजा बहुत ही दानी और आवभगत वाले थे ,वह अपने दर पर आये किसी को भी वो खाली हाथ और बिना भोजन के जाने नहीं देते थे.
दो साधु एक सिंह के साथ दर पर आये है सुन कर राजा नंगे पांव दौड़े द्वार पर गए और भगवान के तेज से नतमस्तक हो आतिथ्य स्वीकार करने के लिए कहा. भगवान कृष्ण ने मोरध्वज से कहा कि हम मेजबानी तब ही स्वीकार करेंगे जब वो(राजा) उनकी शर्त मानें, राजा ने जोश से कहा आप जो भी कहेंगे मैं तैयार हूँ.l
भगवान कृष्ण ने कहा हम तो ब्राह्मण है कुछ भी खिला देना पर ये सिंह नरभक्षी है, तुम अगर अपने इकलौते बेटे को अपने हाथो से मारकर इसे परोसो तो ही हम तुम्हारा आतिथ्य स्वीकार करेंगे. भगवान की शर्त सुन मोरध्वज के होश उड़ गए, फिर भी राजा अपना आतिथ्य-धर्म नहीं तोडना चाहता था उसने भगवान से कहा प्रभु मुझे मंजूर है पर एक बार में अपनी पत्नी से पूछ लूँ.
भगवान से आज्ञा पाकर राजा महल में गया, राजा का मुंह उतरा देख कर पतिव्रता रानी ने राजा से कारण पूछा. राजा ने जब सारा हाल बताया तो रानी के आँखों से अश्रु न निकले. फिर वो अभिमान से राजा से बोली आपकी आन पर ऐसे सैकड़ो पुत्र कुर्बान.. आप साधुओ को आदर पूर्वक अंदर ले आइये.l
अर्जुन से भगवान से पूछा," माधव ये क्या माजरा है...आप ने ये क्या मांग लिया ...???
कृष्ण बोले अर्जुन तुम देखते जाओ और चुप रहो.l
राजा तीनो को अंदर ले आये और भोजन की तैयारी शुरू की, भगवान को छप्पन भोग परोसा गया पर अर्जुन के गले से उत्तर नहीं रहा था.l राजा ने स्वयं जाकर पुत्र को तैयार किया, पुत्र भी 3 साल का था नाम था रतन कँवर वो भी मात पिता का भक्त था उसने भी हँसते हँसते अपने प्राण दे दिए उफ़ ना की .
राजा रानी ने अपने हाथो में आरी ले के पुत्र के दो टुकड़े किये और सिंह को परोसा, भगवान ने भोजन ग्रहण किया पर जब रानी ने पुत्र का आधा शरीर देखा तो वो आंसू रोक न पाई. भगवान इस बात पर गुस्सा गए कि लड़के का एक फाड़ कैसे बच गया, भगवान रुष्ट होक जाने लगे तो राजा रानी रुकने की मिन्नतें करने लगे.
अर्जुन को एहसास हो गया था की भगवान मेरे ही गर्व को तोड़ने के लिए ये सब कर रहे है,
वो स्वयं भगवान के पैरो में गिर कर विनती करने लगा और कहने लगा कि आप ने मेरे झूठे मान को तोड़ दिया है. राजा रानी के बेटे को उनके ही हाथो से मरवा दिया और अब रूठ के जा रहे है.. ये गैर वाजिब है. प्रभु मुझे माफ़ करो और भक्त का कल्याण करो.l
पूरी सभा घटना की गवाह बनी चारो और चुप्पी छाई थी, तब केशव ने अर्जुन का घमंड टुटा जान कर रानी से कहा की वो अपने पुत्र को आवाज दे. रानी ने सोचा पुत्र तो मर चूका है, अब इसका क्या मतलब पर साधुओ की आज्ञा जान उसने पुत्र रतन कंवर को आवाज लगाई.l
कुछ ही क्षणों में चमत्कार हो गया. मृत रतन कंवर जिसका शरीर शेर ने खा लिया था वो हँसते हुए आकर अपनी माँ से लिपट गया.l
भगवान ने मोरध्वज और रानी को अपने विराट स्वरुप के दर्शन दिए, पुरे दरबार में वासुदेव कृष्ण की जय जय कार गूंजने लगी.l
भगवान के दर्शन पाकर अपनी भक्ति सार्थक जान मोरध्वज की ऑंखें भर आई और बिलखने लगे. भगवान ने वरदान मांगने को कहा तो राजा रानी ने कहा भगवान एक ही वर दो कि अपने भक्त की ऐसी कठोर परीक्षा न ले ...जैसी आप ने हमारी ली है. तथास्तु कह के भगवान ने उसको आशीर्वाद दिया और पूरे परिवार को मोक्ष दिया l
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2>ब्रह्मा, विष्णु और महेश का पिता कौन, जानिए....     त्रिदेव के पिता

भगवान ब्रह्मा, विष्‍णु और महेश के संबंध और जनम के सम्बन्ध में हिन्दुओ और हिन्दू धर्म मैं भ्रम की स्थिति है। वे उनको ही सर्वोत्तम और स्वयंभू मानते हैं, लेकिन क्या यह सच है? क्या भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश का कोई पिता नहीं है? वेदों में लिखा है कि जो जन्मा या प्रकट है वह ईश्‍वर नहीं हो सकता। ईश्‍वर अजन्मा, अप्रकट, निराकार है।
हिन्दू ग्रन्थ शिवपुराण के अनुसार ब्रह्म ही सत्य है वही अविकारी परमेश्‍वर है। जिस समय सृष्टि में अंधकार था। न जल, न अग्नि और न वायु था तब वही तत्सदब्रह्म ही था जिसे श्रुति में सत् कहा गया है। सत् अर्थात अविनाशी परमात्मा।
उस अविनाशी परब्रह्म काल ने कुछ काल के बाद द्वितीय की इच्छा प्रकट की। और उसके भीतर एक से अनेक होने का संकल्प उदित हुआ। तब उस निराकार परमात्मा ने अपनी लीला शक्ति से आकार की कल्पना की, जो मूर्ति रहित परम ब्रह्म है। परम ब्रह्म अर्थात एकाक्षर ब्रह्म। परम अक्षर ब्रह्म। और वह परम ब्रह्म भगवान सदाशिव है।
प्राचीन विद्वान और ग्रन्थ उन्हीं को ईश्‍वर कहते हैं। एकांकी रहकर स्वेच्छा से सभी ओर व दिशाओ मैं विहार करने वाले उस सदाशिव ने अपने शरीर से शक्ति की सृष्टि की, जो उनके अपने श्रीअंग से कभी अलग होने वाली नहीं थी। सदाशिव की उस पराशक्ति को प्रधान प्रकृति, गुणवती माया, बुद्धितत्व की जननी तथा विकाररहित बताया गया है।
वह शक्ति अम्बिका (पार्वती नहीं) कही गई है। उसको प्रकृति, सर्वेश्वरी, त्रिदेवजननी (ब्रह्मा, विष्णु और महेश की माता), नित्या मूल कारण भी कहते हैं। सदा शिव द्वारा प्रकट की गई उस शक्ति की 8 भुजाएं हैं। परा शक्ति जगत जननी वह देवी नाना प्रकार की गतियों से संपन्न है और अनेक प्रकार के अस्त्र शक्ति धारण करती है।

एकाकिनी होने पर भी माया शक्ति संयोगवशात अनेक हो जाती है। शक्ति की देवी ने ही लक्ष्मी, सावित्री और पार्वती के रूप में जन्म लिया और ब्रह्मा, विष्णु और महेश से विवाह किया था। तीन रूप होकर भी वह अकेली रह गई थी। उस कालरूप सदाशिव की अर्धांगिनी है दुर्गा।

उस काल रूपी ब्रह्म सदाशिव ने एक समय शक्ति के साथ 'शिवलोक' नामक क्षेत्र का निर्माण किया । उस उत्तम क्षेत्र को 'काशी' कहते हैं। वह आज मोक्ष का स्थान है। यहां शक्ति और शिव अर्थात कालरूपी ब्रह्म सदाशिव और दुर्गा यहां पति और पत्नी के रूप में निवास करते हैं।.

इस स्थान काशी पुरी को प्रलयकाल में भी शिव और शिवा ने अपने सान्निध्य से कभी मुक्त नहीं किया था। इस आनंदरूप वन में रमण करते हुए एक समय शिव को यह इच्‍छा उत्पन्न हुई ‍कि किसी दूसरे पुरुष की सृष्टि करनी चाहिए, जिस पर सृष्टि निर्माण का कार्यभार रखकर हम निर्वाण धारण करें।

ऐसा निश्‍चय करके शक्ति सहित परमेश्वररूपी शिव ने अपने वामांग पर अमृत मल दिया। फिर वहां से एक पुरुष प्रकट हुआ। शिव ने उस पुरुष से संबोधित होकर कहा, 'वत्स! व्यापक होने के कारण तुम्हारा नाम 'विष्णु' विख्यात होगा।'
इस प्रकार विष्णु के माता और पिता कालरूपी सदाशिव और पराशक्ति दुर्गा हैं।

शिवपुराण के अनुसार ब्रह्माजी अपने पुत्र नारदजी से कहते हैं कि विष्णु को उत्पन्न करने के बाद सदाशिव और शक्ति ने पूर्ववत प्रयत्न करके मुझे (ब्रह्माजी) अपने दाहिने अंग से उत्पन्न किया और तुरंत ही मुझे विष्णु के नाभि कमल में डाल दिया। इस प्रकार उस कमल से पुत्र के रूप में मुझ हिरण्य गर्भ (ब्रह्मा) का जन्म हुआ।

मैंने (ब्रह्मा) उस कमल के सिवाय दूसरे किसी को अपने शरीर का जनक या पिता नहीं जाना। मैं कौन हूं, कहां से आया हूं, मेरा क्या कार्य है, मैं किसका पुत्र होकर उत्पन्न हुआ हूं किसने इस समय मेरा निर्माण किया है? इस प्रकार में संशय में पड़ा हूं.

इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र इन देवताओं में गुण हैं और सदाशिव गुणातीत माने गए हैं। एक बार ब्रह्मा विष्‍णु दोनों में सर्वोच्चता को लेकर लड़ाई हो गई, तो बीच में काल रूपी एक स्तंभ आकर खड़ा हो गया। तब दोनों ने पूछा- 'प्रभो, सृष्टि आदि 5 कर्तव्यों के लक्षण क्या हैं? यह हम दोनों को बताइए।'


ज्योतिर्लिंग रूप काल ने कहा- 'पुत्रो, तुम दोनों ने तपस्या करके मुझसे सृष्टि और स्थिति नामक दो कृत्य प्राप्त किए हैं। इसी प्रकार मेरे विभूतिस्वरूप रुद्र और महेश्वर ने दो अन्य उत्तम कृत्य संहार और तिरोभाव (अकृत्य) मुझसे प्राप्त किए हैं, परंतु अनुग्रह (कृपा करना) नामक दूसरा कोई कृत्य पा नहीं सकता। रुद्र और महेश्वर दोनों ही अपने कृत्य को भूले नहीं हैं इसलिए मैंने उनके लिए अपनी समानता प्रदान की है।'

सदाशिव कहते हैं- 'ये (रुद्र और महेश) मेरे जैसे ही वाहन रखते हैं, मेरे जैसा वेश धरते हैं और मेरे जैसे ही इनके पास हथियार हैं। वे रूप, वेश, वाहन, आसन और कृत्य में मेरे ही समान हैं।'

काल रूपी सदाशिव कहते हैं कि मैंने पूर्वकाल में अपने स्वरूपभूत मंत्र का उपदेश किया है, जो ओंकार के रूप में प्रसिद्ध है, क्योंकि सर्व प्रथम मेरे मुख से ओंकार अर्थात 'ॐ' प्रकट हुआ। ओंकार वाचक है, मैं वाच्य हूं और यह मंत्र मेरा स्वरूप ही है और यह मैं ही हूं। प्रति दिन ओंकार का स्मरण करने से मेरा ही सदा स्मरण होता है।

मेरे पश्चिमी मुख से अकार का, उत्तरवर्ती मुख से उकार का, दक्षिणवर्ती मुख से मकार का, पूर्ववर्ती मुख से विन्दु का तथा मध्यवर्ती मुख से नाद का प्राकट्य हुआ। यह 5 अवयवों से युक्त ओंकार का विस्तार हुआ।

अब यहां 7 आत्मा हो गईं- ब्रह्म से सदाशिव, सदाशिव से दुर्गा। ‍‍सदा शिव दुर्गा से विष्णु, ब्रह्मा, रुद्र, महेश्वर। इससे यह सिद्ध हुआ कि ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और महेश के जन्मदाता कालरूपी सदाशिव और दुर्गा हैं। ये बातें अन्य पुराणों में घुमा-फिराकर लिखी गई हैं और इसी कारण भ्रम की उत्पत्ति होती है।

भ्रम को छोड़कर सभी पुराण और वेदों को पढ़ने की चेष्टा करें तो असल में समझ में आएगा। मनगढ़ंत लोक मान्यता के आधार पर अधिकतर हिन्दू सच को नहीं जानते हैं।
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3>==भगवान विष्णु के लक्ष्मी जी पैर दबाते हुए का क्या अर्थ है?

आप ने कभी सोचा नहीं होगा कि भगवान विष्णु के ज्यादातर चित्र में शेषनाग के ऊपर आराम से लेटे और लक्ष्मीमाँ इनके पैर दबा रही है, कभी सोचा है भगवान विष्णु का यह रूप किस ओर का इशारा कर रहा है। इसके पीछे बहुत गहरा और गंभीर संदेश छिपा हुआ है। और इसको अगर हम अपना ले तो हमारा पारिवारिक और सामाजिक जीवन काफी हद तक अच्छा और ख़ुशी से भर जायेगा। आइए समझते हैं कि भगवान विष्णु का चित्र क्या सिखा रहा है?

सभी को पता है कि इस सृष्टि के तीन प्रमुख भगवान कौन हैं, यह तीन ब्रह्मा, विष्णु और शिव है। ब्रह्मा सृष्टि की रचना करते हैं, विष्णु इस रचना का संचालन और शिव संहार करते। विष्णु सृष्टि के संचालक है इसलिए हमारी हर जरुरत को पूरा करते हैं, व धर्म को स्थापित भी करते हैं, और धर्म पर अधर्म ज्यादा होने लगता है तो यह अवतार भी लेते हैं। यह क्षीर नामक सागर में रहते हैं, यह सारा संसार भी एक महासागर की तरह है, जिसमें सुख-दु:ख भरपूर है। और ये शेषनाग की शैय्या पर लेटे हुए हैं, गृहस्थी का जीवनकाल भी ऐसा होता है।

जो अपने घर का मुखिया होता है, उसके ऊपर कई सारी जिम्मेदारियां होती हैं, इसीकारण से शेषनाग के कई फन हैं। और फिर भी भगवान विष्णु का चेहरा मुस्कुराता रहता है, तथा यह सिखाता है कि हम चाहे कितनी ही जिम्मेदारियों से घिरे हुए हों, अपना धर्य कभी भी नहीं खोना चाहिए, मन में शांति बनाई रखनी चाहिए और अपना व्यवहार ऐसा रखो कि परिवार का एक भी सदस्य या व्यक्ति आपसे दूर न रह सके। लक्ष्मी जी भगवान विष्णु के पैरों में है और उनकी सेवा कर रही है।

यहां पर दो संदेश दिए गए हैं पहला है जो व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों का संचालन कुशलता पूर्वक करता है, और परिवार को प्रेम के बंधन में बांधे रखता है लक्ष्मी सदा ही उसके पैरों की सेवा में लगी हुई है। एवं दूसरा संदेश इसप्रकार समझो कि हमारे जीवन के अंदर परिवार और कर्तव्य का सबसे पहला स्थान है और लक्ष्मी का आखिरी स्थान, तब जाकर प्रेम में कभी लालच या मोह नहीं आएगा।

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4==भगवान विष्णु ने मारा था शुक्राचार्य की माँ को, बदले की भावना में बने दैत्यगुरु!

शुक्राचार्य का नाम तो सबने सुना ही होगा, इतना सबको पता है की वो दैत्यों और राक्षसो के गुरु थे लेकिन ये कोई नही जानता होगा की वो कौन थे कान्हा से आये थे. आज उनका पूरा कच्चा चिटठा खोल देते है और आपको बताते है उनके ऋषि से दैत्यगुरु होने की कथा.

नवग्रहों में शुमार शुक्र ही शुक्राचार्य है, शुक्राचार्य ऋषियों में सर्वश्रेष्ठ भृगु ऋषि के पुत्र है भृगुऋषि जिन्हे धरती के सब ऋषियों ने तीनो देवो (ब्रह्मा विष्णु महेश) में कौन सर्वश्रेष्ठ है जांचने की जिम्मेदारी. ऐसे प्रतापित ऋषि का पुत्र होके भी शुक्राचार्य दैत्यों के गुरु कैसे बन गए?


बाद बहुत पुरानी है भृगु ऋषि की दो पत्निया थी पहली दक्ष की कन्या थी और दूसरी थी ख्याति जिनसे उन्हें पुत्र मिला शुक्राचार्य. शुक्रवार को जन्मे थे भृगु इसलिए उनके नाम पे ही शुक्र का नाम शुक्रवार पड़ा, पिता ने उन्हें ब्रह्मऋषि अंगरीशी के पास शिक्षा के लिए भेजा.

अंगरीशी ब्रह्मा के मानस पुत्रो में सर्वश्रेष्ठ थे, शुक्राचार्य के साथ उनके पुत्र बृहस्पति (जो बाद में देवो के गुरु बने) भी पढ़ते थे. शुक्राचार्य बृहस्पति की तुलना में काफी होशियार थे, लेकिन फिर भी बृहपति को पुत्र होने के चलते ज्यादा अच्छी तरह से शिक्षा नही मिली

ईर्ष्यावश वो वंहा से दीक्षा छोड़ के सनक ऋषियों और गौतम ऋषि से शिक्षा लेने लगे. इस दौरान उन्हें प्रेरणा मिली और जब बृहस्पति देवो के गुरु बने तो ईर्ष्या वष वो दैत्यों के गुरु बने. दैत्य देवो से नित हारते थे इसलिए उन्होंने (शुक्राचार्य) शिव को प्रसन्न कर संजीवनी मन्त्र (मरे हुए को जीवित करने का मन्त्र) हेतु तपस्या में बैठ गए.
लेकिन देवो ने मौके का फायदा उठा के दैत्यों का संघार आरम्भ कर दिया, शुक्राचार्य को तपस्या में जान दैत्य उनकी माता ख्याति की शरण में चले गए. ख्याति ने दैत्यों को शरण दी और जो भी देवता दैत्यों को मारने आता वो उसे मूर्छित कर देती या अपनी शक्ति से लकवाग्रस्त.

ऐसे में दैत्य बलशाली हो गए और धरती पर पाप बढ़ने लगा, धरती पे धर्म की स्थापना के लिए भगवान विष्णु ने शुक्राचार्य की माँ और भृगु ऋषि की पत्नी ख्याति का सुदर्शन चक्र से सर काट दैत्यों के संघार में देवो की और समूचे जगत की मदद की. इस्पे शुक्राचार्य को बेहद खेद हुआ और वो शिव की तपस्या में और कड़ाई से लग गए.

आखिर कार उन्होंने संजीवनी मन्त्र पाया और दैत्यों के राज्य को पुनः स्थापित कर अपनी माँ का बदला लिया, तब से शुक्राचार्य का भगवान विष्णु से छत्तीस का आंकड़ा हो गया और वो उनके शत्रु बन गए. भृगु ऋषि ने भगवान विष्णु को इस्पे श्राप दिया की तुम्हे बार बार पृथ्वी में जाके गर्भ में रह कष्ट भोगना पड़ेगा चूँकि उन्होंने एक स्त्री का वध किया.

उससे पहले भगवान प्रकट हो के ही अवतार लेते थे जैसे की वराह, मतस्य, कुर्मा और नरसिंघ लेकिन उसके बाद उन्होंने परशुराम राम कृष्ण बुद्ध रूप में जन्म लिया तो माँ के पेट में कोख में रहने की पीड़ा झेलनी पड़ी थी. बाद में शुक्राचार्य से बृहस्पति के पुत्र ने संजीवन विधा सिख उनका पतन किया. जय श्री हरी
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5==सती ने सतीत्व से भगवान विष्णु को भी बना दिया पत्थर का बूत

तुलसी की पुरे भारत भर में पूजा होती है और उन्हें भगवान के भोग में चढ़ाया जाता है पर वो कौन है और उन्हें ये उपमा क्यों मिली जानिए हमारे साथ. तुलसी भगवान शिव और विष्णु की परम भक्त थी एक बार वो गणेश पर मोहित हो गई और उन्होंने उनसे शादी का प्रस्ताव रखा पर गणेश ने ब्रह्मचर्य का हवाला देकर प्रस्ताव ठुकरा दिया तब उन्होंने गणेश को दो शादिया होने का श्राप दिया और गणेश की ऋद्धि सिद्धि से शादी हुई. गणेश ने भी बदले में श्राप दिया की वो राक्षस कुल में जन्म लेगी और राक्षस की माँ बनेगी.
फलस्वरूप राक्षस कुल में उसका जन्म हुआ था। वृंदा बचपन से ही भगवान विष्णु जी की परम भक्त थी। बड़े ही प्रेम से भगवान की पूजा किया करती थी। जब वह बड़ी हुई तो उनका विवाह राक्षस कुल में दानव राज जलंधर से हो गया,जलंधर समुद्र से उत्पन्न हुआ था। वृंदा सती स्त्री थी सदा अपने पति की सेवा किया करती थी।
एक बार देवो और दानवों में युद्ध हुआ, जलंधर युद्ध पर जाने लगे तो वृंदा ने जीत के लिए अनुष्ठान किया, और जब उनके व्रत के प्रभाव से देवता भी जलंधर को ना जीत सके सारे देवता जब हारने लगे तो भगवान विष्णु जी के पास गए।
सबने भगवान से प्रार्थना की तो भगवान कहने लगे कि-वृंदा मेरी परम भक्त है मैं उसके साथ छल नहीं कर सकता पर देवता बोले - भगवान दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं है अब आप ही हमारी मदद कर सकते हैं। भगवान ने जलंधर का ही रूप रखा और वृंदा के महल में पहुंच गए जैसे ही सती ने अपने पति को देखा, उन्होंने अनुष्ठान रोक दिया और उनके चरण छू लिए। जैसे ही उनका संकल्प टूटा, युद्ध में देवताओं ने जलंधर को मार दिया और उसका सिर काटकर अलग कर दिया। उनका सिर वृंदा के महल में गिरा जब सती ने देखा कि पति का सिर तो कटा पड़ा है तो फिर ये जो मेरे सामने खड़े है ये कौन है?
उन्होंने पूछा - आप कौन हैं जिसका स्पर्श मैंने किया,तब भगवान अपने रूप में आ गए पर वे निरुत्तर थे, वृंदा समझ गई। उन्होंने भगवान को श्राप दे दिया आप (काले सालिग्राम) पत्थर के हो जाओ,भगवान तुंरत पत्थर के हो गए। सभी देवता हाहाकार करने लगे। लक्ष्मी जी रोने लगीं और प्राथना करने लगीं तब वृंदा जी ने भगवान को वापस वैसा ही कर दिया और अपने पति का सिर लेकर वे सती हो गई। उनके बरते शंखचूड़ भी बाद में शिव के हाथो मारे गए.

उनकी राख से एक पौधा निकला तब भगवान विष्णु जी ने कहा- आज से इनका नाम तुलसी है,और मेरा एक रूप इस पत्थर के रूप में रहेगा जिसे शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जाएगा और मैं बिना तुलसी जी के प्रसाद स्वीकार नहीं करुंगा। तब से तुलसी जी की पूजा सभी करने लगे और तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी के साथ कार्तिक मास में किया जाता है। देवउठनी एकादशी के दिन इसे तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है।
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4>भोजपत्र +आत्मा का अंश ब्रह्म+ काम आने वाली 15 अद्भुत बातें

4>आ =Post=4>***भोजपत्र ***( 1 to 3 )

1----------भोजपत्र ==क्यों अधिक प्रभावी होता है भोजपत्र निर्मित यन्त्र धारण करना
2----------प्रत्येक आत्मा का अंश अव्यक्त ब्रह्म है
3----------जिंदगी के हर मोड़ पर काम आने वाली 15 अद्भुत बातें
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 2>भोजपत्र ==क्यों अधिक प्रभावी होता है भोजपत्र निर्मित यन्त्र धारण करना

विभिन्न धर्मो ,समुदायों में यन्त्र रचना और धारण प्राचीन काल से चला आ रहा है ,यन्त्र विभिन्न आकृतियों अथवा अंको के एक विशिष्ट संयोजन होते है ,जिनसे एक विशिष्ट उर्जा विकिरित होती है अथवा जिनमे एक विशिष्ट उर्जा संग्रहीत होती है ,जो धारक को विशिष्ट रूप से प्रभावित करती है ,यंत्रो को देवी देवताओ का निवास भी माना जाता है ,यह आंकिक भी होते है अथवा न समझ में आने वाली आकृतियों के भी ,फिर भी इनके विशिष्ट अर्थ होते है ,यंत्रो की पूजा भी की जाती है और धारण भी किया जाता है ,अथवा अन्य रूप से भी उपयोग किया जाता है ,

यंत्रो का निर्माण वुभिन्न सामग्रियों ,वस्तुओ पर होता है ,कागज़,भोजपत्र ,धातु ,पत्थर ,कपडे आदि पर भी ,,हिन्दू परम्परा के अनुसार भोजपत्र को परम पवित्र माना जाता है ,अन्य माध्यमो की अपेक्षा भोजपत्र पर निर्मित यन्त्र को प्रमुखता दी जाती है क्योकि इसके साथ कई विशिष्टताये जुड़ जाती है ,जो अन्य माध्यमो में कुछ कम पायी जाती है ,

भोजपत्र स्वयं एक सकारात्मक उर्जा आकर्षित करने वाला माध्यम होता है और नकारात्मक ऊर्जा दूर करता है ,इस पर यन्त्र निर्माण में प्रयुक्त होने वाले अष्टगंध अथवा पंचगंध की अपनी अलग विशेषता होती है ,इनमे गोरोचन आदि प्रयुक्त होने वाले पदार्थ नकारात्मक शक्तियों को दूर कर सकारात्मकता को आकर्षित करते है ,यन्त्र निर्माण के समय साधक की विशिष्टता ,उसकी एकाग्रता ,आत्मबल ,उसके हाथो से निकलने वाली तरंगे ,उसकी अपनी सिद्धिया /शक्तिया यन्त्र को अलग बल प्रदान करती है ,निर्माणोंपरांत यन्त्र की प्राण प्रतिष्ठा और उस पर सम्बंधित इष्ट का जप इसे बहुत विशेष बना देता है,यन्त्र निर्माण हेतु निर्दिष्ट और चयनित मुहूर्तो का अपना अलग प्रभाव होता है ,इसे विशिष्ट साधक ही बना और प्राण प्रतिष्ठित कर सकता है ,जिसके पास सम्बंधित विषय की क्षमता हो ,,इस प्रकार बना यन्त्र धारक पर शीघ्र और सकारात्मक प्रभाव डालता है ,यन्त्र से उत्सर्जित होने वाली तरंगे व्यक्ति और आसपास के वातावरण को प्रभावित करती है जिससे परिवर्तन होते है और व्यक्ति लाभान्वित होता है

जो सच्चा विज्ञानी है वह धार्मिक होगा और जो सच्चा धार्मिक है वह विज्ञान को समझने की कोशिश करेगा l विज्ञान और धर्म एक दुसरे के विरोधी हो ही नहीं सकते क्योंकि दोनों सत्य के खोजी हैं l

अंतर यह है विज्ञान चल करके मानता है और धर्म मान करके चलता है l धर्म उस सत्य को स्वीकार करके श्रद्धा और विश्वास करके चलता है l और विज्ञान तथ्यों पर विश्वास करता है l

विज्ञान की यात्रा तोड़ने पर आधारित है l विज्ञान पृथक्करण करता है l धर्म की यात्रा जोड़ने पर आधारित है l धर्म समाहित करता जोड़ता चला जाता है और अंत में यह पाता है सब कुछ ब्रह्म ही ब्रह्म है
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3>प्रत्येक आत्मा का अंश अव्यक्त ब्रह्म है

प्रत्येक आत्मा का अंश अव्यक्त ब्रह्म है। बाह्य एवं अन्तःप्रकृति को वशीभूत कर आत्मा के इस ब्रह्म भाव को व्यक्त करना ही जीवन का चरम लक्ष्य है!

जब हम सत्संग में रह सत्य विचारो को आत्मसात करते हैं तो हम उसी परम परमेश्वर जो सर्वशक्तिमान व् हमारा जीवनदायक है के ही प्रसारण के साधन बनते हैं. हमारा उद्देश्य इसी प्रसारण व् प्रकाश को फैलाना है. हम सब एक पथ के यात्री हैं कुछ आगे हैं कुछ पीछे हैं पर अंततः सब मिल जाते हैं.
अगर हो सके तो इस पृष्ठ पर कुछ और सन्देश हैं जिन्हे आप पढ़े..

श्रीहरि आपकी सदैव रक्षा करें. . जय श्रीहरि।

आत्मिक समीक्षा - आध्यात्मिक यात्रा ?

आध्यात्मिक पथ पर चलने वाले द्वारा आत्मा की समीक्षा व् आध्यात्मिक विकास - आध्यात्मिक ज्ञान से जीवन सफल कैसे करे ?

आत्मिक समीक्षा द्वारा यहां संदर्भ आत्म तत्व की समीक्षा, तुलनात्मक अध्ययन व् अधिक सुक्षम जानकारी है। हमारे प्राचीन ऋषियों द्वारा प्रचलित अवधारणाओं और विचारों से लेकर आधुनिक युग के उपभोक्ता समाज तक जो आत्मा के बारे में जानते हैं , उन सब विषयो की समीक्षा करने का प्रयास कर रहे हैं। मैं इस आत्मा की समीक्षा को एक आध्यात्मिक यात्रा कहता हूँ और इस विनम्र प्रयास में सब सच चाहने वालों का स्वागत ही नहीं आमंत्रण है ताकि वह अपनी जानकारी बढ़ाये और अपने विचार, प्रश्न भी साझा कर सकें. जय श्री हरि
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4>जिंदगी के हर मोड़ पर काम आने वाली 15 अद्भुत बातें


💥1.गुण - न हो तो रूप व्यर्थ है।
💥2. विनम्रता- न हो तो विद्या व्यर्थ है।
💥3. उपयोग न हो तो धन व्यर्थ है।
💥4. साहस - न हो तो हथियार व्यर्थ है।
💥5. भूख- न हो तो भोजन व्यर्थ है।
💥6. होश- न हो तो जोश व्यर्थ है।
💥7. परोपकार- न करने वालों का जीवन व्यर्थ है।
💥8. गुस्सा- अक्ल को खा जाता है।
💥9. अहंकार- मन को खा जाता है।
💥10. चिंता- आयु को खा जाती है।
💥11. रिश्वत- इंसाफ को खा जाती है।
💥12. लालच- ईमान को खा जाता है।
💥13. दान- करने से दरिद्रता का अंत हो जाता है।
💥14. सुन्दरता- बगैर लज्जा के सुन्दरता व्यर्थ है।
💥15. सूरत- आदमी की कीमत उसकी सूरत से नहीं बल्कि सीरत यानी गुणों से होती है...!!!"

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3>=अहंकार एक विकार+আত্নিকসমীক্ষা+शरीरमनआत्माकीशक्तियां+शरीरहीसत्य+दुश्मनकौन-1+ दिनचर्या+सफलता केउपाय -२

3>आ =POST=3>***अहंकार - एक विकार***( 1 to 7 ) 

1-------------- अहंकार - एक विकार मन द्वारा संकल्प 
2---------------আত্নিক সমীক্ষা 
                      a=धन पर आधारित संसार की वास्तविकता? 
                      b=.क्या अंतरात्मा के विरुद्ध धनी बनने से कुछ प्राप्त होगा?
                      c=कैसी कमाई भली कमाई है?
3>---------------शरीर मन व् आत्मा की शक्तियां 
4>---------------यह शरीर ही सत्य है शेष सब व्यर्थ है? क्या यह सत्य है?
5>---------------हमारा सबसे बड़ा दुश्मन कौन है ? अहंकार घमंड ? भाग - १
6>---------------प्रश्न: कैसे - दिनचर्या बनाये, सफल निर्णय लें, दिन को सम्पूर्ण बनायें?
7>---------------धन, रूप, बल, पद व् विद्या का घमंड - परिणाम व् जीवन सफलता के उपाय - भाग २
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1> अहंकार - एक विकार  मन द्वारा संकल्प


आज से हम अहंकार को अपने मन में जगह नहीं देंगें और तीव्र प्रतिक्रिया से भी बचेंगें, दिमाग को ठंडा व वाणी को मधुर व ह्रदय को सरल रखेंगें।

 बुद्धि द्वारा पुरुषार्थ

भाव व स्वभाव अलग हैं, भाव एक क्रिया हैं जो कि स्थिति व परिस्थिति वश बदलते ही रहते हैं, समय प्रति समय हमारे मन के भाव अलग होते हैं, जबकि स्वभाव संस्कारों द्वारा निर्मित होता है

अहंकार है - श्रेष्ठता का भाव कि " मैं ही श्रेष्ठ हूँ " , स्वमान है - कि " मैं श्रेष्ठ हूँ ", करने में कर्ता पन व छोड़ने में त्याग का अहंकार, अहंकार है मन की विकारी अवस्था, हमें सरल निरहंकारी बनना है

जब हम अपने अहं को अपने मनोवेग में शामिल कर लेते हैं तो हमारी प्रतिक्रिया काफी तीव्र और नाकारत्मक हो जाती है जो कि बाद में पश्चाताप का कारण बनती है, हम अहं को नियंत्रण में रखें

अहंकार अंधकार है जो स्वयं की गलतियों और दूसरों की अच्छाई को देखने नहीं देता, अहंकार का खात्मा, आत्मा को सच्चाई दिखाने का रास्ता खोलता है, हम सभी मे साकारात्मकता देखते हैं

 संस्कारों में धारणा

जैसे हम स्वयं को सही समझते हैं, उसी प्रकार दूसरे लोग भी अपने नज़रिए से सही होते हैं, हम उनके व्यवहार को स्वीकार करेंगें।

हम कुछ गलत या अनुचित करते हैं तो हमारा अहं हमारे मनोभावों में शामिल हो उसे भी सही ठहराता है, हम इससे बचेंगें।

हम ध्यान रखेंगें कि हमारी प्रतिक्रिया तीव्र न हो, हम सदा ठन्डे दिमाग से सोच समझ कर मधुर वाणी में प्रतिउत्तर देंगें न कि प्रतिक्रिया करेंगें। ओम् शान्ति, नमस्कार
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2> আত্নিক সমীক্ষা

1..धन पर आधारित संसार की वास्तविकता?
2..क्या अंतरात्मा के विरुद्ध धनी बनने से कुछ प्राप्त होगा?
3..कैसी कमाई भली कमाई है?

यह आज लगभग हर उस व्यक्ति की वेदना है जो अपने आपको झूट बोलकर एक झूठा स्वपन दिखा कर अपने ही मिथ्या जगत को सत्य दिखाने की चेष्टा करता है. अंतरात्मा के विरुद्ध जाना वैसे ही है जैसे हम उच्च लहरो के समुद्र से लड़ने का प्रयास करें, कुछ देर तक हम प्रयास कर सकते हैं पर अंतत हम धराशायी हो जायेंगे. आज जो पाप या पाप न समझ अपना अधिकार समझ कुछ गलत काम कर जल्द धनी बनने का स्वप्न देखने के लिए अपनी आत्मा की आवाज को अनसुना करते हैं उन्हें बाद में कई मुसीबतो का सामना करना पड़ता है जिसमे बुरा समय, बीमारी, तनाव भी हैं और एक हीन भावना का उत्पन्न होना है जो अंत समय तक पीछा नहीं छोड़ती।

धन से ही मनुष्यों में ये पंद्रह अनर्थ उत्पन्न होते हैं चोरी, हिंसा, झूठ, दम्भ, काम, क्रोध, गर्व, मद, भेदबुद्धि, बैर, अविश्वास, स्पर्धा, लम्पटता, जुआ और शराब। आज संसार में बहुत ही कम लोग सुखी कहे जा सकते हैं। भूतकाल में हमारा जीवन केवल रोटी कमाने में बीता। केवल धन और समृद्धि ही जीवन का लक्ष्य नहीं होना चाहिये। लक्ष्य होना चाहिये कभी भी दुखी न रहना। सबसे महान प्रेरणा यह होनी चाहिए कि हमारा जीवन प्रकृति के अधिक से अधिक निकट हो और तर्क तथा बुद्धि से दूर न हो। हमको अपने जीवन में काम करने का आदर्श समझ लेना चाहिये। यह आदर्श पेट का धंधा नहीं, सेवा होनी चाहिये। सर्वकल्याण, समाज-सेवा सामाजिक जीवन तथा शिक्षा ही हमारा कार्यक्षेत्र हो। हमको ऐसे युग की कल्पना करनी चाहिए, जब हमारा जीवन केवल जीविका-उपार्जन न रह जाय। जीवन केवल अर्थ शास्त्र या प्रतिस्पर्द्धा की वस्तु न रह जाय। मनुष्य केवल मनुष्य ही नहीं है, उसकी आत्मा भी है, उसका इहलोक और परलोक भी है।

1..पैसे के बिना क्या जीवन सम्भव् है?

आज से ३०० वर्ष पूर्व तक उत्तर व् दक्षिण अमरीका में दर्जनो मूल निवासी सभ्यताएं बिना किसी पैसे की अर्थव्यवस्था के सकुशल चलती थी. प्राचीन भारत जो सोने की चिड़िया कहा जाता था अर्थ समाजिक व्यवस्था उत्पाद, ज्ञान और विशेषज्ञता से चलती थी और कोई नागरिक भूखा नहीं सोता था. आध्यात्मिक व् धर्म के आधीन समाजिक व्यवस्था अपने आप चलती थी कोई भय, लालच या कमी न थी.

धन की इस दुनिया में, चकाचौंध के उस जमाने में जब कि सभ्यता का एकमात्र लक्ष्य केवल पैसा कमाना है, ऐसी कल्पना करना भी एक बड़ी बात लगती है पर धन में स्थापित पश्चिमी समाज धन की मर्यादा से ऊबकर सतयुगी मर्यादा की ओर मुड़ रहे हैं। उन्हें ऐसा लगने लगा है कि यह सब आडम्बर मिथ्या है। धन ही विपत्ति की जड़ है, इसी से संसार का सब विग्रह प्रारम्भ होता है और वर्गवाद, साम्यवाद या साम्राज्यवाद का उपद्रव खड़ा हो जाता है। न धन की घुड़दौड़ रहे और न यह सब विपत्तियाँ खड़ी हों।

2..धन रहित संसार में समृद्धि संभव है?

संसार की समृद्धि में सबसे बड़ी बाधा धन यानी आदमी द्वारा निर्मित कृत्रम धन है आज संसार में जो भी कुछ पीड़ा है, वह इसी नीच देवता के कारण है। खाद्य-सामग्री का संकट, रोग-व्याधि-सबका कारण यही है। चूँकि सभी सुख की वस्तुएँ इसी से प्राप्त की जा सकती हैं, इसीलिए संसार में इतना कष्ट है। जितना समय उपभोग की सामग्री के उत्पादन में लगता है, उससे कई गुना अधिक समय उन वस्तुओं के विक्रय के दाँव पेंच में लगता है। व्यापार की दुनिया में ऐसे करोड़ों नर-नारी व्यस्त हैं, जो उत्पत्ति के नाम पर कुछ नहीं करते।

यदि अपनाने की स्वार्थी भावना के स्थान पर प्रतिदान की भावना हो जाय तो हरेक वस्तु का आर्थिक महत्व समाप्त हो जाय। लाखों आदमी केवल इसलिए नियुक्त हैं कि बही खाते वालों की तथा उनके कोष की रक्षा करें। यदि यही लोग स्वयं उत्पादन के काम में लग जायं तथा अपनी उत्पत्ति का आर्थिक मूल्य न प्राप्त कर शारीरिक सुख ही प्राप्त कर सकें, तो संसार कितना सुखमय हो जायगा। आज संसार में अटूट सम्पत्ति उच्च अट्टालिकाओं में, बैंक तथा बीमा कम्पनियों के भवनों में, सेना, पुलिस, जेल तथा रक्षकों के दल में लगी हुई है। यदि इतनी सम्पत्ति और उसका बढ़ता हुआ मायाजाल संसार का पेट भरने में खर्च होता तो आज की दुनिया कैसी होती। अस्पतालों में लाखों नर-नारियाँ रुपये की मार से या अभाव से बीमार पड़े हैं तथा लाखों नर-नारियाँ धन के लिए जेल काट रहे हैं। प्रायः हर परिवार में इसका झगड़ा है। मालिक तथा नौकर में इसका झगड़ा है। यदि धन की मर्यादा न होती तो यह संसार कितना मर्यादित हो जाता।

पैसे के कारण संसार में वर्गवाद आदि का संकट आ गया है। आज जितनी उत्पत्ति होती है, उसका पैसों में मूल्य समाप्त कर दीजिए तो संसार का कायापलट हो जायगा, कोई भूखा रहेगा न नंगा। आज हरेक काम पैसे से होता है। माता-पिता तथा संतान के बीच पैसे का सम्बन्ध है। पिता चाहता है कि लड़के कमाएं, लड़की बोझ न बने। आज हरेक व्यक्ति सोचता है कि पैसा एक अनिवार्य वस्तु है इसलिए पैसे कि अंधी दुनिया इसका निरादर नहीं कर सकती। पर कौन नहीं जानता कि जितना पैसा बढ़ता है उतना ही परिश्रम पश्चाताप तथा परेशानी बढ़ती है, धन से आत्मा सुखी नहीं हो सकती।

3..कैसी कमाई भली कमाई है?

हमको अपना मोह तोड़ना होगा, स्वार्थ के स्थान पर परमार्थ, समृद्धि के झूठे सपने के स्थान पर त्याग तथा भाग्य के स्थान पर परम आत्मा की शरण लेनी होगी। जो भी है पैसे के लिए झूट कपट व् भ्र्ष्टता का सहारा लेना इसलिए बुरा है के इस तरह कमाया पैसा बीमारी, दुःख और विनाश का पथ तो पक्का है।

धर्म के रास्ते पर चल कर अपने मन से अपने काम को सर्वश्रेष्ठ तरीके से करने से, मन की शान्ति व् स्वस्थ मन व् शरीर हमें सदाचार व् आत्मिक उत्थान की और ले जाएंगे। केवल धन एकत्र करना उद्देश्य नहीं है जीवन का इसे कभी नहीं भूलें.
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3>शरीर मन व् आत्मा की शक्तियां - रहस्य व् कैसे बलशाली बना जीवन को सार्थक बनाये

जीवन में शरीर ही दीखता है सबसे पहले तो शरीर को बल देने के लिए हर उपाय किया जाता है. काया का स्वस्थ्य, संतुलन व् अच्छा होना आवश्यक है इस जीवन को चलाने के लिए. शरीर का बल उपयुक्त मात्र में होना ही चाहिए और उसके लिए संतुलित आहार व् खान पान व् सोने की अच्छी आदतें होनी जरूरी हैं. शरीर एक वाहन की तरह हैं जो अगर सुचारू नहीं होगा तो जीवन की गति में रुकावट होगी. शरीर भोजन से बनता है तो सात्विक भोजन से सात्विक शरीर बनेगा, तामसिक भोज से शरीर तामसिक बनेगा.शरीर को चलाता कौन हैं? चलाने वाला तो अंतर स्थापित आत्मा है. तो ये वाहन किस प्रकार के ईंधन से चलता है?
आत्मा तो अचेतन हैं तो फिर?
आत्मा का एक चेतन स्वरुप भी है. इस चेतन स्वरुप या सूक्ष्म शरीर को हम मन कहते हैं. मन के दो भाग हैं, एक जाग्रत व् दूसरा अचेतन या सुप्त। जब हम सोते हैं या ध्यान अवस्था में होते हैं तब सुप्त मन 'हमसे' सीधा सम्पर्क करता है. सुप्त मन आत्म तत्व के अधिक समीप होता है.
चित मन सदैव चेतन या जाग्रत अवस्था में होता है तभी हम इस माया रुपी संसार को अपने चेतन स्वरुप चित या कांशसनेस के द्वारा अनुभूत व् अनुभव करते हैं. आत्मा की लम्बी हजारो आजीवनो की जीवन यात्रा में हर जीवन काल में मन नए रूप में निर्मित होता है. मन मस्तिष्क में नहीं होता यद्यपि मस्तिष्क मन के क्षेत्र का धरातल है, यदि मन एक वायुयान है तो मस्तिष्क उसका विमान पत्तन या एयरपोर्ट है याद रहे इसकी नियंत्रण टॉवर में बैठा सुप्त मन रूपी आत्मा ही इसको दूर से देखता रहता है. यह स्वंय शक्तिमान अति सुंदर व् अंतर आयामी आत्मा मन की हर उड़ान को अपने लेखे में पंजीकृत करता है पर उसे नियंत्रित नहीं करता. मन स्वछंद है व् कहीं भी जा सकता है।
इस मन तत्व ईंधन को मनोबल कह सकते हैं. मनोबल वास्तव में शरीर रूपी वाहन को चलाने वाली शक्ति है. ये शक्ति हर जीव में एक सीमित मात्र में होती है, पर यह माता पिता की देखभाल, परिवार, शिक्षा व् स्वयं नियत्रित सयंम से उत्त्पन्न होता है जितना अधिक मनोबल होगा उतना ही इस दृश्य जगत में सफलता मिलेगी. निर्बल व् शक्तिहीन में मनोबल केवल जीवित रहने जितना ही होगा. तो इस मनोबल रूपी ईंधन को उत्पन्न करना सम्भव है? हाँ है.

मन "रूपी सूक्ष्म सरीर" से भी ऊपर एक अति सूक्ष्म शरीर है जो अंतकरण में स्थापित आत्मा तत्व है. आत्मबल मनोबल से अधिक महत्व रखता है. यह शरीर और मन दोनों को अपनी ऊर्जा देता है. आत्मबल को मनुष्य की सम्पूर्ण शक्ति का स्रोत भी कहा जा सकता है. आत्मबल पिछले जीवन कालो की जमा पूंजी व् इस जन्म के सुकर्मो से बनता है. आत्मबल मनोबल की तरह एक मात्रा में होता है लेकिन हम अपने श्रम से इसे दोहरा या तिहरा या कई गुना कर सकते हैं.
आत्मबल जितना अधिक होगा, आपके शरीर के आसपास का आभा मंडल या दिव्या मंडल उतना ही विशाल होगा.
यदि आपकी आत्मशक्ति व् ऊर्जा बहुत हो जाती है तो आप बहुत दूर तक समय व् अंतरिक्ष, में उतने ही विस्तार से जा सकते हैं
गुरु यदि उनकी आत्मशक्ति विकसित है तो वह अपने शिष्य को बहुत दूर से देख सकते हैं. देव पुरुषो का बाह्र्य रूप चाहे आम व्यक्ति जैसा हो उनका प्रभा मंडल व् उसकी परिधि बहुत विशाल होती है.
वह केवल एक स्थानीय दृश्य से लेकर इस पृथ्वी गृह के किसी भी कोने में देख पाते हैं, मुक्त व् दैविक शक्तिओ से परिपूर्ण देव पुरुष व् देवियाँ अपनी आत्मशक्ति से न केवल पृथ्वी बल्कि हमारे तारकपुंज व् आकाशगंगा के ऊपर भी जा सकते हैं व् त्रिकाल समय के तीन आयामो में देख सकते हैं.

शिक्षा, धन अर्जन करने मात्र से मनोबल या आत्मबल नहीं बढ़ता पर यदि हम अपने समय को सही दिशा में लगाकर अपने आप को परिवर्तित कर सकें तो बहुत बड़े परिवर्तन के दर्शन होंगे.
यदि आप अपने शरीर, मन व् आत्मा का बल विस्तार करना चाहें, या उसमें वृद्धि करना चाहें तो जुड़े रहें, संदेशो को बहुत ध्यान पूर्वक पढ़ना, उद्देश्य आपके जीवन को न केवल सफल बनाने में सहायता करना है बल्कि आपको जीवन के रहस्यों से परिचित करवा आपके मनोबल व् आत्मबल को विशाल करना है.
अपने दुःख को कैसे कम करें और सच्चे सुख को कैसे अग्रसर हों , अपने जीवन को कैसे सरल सुगम बनाये?
कुछ समय उपरांत हम सात्विक तप, ध्यान व् ईश्वर प्राप्ति के साधनो पर विचार करेंगे पर उससे पहले हमें अपने अंदर कुछ परिवर्तन करने होंगे और जिसके लिए हमें कुछ बातो को समझना होगा जो कई बार हम जानते हुए भी नहीं समझ पाते. उद्देश्य आपको उस राह की तरफ अग्रसर करना है. इसमें न कोई लालच है न कुछ बेचता हूँ. इसका किसी आदमी निर्मित धर्म से भी कोई सम्बन्ध नहीं.अगर आप अपने जीवन को एक आदर्श दिशा में ले जाने के लिए अपना समय बचाना चाहें तो इस पृष्ठ से जुड़े रहें.आपके कमेंट, टिप्पणी, व् प्रश्न को पढ़ने का प्रयास करूँगा, आपको यथा समय आपके हर प्रश्न का उत्तर भी दूंगा.
आप की भलाई व् आत्मिक उन्नति में कुछ सहायक सिद्ध हूँ यही कामना है। नमस्ते !!!
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4>यह शरीर ही सत्य है शेष सब व्यर्थ है? क्या यह सत्य है?

शरीर केवल आत्मिक अनंत यात्रा का एक वाहन है जिसके बिना हम दृश्य जगत के भेद नहीं पा सकते। शरीर की अपनी महिमा है और महत्व भी और जैसे कोई भी गाडी को सुचारू रूप से चलने के लिए लगातार देखभाल की आवश्यकता होती है वैसे ही शरीर रूपी गाड़ी भी अपने प्राकर्तिक व् सहज रूप में होगी तभी हम गति व् समय समझेंगे। यदि आधा समय गाडी ख़राब है तो यात्रा अधिक दूर तक न होगी. शरीर कभी बीमार या अस्वस्थ न होगा यदि हम अपने मन को जो गाडी को बनाने व् चलाने वाला है को स्वस्थ रखें. एक स्वस्थ मन एक स्वस्थ शरीर बना सकता है.

यदि शरीर सब कुछ होता तो प्राण निकलने के बाद मृत शरीर को देख उसके प्रेम करने वाले इतना न रोते बिलखते। शरीर केवल एक वस्त्र या वाहन है जो नाशवान है पर उसमे ठहरने वाली अत्मिकसत्ता ही वास्तव सत्य व् अविनाशी सत्ता है. केवल जड़बुद्धि मूर्ख ही शरीर को एकमात्र अस्तित्व मानते हैं.

सरीर के नष्ट हो जाने के बाद वही पहचान के साथ जन्म हो ऐसा नही हो सकता। मोक्ष केवल एक विचार है जो शायद जरूरत से ज्यादा विस्तारित हुआ, जिसका अर्थ अधिकतर गलत समझा गया और उसे केवल शरीर से निकलने के बाद की अवस्था जाना गया जो की सही नहीं है. मोक्ष इसी जीवन में सम्भव है पर आसक्तियों व् वासनाओं में फंसे मन व् शरीर को इस जीवन काल में संसार की दलदल से कैसे सहजता व् बिना अशरीर हुए निकला जाए वह एक प्रश्न है जिसका हल है.

मोक्ष या स्वर्ग बेचना धर्मो द्वारा किया गया शायद किसी स्वार्थ के लिए. लेकिन हम इसी जन्म में इसी जीवन में इसी संसार में रहते बहुत कुछ बदल सकते हैं जिनका उद्देश्य इसी जीवन काल को बेहतर व् सुखी बनाना है. बौद्धिक धोखाधड़ी सभी धर्मों के लिए आम बात है पर यहाँ हम किसी धर्म या स्थापित विचारो की बात नहीं कर रहे. अध्यात्म की राह या आत्मज्ञान हर व्यक्ति के लिए नहीं है. क्यूंकि बौद्धिक डिबेट व् बहस का कभी कोई अंत नहीं होता। पर एक सुखी व् सफल जीवन के लिए इसे समझे बिना आगे बढ़ने की सोच भी उचित नहीं कही जा सकती. इसलिए इस राह पर चलने के लिए सबसे पहले अच्छी संगत, सत्य संग या सत्संग अनिवार्य है. अकेला मन भटक जाता है इसलिए भले, सुहृदय व् सद्भावना वाले मित्रो या विचारो की बहुत आवश्यकता है. गुरु तो हमारा मन है बस उसे दिशा चाहिए जो भली सोच, सत्य संग व् सुविचारों से ही सम्भव है.

प्रश्न: शरीर नाशवान है फिर हमको क्यों पता नही चलता मन के अन्दर जो प्रकाश है वो सत्य, बहार का प्रकाश मिथ्या है ध्यान अंदर के जगत के द्वार तक ले जाता है ?

जैसे दीपक तले अँधेरा होता है, वैसे ही बाह्र्य संसार की चमक दमक में खोकर जीव अपने अंदर झाँकने का प्रयत्न भी नहीं करता। थोडा बहुत तोता रटंत पाठ करने या साष्टांग कर या शरीर की सत्ता में ही रहने और उसे सब कुछ मान लेने के कारण जीव का अंतर मन तो दूर जाग्रत मन भी अपने असली स्वरुप को नहीं पहचान पाता, पर आज की व्यवस्था व् माया जाल और ऊपर से भ्रम व् संदेह ने आम आदमी को अपने नाशवान शरीर से ही जोड़ कर रखा है, मन तो एक दूर बैठा पक्षी है जिसकी चह चहाट व् क्रंदन आज के जीव को सुनती भी नहीं.

ऐसे में ध्यान एक द्वार है लेकिन केवल शरीर को पद्मासन में बिठाकर ओम कहने से ध्यान नहीं होता और इसीलिए लोग ध्यान को भी एक टेलीविज़न का कार्यक्रम समझ कर या उसे एक योगासन समझ उसे समझ नहीं पा रहे. ध्यान के द्वार व् गहन रास्ते पर चलने से पहले हमें अपने कुछ भावो, मनोस्थितिओ व् आदतो को दुरुस्त या संतुलित करना होगा और इसीलिए व् अन्य कई अध्ययन के विषयो को समझने के लिए इस साधारण तुच्छ पृष्ठ का गठन किया गया है.

इस सम्बन्ध में आगे बढ़ने के लिए कुछ निकट भविष्य में सन्देश होंगे जिन्हे आप पढ़ने का प्रयास करना अपने जीवन में अंतर परिवर्तन लाने के लिए स्वाध्याय व् आत्म निरिक्षण से अंतर जगत का आभास होगा और कुछ अभ्यास से आपको बाह्र्य जगत भी साफ़ दिखेगा और इसके भेद कोई पहेली नहीं रहेंगे।
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5>हमारा सबसे बड़ा दुश्मन कौन है ? अहंकार घमंड ? भाग - १

शरीर की सत्ता किसकी है? क्या यह शरीर वास्तव में "हमारा" है या ये हमारी धारणा मात्र है? चलो माना की शरीर "हमारा" ही है जब तक इसमें आत्मा का वास है। इसका स्वामित्व भी "हमारा" मान लेते हैं ,

हमारी बुद्धि हमें शरीर को अपना बता कर हमसे अन्याय तो नहीं कर रही ? शरीर का बाह्र्य रूप भी हमारा ही है जिस पर मनुष्य कितना गर्व करता है. पर क्या हम शरीर, इसके रूप सौंदर्य को ही हम मान लें यदि हाँ तो जब कोई काँटा या तीखी धातु चुभती है तो उसका दर्द कौन अनुभव करता है? हम सब यही कहतें है "हमें" या "मुझे"?

आध्यात्मिक प्रगति व् हमारे व्यक्तित्त्व के विकास में सबसे बड़ा अवरोध सबसे पहले हमारा अपने आपको ना जानना है

अहंकार है क्या?

इस नाशवान अस्थायी शरीर को अपना वास्तविक रूप समझना मिथ्या अहंकार कहलाता है और उसके अंतर में जो जीवंत सत्ता "रह" रही है उस जीव या जीव रूप को "अपना" समझना शाश्वत अहंकार है। अहंकार क्या है | स्वयं का अज्ञान और "मैं " के सम्बन्ध में अपूर्ण जानकारी से उत्पन्न अहंकार एक मानसिक शत्रु है जो मन रूपी सहज प्रकृति को भृष्ट कर देता है । अहं अच्छा या बुरा नहीं है उसे न समझ कर अपने को असहज रूप में अधिक समझने को अहंकार कहते हैं जो अति दुखदायी हो सकता है और हमें आत्मिक पथ पर चलने से रोकता है.

अहंकार या घमंड मनुष्य को दूसरे जीवों से अधिक समझने के कारण मन में एक हवा भर देता है और इस वायु के गुब्बारे उसे एक कृत्रिम वैचारिक आकाश में उड़ा कर एक विशेष प्रसन्नता से भरते रहते हैं पर यह स्थिति असहज व् अप्राकर्तिक होती है. तो सहजता और सरलता का अभाव ही अहंकार है! स्मरण रहे कभी न भूलें के हम जो भी करते हैं निष्पादित या तामील करते हैं, कर्ता तो कोई और है, जब हम उस कर्ता की उपस्थिति को बिना शर्त मान लेते हैं और सब कार्य उसी कर्ता की और से या उसके वास्ते करने लगते हैं तो हम इस जीवन में जो भी सत्कार्य करेंगे उसका परिणाम अति उत्तम होगा।

सबसे खतरनाक बुद्धिमत्ता का अहंकार है, क्योंकि यह परिपक्व सुविकसित मन में पाया जाता है। हम अपनी उच्च शिक्षा, योग्यता और विचारशीलता के कारण अपने को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगते है। मन में इस भाव के उत्पन्न होते ही दूसरों को हेय समझने का भाव उठ खड़ा होता है। आपने लोगों को इस प्रकार कहते हुए सुना होगा: ‘इनका स्तर मेरे स्तर से नीचा है।’

कुछ अहंकारी लोग इस प्रकार के भाव को ‘दया’ कह कर पुकारते हैं। इस प्रकार का अहंकार आधुनिक जीवन का अभिशाप बन गया है। ऐसे अहंकारी व्यक्ति को कौन नहीं जानता जो अपने प्रति असीम उत्साह और उन लोगों के प्रति जो उनके विचारों से सहमत नहीं है, दया दिखलाते हैं। अहंकार के कितने ही रूप हमें प्रतिदिन अपनी आँखों से देखने को मिलते हैं. अहंकारी व्यक्ति दूसरों को, समाज व् राष्ट्र को आगे नहीं बढ़ने देते.

अपने आपको दूसरे से अधिक, विशाल, शक्ति-शाली और श्रेष्ठ समझता है तथा उससे यह मनवाना चाहता है; जबकि दूसरा व्यक्ति उसकी इस बात को स्वीकार कर अपने आपको छोटा नहीं मानना चाहता। लड़ाई के प्रत्यक्ष कारण चाहे जो भी रहें पर मूलतः संघर्ष दो व्यक्तियों के अहंकार का टकराव ही होता है। इस अहंकार ने मनुष्य जाति का जितना अहित किया है उतना दूसरे किसी से हित नहीं हुआ है। न भूख से, न बीमारी से, न आपदाओं से, और न रोग से, न दुर्बलता से, किसी भी कारण इतने लोग नहीं मरे हैं। जितने कि आपसी संघर्षों, जातीय युद्धों और दो राष्ट्रों के या अनेक देशों के संग्राम से मरे है। इन संघर्षों, द्वन्द्वों और युद्धों का एक मात्र कारण अपनी श्रेष्ठता का दावा तथा दूसरों द्वारा उस दावे को दी गयी चुनौती हैं

अहंकार से बुद्धि नष्ट हो जाती है। अहंकार से ज्ञान का नाश होता है। अहंकार होने से मनुष्य के सब काम बिगड़ जाते हैं।

अहंकार के कारण न केवल मनुष्य जाति हिंसा तथा विनाश की शिकार हुई है बल्कि उसके कारण मनुष्य का नैतिक पतन भी हुआ है। स्वार्थ, संकीर्णता, अनुदारता, लोभ, घमंड व् भ्रष्टाचार जैसे दुर्गुणों का एकमात्र स्रोत भी अहंकार ही है। लोभ, मोह और अनीति अनाचार को अहंकार का रूप ही कहा जा सकता है। यह दुर्गुण मनुष्य के अन्तःकरण में निवास करने लगता है इसी कारण साम्प्रदायिक तनावों से लेकर दो गुटों, समुदायों, मनुष्य निर्मित धर्मो, संस्थाओं व् राष्ट्रों के युद्ध तक मनुष्य का यह दुर्गुण ही कारण बनता है।

मनुष्य के भीतर की जो प्रवृत्ति अध्यात्म के विकास में बाधक होती है, वह है “अहंकार”। संसार में हमारे जो तरह-तरह के सम्बन्ध है उनके कारण हम अनेक बन्धनों में बँध जाते है। उनके घात-प्रतिघात से हमारे मन में सदैव द्वन्द्व की भावनायें उत्पन्न होती रहती हैं और उन्हीं के परिणाम स्वरूप हमको हर्ष-शोक सुख-दुःख स्तुति-निन्दा हानि-लाभ आदि के विचार उत्पन्न होकर अस्थिर बनाते रहते है।
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6>प्रश्न: कैसे - दिनचर्या बनाये, सफल निर्णय लें, दिन को सम्पूर्ण बनायें?

हम जो भी कर्म करते हे क्या वो "फिक्स" हे ?।अगर हे तो फिर इस सरीर और आत्मा का इस लोक में रोल क्या हे? ध्यान एकाग्रता ?

जो भी हम करते हैं, उनका समय निर्धारित ही नहीं नियत 'stipulated' है - यहाँ एक विराम - एक समानांतर समय है यहाँ, जो हमारे साथ चलता है कहीं किसी दूसरे लोक में, जो हमें बार बार आकर स्मरण कराता है - यह समानंतर समय में चलती सत्ता वास्तव में हमारे अंतकरण में स्थित अविनाशी आत्म तत्व है जो हमें कहता है के रास्ता बदलो - व्यर्थ समय न गवाँयो - सीधे रेखा पर चलो जिसके लिए तुम आये हो - लेकिन हम संसार के शोर.शरीर व् इन्द्रियों के चक्रव्यूह में फंसे अंतर्मन; जो लगातार एक सहायक के रूप में आ आ कर संकेत करता है, स्वपन में दृश्य प्रगट करता है, सांकेतिक भाषा में जगाने का प्रयास करता है - पर हम जड़वत एक उपभोक्ता या यूँ कहिये एक मूर्ख उपभोग लिप्त शरीर के शिकार के रूप में केवल शरीर और इन्द्रियों के यंत्रो के विकर्षण, अन्यमनस्कता, उद्विग्‍नता में ही उलझ कर रह जाते हैं.

आज, कल या अभी कहीं न कहीं हम जाग्रत होते हैं, उस काम को करते हैं जो वास्तव में हमारे इस और आने वाले जीवनो को प्रकाशित और उज्जवल करेगा.

सत्य तो ये है के जो होना है वह हमारे संकल्प व् इच्छा शक्ति रुपी मोटर यन्त्र द्वारा चलाया जाता है पर हम अपने संकल्प को भूलकर अंतर्मन को धोखा देकर - मोह और लालच में इन्द्रियों के जाल में फंसे चले जाते हैं; जीवन के पल पल रेत के कणो जैसे जीवन रुपी सत्ता से गिर गिर कर धीरे धीरे अंतर्ध्वंस कर डालते हैं. यही प्रक्रिया और इस पर हमारी इच्छाशक्ति व् संकल्प का हथोड़ा समय पर न पड़ने के कारण - हमें अपने निर्धारित सत्कर्म करने से रोक डालती है - ये अंतर्ध्वंस दिन पर दिन - सप्ताह पर सप्ताह - वर्ष और फिर पूर्ण जीवन को केवल एक आंशिक fractional जीवन जी हमें एक असफल जीवन की और ले जाता है. तो जीवन की सफलता के लिए पहले जागने और उठने पर ध्यान लगाये, ५ से ८ मिनट, उसके बाद, प्रति दिन अपने सारे कार्यो पर एक दृष्टि डालें फिर मन ही मन देखें के सबसे पहले आवश्यक क्या है, तत्पश्चात उसका विश्लेषण करें - क्या इनमे से कुछ ऐसा है जो केवल शरीर या इन्द्रियों की पिपासा शांत करने के लिए है, हमारे जीवन यापन व् परिवार चलाने का कोई दिनचर्या का कार्य समय है,या वह हमारे मन व् आत्मा की अंतर-संतुष्टि के लिए है.

तो सबसे पहले जो हमारा धर्म कर्तव्य है जीवन यापन व् महत्वपूर्ण दिनचर्या का काम वो करेंगे, उसके बाद मन आत्मा की संतुष्टि के लिए अगर कोई सत्कार्य हो तो उसे चुनेंगे और उसके बाद यदि समय बचा तो शरीर व् इन्द्रियों को सुख देने वाले कार्य करेंगे पर यहाँ आप अपना समय बहुत सोच समझ कर निर्धारित करें.

आवेशपूर्ण आवेग impulse में आकर कोई भी शरीर या इन्द्रियों से सम्बंधित कार्य कभी न करें। आवेश आवेग के स्थान पर विनम्रता से ध्यान लगाएं और देखें के क्या इससे कोई सदुप्योगी लाभ होने वाला है. ये सारी प्रक्रिया कुछ पल में होती है इसलिए जब आप योजना बद्ध समय का वितरण करेंगे तो आपका हर दिन एक सम्पूर्णता का प्रतीक होगा और आपका हर दिन, सप्ताह सार्थक अर्थपूर्ण व् विचारपूर्ण होगा जो आपको सफलता की उंचाईयों तक ले जाएगा - यहाँ सफलता केवल भौतिक सामाजिक प्रगति नहीं आध्यात्मिक व् आत्मिक सुखदाई भी होगी।

प्रश्न : तामसिक विचारो को कैसे रोकें?

तामसिक प्रवृत्ति मानसिक दुर्बलता की उत्पत्ति होती है। इसके प्रभाव से हम सदैव आलसी, सुस्त, अकर्मण्य बने रहते है, हमारा तेज क्षीण हो जाता है, और निराशा की भावना हमारे मानसिक क्षेत्र को ढक लेती है। किसी कार्य के लिये दिल में उत्साह नहीं होता। छोटे-छोटे कामों में भी भय लगता है और यही इच्छा होती है कि हम बिना कुछ उद्योग और परिश्रम के बैठे-बैठे सोते रहें। ऐसे लोगों में किसी उत्तम कार्य के लिये स्फूर्ति नहीं देखी जाती और वे समझते हैं कि हम में ऐसे कार्यों के लिये शक्ति और योग्यता ही नहीं है। यह अवस्था बड़ी भयंकर और पतन मार्ग पर ले जाने वाली है। गीता में “मा ते संगोऽत्सव कर्मणि”, “योगस्थः कुरु कर्माणि” आदि का आशय यही है कि अपना कल्याण चाहने वाले मनुष्य को अपने भीतर कभी अकर्मण्यता की भावना को टिकने नहीं देना चाहिये और योग युक्त होकर कर्म करते रहना चाहिये। प्रत्येक " सत्कार्य " को अपना ईश्वर-प्रेरित कर्तव्य समझ कर करे, उससे क्या लाभ और क्या हानि होगी इसकी चिन्ता सर्वथा त्याग दे।

प्रश्न : ध्यान कैसे लगाएं?

आपके मन की उत्सुकता व् ज्ञान की कामना बहुत ही अच्छा संकेत है और आप उचित व् उच्च दिशा को जा रहें हैं. कृपया कुछ समय दे आपके प्रश्न का विस्तारित उत्तर आपको मिलेगा. सबसे पहले ध्यान की विभिन्न प्रक्रियायों को सीखेंगे और फिर इसका अभ्यास करना। ध्यान का बाहरी वातावरण व् शोर से कोई संबंध नहीं. जब आप सीख जाओगे कोई शोर अशांति, व्याकुलता, उद्वेग, परेशानी न होगी. जीवन में हर पाठ सीखने के लिए एक समय है.
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7>धन, रूप, बल, पद व् विद्या का घमंड - परिणाम व् जीवन सफलता के उपाय - भाग २

अहंकार की तुष्टि किसी चीज को पाने से नहीं बल्कि उस चीज को किसी दूसरे की अपेक्षा अधिक पाने से होती है।
अहंकार गुणों का नहीं वस्तुओं का होता है। संपत्ति का, रूप का, बल का, पद का, विद्या का अहंकार करना यह सिद्ध करता है कि उस व्यक्ति की शिक्षा उन साँसारिक पदार्थों को ही महत्व देने तक सीमित है अथवा उन भौतिक परिस्थितियों को सब कुछ समझने की है जिनके स्थायित्व का कोई ठिकाना नहीं।

अहंकार का उद्देश्य ही यह है कि सामने वालों को यह अनुभव कराया जाय कि वे अहंकारी की तुलना में छोटे हीं हैं। प्रकृति के कुछ ऐसे नियम हैं के घमंडी व्यक्ति का शीर्ष अपने आप नीचा हो जाता है. अहंकार जीवन के कुछ दिन भौतिक सुख देगा पर इसका परिणाम जीवन गति को विराम लगाता है.

धन सम्पदा का नशा

कुछ व्यक्ति पूर्व कर्मो के कारण इस जीवन में बहुत अधिक सम्पत्ति व् धन अर्जित कर लेते हैं उनमे जो आध्यात्मिक प्रवर्ति के हैं वह कभी भी अपने धन संपत्ति की प्रदर्शनी नहीं करते, सादा जीवन, नम्रता व् अपना कुछ समय दुसरो की भलाई में लगाते हैं. कुछ दूसरे बहुत अधिक सम्पद्दा के स्वामी बन जाते हैं पर उनके संस्कार लगभग न के बराबर होते हैं. ऐसे लोगों का अहंकार हजार गज ऊँचे भवन या अट्टालिका से भी ऊँचा हो जाता है. उनके मन में उन्हें ज्ञात होता है के न तो वो उस लायक हैं न ही उसके अधिकारी, ऊपर से सुसंस्कारों से रहित ऐसे लोग अपने अहंकार में आकर बहुत अत्याचार व् जुल्म करते हैं. अमीरी के ठाठ−बाठ इसी दृष्टि से बनाये जाते है कि संपर्क आने वाले लोग अपने साथ उसकी तुलना करें और यह स्वीकार करें कि यह व्यक्ति हमारी अपेक्षा बड़ा या बहुत बड़ा है। वैभव के आधार पर बड़प्पन पाने का तरीका ही यह है. कर्मो का खेल कुछ ऐसा होता है के ऐसे अहंकारी व्यक्ति जितनी ऊंचाई पर अपने को दिखाने का प्रयास करतें हैं उतनी ही ऊंचाई से गिर जाते हैं.

आज जो धनी है आजीवन वैसी ही स्थिति में जरुरी नहीं के बना रहेगा आय घटने खर्च बढ़ने के कई बार ऐसे अप्रत्याशित कारण होते है जिनके कारण संग्रहित पूँजी शीघ्र समाप्त हो जाती है। व्यापार में मन्दी, कृषि में वर्षा न होना या बाढ़,चोरी, बीमारी, मुकदमेबाजी, विवाह या दिखावे बाजी के ऐसे खर्च आ सकते है जिनके कारण सम्पन्नता एक झटके में अदृश्य हो जाय। आय के स्त्रोत सूख जाते है। बच्चे व्यसनी, आलसी एवं कुमार्गगामी निकले तो भी संपत्ति देर तक नहीं ठहरती, भले ही वह कितनी अधिक क्यों न हो पिछले दिनों सुसम्पन्न कहलाने वाले व्यक्ति दर−दर की ठोकरें खाते देखे जा सकते हैं.

रूप का अहंकार व् नशा

पृथ्वी जैसे लाखो सुन्दर ग्रह हैं जहाँ असंख्य प्रजातियों के प्राणी रहते हैं, हर ग्रह में भौतिक शरीर वाले प्राणिओ के आकार व् बाह्र्य रूप वहां के वातावरण पर निर्भर करते हैं. हमारी पृथ्वी पर मनुष्य सबसे उच्च श्रेणी के प्राणी हैं, चाहे बाहर से कैसे भी हों, अंतर में आत्मा का अंश है

पर पिछले जन्मो जन्मांतरों के कर्मो के कारण हर प्राणी का मौलिक ज्ञान व् रूप अलग होता है. आज हमारा प्रश्न केवल बाहरी रूप से है तो इस जन्म में जो रूप व् परिवार हमें प्राप्त हुआ है उसके पीछे भी हमारे पूर्व कर्म हैं. हम सब जानते हैं के जो मनुष्य वास्तव में ज्ञाता होते हैं उन्हें

बाहरी रूप से कोई वास्ता नहीं होता. पर आज के कलयुग में जहाँ केवल बाहरी रुप ही बिकता है जिन लोगो को रूपवान शरीर मिला है उन्हें अपने आप को नुमाइश नहीं करना चाहिए। अपने रूप या यौवन को प्रदर्शित कभी न करें, जहाँ तक हो सके उसे ईश्वर का प्रसाद समझ

सादा रहें उसे अपने तक सीमित रखें उसका दुरूपयोग किसी को लुभाने के लिए या पैसा कमाने के लिए न करें। कई बार रूप वान मनुष्य चाहे विवेकी हों भी, दूसरे लोग उनकी अहंकार की भावना को जगा देते हैं. ऐसा कभी न होने दें. अपने रूप, शारीरिक सुंदरता पर अभिमान व् अहंकार एक नशा बन जाता है और यदि विवेक व् शील न हो तो उसका परिणाम भयानक होता है. अधिकतर ऐसे अहंकारी लोग मनोविकारों के शिकार हो जाते हैं.


शरीर बल या मनोबल का दुरूपयोग व् अहंकार का अर्थ है एक दिन यह बल हमसे छीन लिया जाएगा. हजारों जड़ मूर्ख शरीर के बल पर दुर्बलों को सताकर जो पाप कर्म कमाते हैं वह इसी जीवन में एक अभिशाप बन जाता है.

पदवी पद व् कुर्सी का अहंकार - अति भयानक होता है और इसके मद में कितने ही आरम्भ में विवेकी व् धर्मी लोग, भ्रष्ट बन अधर्मी, अविवेकी बन जाते हैं. याद रखें के ईश्वर से मिली योग्यताओं को जनता की सेवा में लगा कर ही हम अपनी आत्मा के पथ पर आगे जायेंगे, यदि हम अपने पद का दुरूपयोग करेंगे तो पैसा वैभव तो खूब मिलेगा पर वह क्षण भंगुर ही होगा। पाप से कमाया धन अमृत नहीं ज़हर बन जाता है. अपने व् परिवार के अच्छे स्वस्थ्य व् आत्मा और मन की शान्ति के लिए अपने पद का प्रयोग केवल उन लोगो की भलाई में लगाएं जो वास्तव में उसके अधिकारी हकदार हैं.

विद्या व् ज्ञान का अहंकार एक बौद्धिक बेईमानी ही है. विद्या ज्ञान व् शिक्षा पाना ईश्वर का अति सुन्दर प्रसाद है और अपने ज्ञान का अहंकार आदमी को अविवेकी बना भाव जगत से दूर ले जाता है. विद्वता की शोभा अहंकार नहीं विनम्रता है।

अहं जब अपने आकार से ऊपर जाए - कैसे बचें और जीवन को सफल बनाएं ?

सम्पत्ति की अस्थिरता को अनुभव करें और उस पर घमंड न करें, धन का अहंकार आज किया जा सकता है पर कल जब वह न रहेगा तो आसमान से गिर कर पाताल से टकराने जितनी चोट लगेगी। ऐसे व्यक्ति दूसरों की सहानुभूति भी अर्जित नहीं कर पाते। दुर्दिनों में उन पर उपहास ही बरसते है। धन हानि के साथ इस तिरस्कार का प्रभाव मिलकर कष्ट को दूना कर देते है।

अभिमान को स्वाभिमान में बदलें और अहंकार के कांटो को निकालकर विनम्रता के कोमल फूलों से इतना भर दें के अहंकार वास्तव में अंतर में रहे ही नहीं. मोह और आसक्ति रहित भाव से कार्य करते चलें जाय। कर्म करो पर उसमें आसक्त मत हो जाओ।हम जो कुछ कर रहे हैं वह ईश्वरकी प्रेरणा से करते हैं, तो वह प्रत्येक कार्य, कर्म व् उद्यम ईश्वर की लीला बन जाएगा।

स्वाभिमान एक सफल जीवन की विशेषता है पर अहंकार अहितकर। आत्म गौरव व् उचित मात्रा में स्वाभिमान होना अपने को सफलता की राह पर ले जाता है पर अहंकार तो झूठ का ही स्वरुप है, हमारा कल्पित स्वपन है जो वास्तव में है ही नहीं इसलिए उसका त्याग ही हमें सद्भावना व् सुहृदय से भरेगा और ऐसा होने पर हम आध्यात्मिक यात्रा की और अग्रसर हो सकते हैं.
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