Sunday, February 21, 2016

17>আরতি কি=( 1 to 3 )

17>|| আরতি কি***( 1 to 3 )

1--------------------আরতি কি? এবং কেন আরতি করা হয়?
2--------------------जानिए आरती के बाद क्यों बोलते है कर्पूरगौर मंत्र
3>-----------बिल्व पत्र का महत्व
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1>==আরতি কি? এবং কেন আরতি করা হয়?
আরতিকে নীরাজন বলা হয়। একান্ত মনো নিবেশ করিয়া ভগবান কে ধূপ, দীপ, পুষ্প, প্রদীপ, চামর, অর্ঘ্যপাত্র, ধৌতবস্এ, ব্যজন ইত্যাদি দ্বারা ভগবান কে আরোতি করতে
হয়।
শ্রী বিগ্রহের পদতলে ৪ বার, নাভিদেশে ২ বার, মুখমন্ডোলে ৩ বার, সর্বএ গাত্রকে ৭ বার করিয়া এক এক প্রকারের আরোতি করা হয়।
স্বয়ং দেবাদিদেব মহাদেব পার্বতী দেবী কে বলেছেন যে, ভগবানের পূজা যদি মন্ত্রহীন বা ক্রীয়া হীন হয়, তবে তাআরোতীর দ্বারা সর্বপ্রকারে সম্পূর্ণতা প্রাপ্ত হয়।
স্কন্দ-পুরানে বনর্না আছে যে কেউ যদি আরতি দর্শন করেন বা আরতিতে অংশগ্রহণ করেন,নৃত্য করেন তাহলে ঐ ব্যক্তি কোটি কোটি বছরের সন্চিত সমস্ত পাপ থেকে মুক্ত হন। তিনি যদি এমনকি ব্রক্ষহত্যার মতো জগন্যতম পাপ থেকে
মুক্ত হন।
তন্ত্রশাস্রে বলা হয়েছে,ভগবানের আরোতির পরে কেউ পুষ্প ও প্রদীপ, ধূপ নাসারন্ধ্রে প্রবেশ বা গাত্রকে আভা গ্রহন করলে তাঁর সমস্থ পাপের বন্ধন থেকে মুক্ত হন।
বরাহ পুরানে বলা হয়েছে যে,কেউ যদি আরতির সময় শ্রী ভগবানের শ্রী বিগ্রহ বা মুখমন্ডল আনন্দ ভাবে দর্শন করেন, শ্রী যমরাজ তাকে দেখে ভয় পায় এবং মৃত্যুর পর
তার বৈকুণ্ঠধাম প্রাপ্ত হয়।
তাই আমাদের সকলের কর্তব্য বা উচিত শ্রী ভগবানের আরতিতে অংশগ্রহণ, কির্তন, দর্শন,ও নৃত্য করন। তাতে ভগবান সন্তুষ্ট ও খুব খুশি হন।
যখন ভগবানের আরতি করা হয়, সকল দেব ও দেবী সেখানে উপস্থিথ হইয়া ভগবানের আরতি দর্শন করেন।তবে অনুরোধ কেউ আরতি চলাকালীন ভগবান কে প্রনাম করবেন না, তাহলে তার পরম আয়ু কমে যাবে, তিনি রোগ গ্রস্থ হবেন।


আরতি কি? এবং কেন আরতি করা হয়
13>=Aআরতি কি? এবং কেন আরতি করা হয়?আরতিকে নীরাজন বলা হয়। একান্ত মনো নিবেশ করিয়া ভগবান কে ধূপ, দীপ, পুষ্প, প্রদীপ, চামর, অর্ঘ্যপাত্র, ধৌতবস্এ, ব্যজন ইত্যাদি দ্বারা ভগবান কে আরোতি করতে
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2>=जानिए आरती के बाद क्यों बोलते है कर्पूरगौर मंत्र

जानिए आरती के बाद क्यों बोलते हैं कर्पूरगौरं.. मंत्र ?

किसी भी मंदिर में या हमारे घर में जब भी पूजन कर्म होते हैं तो वहां कुछ मंत्रों का जप अनिवार्य रूप से
किया जाता है। सभी देवी-देवताओं के मंत्र अलग-अलग हैं, लेकिन जब भी आरती पूर्ण होती है तो यह मंत्र
विशेष रूप से बोला जाता है-

कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।
सदा बसन्तं हृदयारबिन्दे भबं भवानीसहितं नमामि।।

ये है इस मंत्र का अर्थ

इस मंत्र से शिवजी की स्तुति की जाती है। इसका अर्थ इस प्रकार है-
कर्पूरगौरं- कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले।

करुणावतारं- करुणा के जो साक्षात् अवतार हैं।

संसारसारं- समस्त सृष्टि के जो सार हैं।

भुजगेंद्रहारम्- इस शब्द का अर्थ है जो सांप को हार के रूप में धारण करते हैं।

सदा वसतं हृदयाविन्दे भवंभावनी सहितं नमामि- इसका अर्थ है कि जो शिव, पार्वती के साथ सदैव मेरे हृदय में

निवास करते हैं, उनको मेरा नमन है।

मंत्र का पूरा अर्थ- जो कर्पूर जैसे गौर वर्ण

वाले हैं, करुणा के अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, वे भगवान शिव माता भवानी

सहित मेरे ह्रदय में सदैव निवास करें और उन्हें मेरा नमन है।

यही मंत्र क्यों....?

किसी भी देवी-देवता की आरती के बाद कर्पूरगौरम् करुणावतारं....मंत्र ही क्यों बोला जाता है, इसके पीछे

बहुत गहरे अर्थ छिपे हुए हैं। भगवान शिव की ये स्तुति शिव-पार्वती विवाह के समय विष्णु द्वारा गाई हुई

मानी गई है। अमूमन ये माना जाता है कि शिव शमशान वासी हैं, उनका स्वरुप बहुत भयंकर और अघोरी

वाला है। लेकिन, ये स्तुति बताती है कि उनका स्वरुप बहुत दिव्य है। शिव को सृष्टि का अधिपति माना गया है,

वे मृत्युलोक के देवता हैं, उन्हें पशुपतिनाथ भी कहा जाता है, पशुपति का अर्थ है संसार के जितने भी जीव

हैं (मनुष्य सहित) उन सब का अधिपति। ये स्तुति इसी कारण से गाई जाती है कि जो इस समस्त संसार का

अधिपति है, वो हमारे मन में वास करे। शिव श्मशान वासी हैं, जो मृत्यु के भय को दूर करते हैं। हमारे मन

में शिव वास करें, मृत्यु का भय दूर हो।

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3>बिल्व पत्र का महत्व

एस्ट्रोलॉजी हाउस :-बिल्व पत्र का महत्व बिल्व तथा श्रीफल नाम से प्रसिद्ध (famous) यह फल 
बहुत ही काम का है। यह जिस पेड़ (tree) पर लगता है वह शिवद्रुम भी कहलाता है। बिल्व का 
पेड़ संपन्नता का प्रतीक, बहुत पवित्र तथा समृद्धि देने वाला है। बेल के पत्ते शंकर जी 
(shiv shanker ji) का आहार माने गए हैं, इसलिए भक्त लोग बड़ी श्रद्धा से इन्हें महादेव के ऊपर
 चढ़ाते हैं। शिव की पूजा के लिए बिल्व-पत्र बहुत ज़रूरी माना जाता है। शिव-भक्तों का विश्वास है 
कि पत्तों (leaves) के त्रिनेत्रस्वरूप् तीनों पर्णक शिव के तीनों नेत्रों को विशेष प्रिय हैं।
2=भगवान शंकर का प्रियभगवान शंकर को बिल्व पत्र बेहद प्रिय हैं। भांग धतूरा और बिल्व पत्र से 
प्रसन्न होने वाले केवल शिव ही हैं। शिवरात्रि (shiv ratri) के अवसर पर बिल्वपत्रों से विशेष रूप 
से शिव की पूजा की जाती है। तीन पत्तियों वाले बिल्व पत्र आसानी से उपलब्ध (easily available)
 हो जाते हैं, 
किंतु कुछ ऐसे बिल्व पत्र भी होते हैं जो दुर्लभ पर चमत्कारिक और अद्भुत होते हैं।
3=बिल्वाष्टक और शिव पुराणबिल्व पत्र का भगवान शंकर के पूजन (poojan) में विशेष महत्व (special importance) है जिसका प्रमाण शास्त्रों में मिलता है। बिल्वाष्टक और शिव पुराण में 
इसका स्पेशल उल्लेख है। 
अन्य कई ग्रंथों में भी इसका उल्लेख मिलता है। भगवान शंकर एवं पार्वती को बिल्व पत्र चढ़ाने का 
विशेष महत्व है।
4=मां भगवती को बिल्व पत्रश्रीमद् देवी भागवत में स्पष्ट वर्णन है कि जो व्यक्ति मां 
भगवती (ma bhagwati) को बिल्व पत्र अर्पित करता है वह कभी भी किसी भी परिस्थिति में 
दुखी नहीं होता। 
उसे हर तरह की सिद्धि प्राप्त होती है और कई जन्मों के पापों से मुक्ति मिलती है और वह भगवान 
भोले नाथ का प्रिय भक्त हो जाता है। उसकी सभी इच्छाएं (wishes) पूरी होती हैं और अंत में मोक्ष 
की प्राप्ति होती है।
5=बिल्व पत्र के प्रकारबिल्व पत्र चार प्रकार के होते हैं – अखंड बिल्व पत्र, तीन 
पत्तियों के बिल्व पत्र, छः से 21 पत्तियों तक के बिल्व पत्र और श्वेत बिल्व पत्र। इन सभी बिल्व 
पत्रों का अपना-अपना आध्यात्मिक महत्व (spiritual importance) है। आप हैरान हो जाएंगे ये 
जानकर की कैसे ये बेलपत्र आपको भाग्यवान बना सकते हैं और लक्ष्मी कृपा दिला सकते हैं।
6=अखंड बिल्व पत्रइसका विवरण बिल्वाष्टक में इस प्रकार है – ‘‘अखंड बिल्व पत्रं नंदकेश्वरे सिद्धर्थ लक्ष्मी’’। यह अपने आप में लक्ष्मी सिद्ध है। एकमुखी रुद्राक्ष के समान ही इसका अपना विशेष महत्व है। 
यह वास्तुदोष का निवारण भी करता है। इसे गल्ले में रखकर नित्य पूजन करने से व्यापार में चैमुखी 
विकास होता है।
7=तीन पत्तियों वाला बिल्व पत्रइस बिल्व पत्र के महत्व का वर्णन भी बिल्वाष्टक में आया है जो इस 
प्रकार है- ‘‘त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रिधायुतम् त्रिजन्म पाप सहारं एक बिल्वपत्रं शिवार्पणम’’ यह 
तीन गणों से युक्त होने के कारण भगवान शिव को प्रिय है। इसके साथ यदि एक फूल धतूरे का चढ़ा 
दिया जाए, तो फलों (fruits) में बहुत वृद्धि होती है।
8=तीन पत्तियों वाला बिल्व पत्रइस तरह बिल्व पत्र अर्पित करने से भक्त को धर्म, अर्थ, काम और 
मोक्ष की प्राप्ति होती है। रीतिकालीन कवि ने इसका वर्णन इस प्रकार किया है- ‘‘देखि त्रिपुरारी की 
उदारता अपार कहां पायो तो फल चार एक फूल दीनो धतूरा को’’ भगवान आशुतोष त्रिपुरारी भंडारी 
सबका भंडार भर देते हैं।
9=तीन पत्तियों वाला बिल्व पत्रआप भी फूल चढ़ाकर इसका चमत्कार स्वयं देख सकते हैं और सिद्धि 
प्राप्त कर सकते हैं। तीन पत्तियों वाले बिल्व पत्र में अखंड बिल्व पत्र भी प्राप्त हो जाते हैं। कभी-कभी 
एक ही वृक्ष पर चार, पांच, छह पत्तियों वाले बिल्व पत्र भी पाए जाते हैं। परंतु ये बहुत दुर्लभ हैं।
10=छह से लेकर 21 पत्तियों वाले बिल्व पत्रये मुख्यतः नेपाल (nepal) में पाए जाते हैं। पर भारत (india) में भी कहीं-कहीं मिलते हैं। जिस तरह रुद्राक्ष कई मुखों वाले होते हैं उसी तरह बिल्व पत्र 
भी कई पत्तियों वाले होते हैं।
11=श्वेत बिल्व पत्रजिस तरह सफेद सांप, सफेद टांक, सफेद आंख, सफेद दूर्वा आदि होते हैं 
उसी तरह सफेद बिल्वपत्र भी होता है। यह प्रकृति (nature) की अनमोल देन है। इस बिल्व पत्र 
के पूरे पेड़ पर श्वेत पत्ते पाए जाते हैं। इसमें हरी पत्तियां नहीं होतीं। इन्हें भगवान शंकर को अर्पित 
करने का विशेष महत्व है।
12=कैसे आया बेल वृक्षबेल वृक्ष की उत्पत्ति के संबंध में ‘स्कंदपुराण’ में कहा गया है कि एक बार 
देवी पार्वती ने अपनी ललाट से पसीना पोछकर फेंका, जिसकी कुछ बूंदें मंदार पर्वत (mandaar mountain) पर गिरीं, जिससे बेल वृक्ष उत्पन्न हुआ। इस वृक्ष की जड़ों में गिरिजा, तना में महेश्वरी, शाखाओं में दक्षयायनी, पत्तियों में पार्वती, फूलों में गौरी और फलों में कात्यायनी वास करती हैं।
13=कांटों में भी हैं शक्तियाँकहा जाता है कि बेल वृक्ष के कांटों में भी कई शक्तियाँ समाहित हैं।
 यह माना जाता है कि देवी महालक्ष्मी का भी बेल वृक्ष में वास है। जो व्यक्ति शिव-पार्वती की पूजा 
बेलपत्र अर्पित कर करते हैं, उन्हें महादेव और देवी पार्वती दोनों का आशीर्वाद मिलता है। 
‘शिवपुराण’ में इसकी महिमा विस्तृत रूप में बतायी गयी है।
14=ये भी है श्रीफलनारियल (coconut) से पहले बिल्व के फल को श्रीफल माना जाता था क्योंकि 
बिल्व वृक्ष लक्ष्मी जी का प्रिय वृक्ष माना जाता था। प्राचीन समय में बिल्व फल को लक्ष्मी और सम्पत्ति 
का प्रतीक मान कर लक्ष्मी जी को प्रसन्न करने के लिए बिल्व के फल की आहुति दी जाती थी जिसका 
स्थान अब नारियल ने ले लिया है। प्राचीन समय से ही बिल्व वृक्ष और फल पूजनीय रहा है, पहले लक्ष्मी 
जी के साथ और धीरे-धीरे शिव जी के साथ।
15=यह एक रामबाण दवा भी हैवनस्पति में बेल का अत्यधिक महत्व है। यह मूलतः शक्ति का प्रतीक 
माना गया है। किसी-किसी पेड़ पर पांच से साढ़े सात किलो वजन वाले चिकित्सा विज्ञान में बेल का 
विशेष महत्व है। आजकल कई व्यक्ति इसकी खेती करने लगे हैं। इसके फल से शरबत, अचार और 
मुरब्बा आदि बनाए जाते हैं। यह हृदय रोगियों (heart patients) और उदर विकार से ग्रस्त लोगों के 
लिए रामबाण औषधि (medicine) है।
16=यह एक रामबाण दवा भी हैधार्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होने के कारण इसे मंदिरों 
(mandir/temple) के पास लगाया जाता है। 
बिल्व वृक्ष की तासीर बहुत शीतल होती है। 
गर्मी की तपिश से बचने के लिए इसके फल का शर्बत बड़ा ही लाभकारी (helpful) होता है। 
यह शर्बत कुपचन, आंखों की रोशनी (eye sight) में कमी, पेट में कीड़े और लू लगने जैसी 
समस्या ओं से निजात पाने के लिए उत्तम है। 
औषधीय गुणों से परिपूर्ण बिल्व की पत्तियों मे टैनिन, लोह, कैल्शियम, पोटेशियम और मैग्नेशियम (magnesium) जैसे रसायन (chemical) पाए जाते हैं। 

क्या हैं बेल पत्र अथवा बिल्व-पत्र?बिल्व-पत्र एक पेड़ की पत्तियां हैं, जिस के हर पत्ते लगभग तीन-तीन 
के समूह में मिलते हैं। कुछ पत्तियां चार या पांच के समूह की भी होती हैं। किन्तु चार या पांच के समूह 
वाली पत्तियां बड़ी दुर्लभ होती हैं। बेल के पेड को बिल्व भी कहते हैं। बिल्व के पेड़ का विशेष धार्मिक 
महत्व हैं। शास्त्रोक्त मान्यता हैं कि बेल के पेड़ को पानी या गंगाजल से सींचने से समस्त तीर्थो का फल प्राप्त होता हैं एवं भक्त को शिवलोक की प्राप्ति होती हैं। 
बेल कि पत्तियों में औषधि गुण भी होते हैं। जिसके उचित औषधीय प्रयोग से कई रोग दूर हो जाते हैं। भारतिय संस्कृति में बेल के वृक्ष का धार्मिक महत्व हैं, क्योकि बिल्व का वृक्ष भगवान शिव का ही रूप है। धार्मिक ऐसी मान्यता हैं कि बिल्व-वृक्ष के मूल अर्थात उसकी जड़ में शिव लिंग स्वरूपी भगवान शिव का वास होता हैं। इसी कारण से बिल्व के मूल में भगवान शिव का पूजन किया जाता हैं। पूजन में इसकी मूल यानी जड़ को सींचा जाता हैं।
धर्मग्रंथों में भी इसका उल्लेख मिलता हैं--
बिल्वमूले महादेवं लिंगरूपिणमव्ययम्।य: पूजयति पुण्यात्मा स शिवं प्राप्नुयाद्॥
बिल्वमूले जलैर्यस्तु मूर्धानमभिषिञ्चति।स सर्वतीर्थस्नात: स्यात्स एव भुवि पावन:॥ 
(शिवपुराण)भावार्थ: बिल्व के मूल में लिंगरूपी अविनाशी महादेव का पूजन जो पुण्यात्मा व्यक्ति करता है, उसका कल्याण होता है। जो व्यक्ति शिवजी के ऊपर बिल्वमूल में जल चढ़ाता है उसे सब तीर्थो में स्नान 
का फल मिल जाता है।

बिल्व पत्र तोड़ने का मंत्रबिल्व-पत्र को सोच-समझ कर ही तोड़ना चाहिए। बेल के पत्ते तोड़ने से पहले 
निम्न मंत्र का उच्चरण करना चाहिए- 
अमृतोद्भव श्रीवृक्ष महादेवप्रियःसदा।गृह्यामि तव पत्राणि शिवपूजार्थमादरात्॥ 
-(आचारेन्दु)भावार्थ: अमृत से उत्पन्न सौंदर्य व ऐश्वर्यपूर्ण वृक्ष महादेव को हमेशा प्रिय है। भगवान शिव की पूजा के लिए हे वृक्ष में तुम्हारे पत्र तोड़ता हूं।

कब न तोड़ें बिल्व कि पत्तियां?* विशेष दिन या विशेष पर्वो के अवसर पर बिल्व के पेड़ से पत्तियां तोड़ना निषेध हैं। 
* शास्त्रों के अनुसार बेल कि पत्तियां इन दिनों में नहीं तोड़ना चाहिए-
* बेल कि पत्तियां सोमवार के दिन नहीं तोड़ना चाहिए।
* बेल कि पत्तियां चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी और अमावस्या की तिथियों को नहीं तोड़ना चाहिए।
* बेल कि पत्तियां संक्रांति के दिन नहीं तोड़ना चाहिए।
अमारिक्तासु संक्रान्त्यामष्टम्यामिन्दुवासरे ।बिल्वपत्रं न च छिन्द्याच्छिन्द्याच्चेन्नरकं व्रजेत ॥ 
(लिंगपुराण)भावार्थ: अमावस्या, संक्रान्ति के समय, चतुर्थी, अष्टमी, नवमी और चतुर्दशी तिथियों तथा सोमवार के दिन बिल्व-पत्र तोड़ना वर्जित है।

चढ़ाया गया पत्र भी पूनः चढ़ा सकते हैं?
शास्त्रों में विशेष दिनों पर बिल्व-पत्र तोडकर चढ़ाने से मना किया गया हैं तो यह भी कहा गया है कि इन दिनों में चढ़ाया गया बिल्व-पत्र धोकर पुन: चढ़ा सकते हैं।
अर्पितान्यपि बिल्वानि प्रक्षाल्यापि पुन: पुन:।शंकरायार्पणीयानि न नवानि यदि चित्॥ 

(स्कन्दपुराण) और (आचारेन्दु)भावार्थ: अगर भगवान शिव को अर्पित करने के लिए नूतन बिल्व-पत्र 
न हो तो चढ़ाए गए पत्तों को बार-बार धोकर चढ़ा सकते हैं।
बेल पत्र चढाने का मंत्र भगवान शंकर को विल्वपत्र अर्पित करने से मनुष्य कि सर्वकार्य व मनोकामना सिद्ध होती हैं। 
श्रावण में विल्व पत्र अर्पित करने का विशेष महत्व शास्त्रो में बताया गया हैं। विल्व पत्र अर्पित करते समय इस मंत्र का उच्चारण करना चाहिए:
त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रिधायुतम्।त्रिजन्मपापसंहार, विल्वपत्र शिवार्पणम्भावार्थ: 
तीन गुण, तीन नेत्र, त्रिशूल धारण करने वाले और तीन जन्मों के पाप को संहार करने वाले हे शिवजी आपको त्रिदल बिल्व पत्र अर्पित करता हूं।
शिव को बिल्व-पत्र चढ़ाने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। 
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16>ध्यान क्यों+Our mind || (1--5)

16>|| ध्यान क्यों+Our mind+मनऔरविचार***( 1 to 5 )

1------------------ध्यान क्यों करना चाहिए?
2-----------------Our Mind
3-----------------मन और विचार
4------------------प्रतिदिन स्मरण योग्य शुभ तथा कल्याणदायक स्तोत्र संग्रह :-
5---------------------पूर्ण सफलता हेतु अपने दिन का सर्वश्रेष्ठ प्रयोग कैसे हो?
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1> ध्यान क्यों करना चाहिए?

ध्यान में क्या ताकत है?
ध्यान साधना का क्या महत्व है....?

जब100 लोग एक साथ साधना करते है तो उत्पन्न लहरें 5 कि.मी.तक फैलती है और नकारात्मकता नष्ट कर सकारात्मकता का निर्माण करती है।

आईस्टांईन नें वैज्ञानिक दृष्टिकोण से कहा था के एक अणु के विधटन से लगत के अणु का विधटन होता है,

इसीको हम अणु विस्फोट कहते है।
यही सुत्र हमारे ऋषि, मुनियों ने हमें हजारो साल पहले दिया था।

आज पृथ्वी पर केवल4% लोंग ही ध्यान करते है
लेकिन बचे 96% लोंगो को इसका पॉजिटिव इफेक्ट होता है।

अगर हम भी लगातार 90 दिनो तक ध्यान करे तो इसका सकारात्मक प्रभाव हमारे और हमारे परिवार पर दिखाई देगा।
अगर पृथ्वी पर 10% लोंग ध्यान करनें लगे
तो पृथ्वी पर विद्यमान लगभग सभी समस्याओं को नष्ट करने की ताकत ध्यान में है।
उदारहण के लिए हम बात करे तो।::::
महर्षि महेश योगी जी
सन् 1993 में वैज्ञानिकों के समक्ष यह सिद्ध किया था।। हुआ यू की
उन्होने वॉशिंगटन डि सी में 4000 अध्यापको को बुलाकर एक साथ ध्यान(मेडिटेशन) करने को कहा......
और..और चमत्कारीक परिणाम यह था के
शहर का क्राईम रिपोर्ट 50% तक कम हुवा पाया गया ।
वैज्ञानिकों को कारण समझ नहीं आया और उन्होनें इसे

``महर्षि इफेक्ट" यह नाम दिया।

भाईयों यह ताकत है।। ध्यान मे।
हम हमारे भौतिक और आध्यात्मिक यश को
कम से कम श्रम करके अधिक से अधिक साध सकते है।
``जरुरत है ध्यान से स्वत: को खोजनें की" यही आत्म साक्षात्कार का मार्ग है। अहम् ब्रम्हास्मि''''''''''''''''''''''

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2>=Our Mind

  Our mind is a pool of thoughts every day positive and negative thoughts cross through it which later reflect in to action. Negative thinking is the source of distrust, suspicious and arguments. The positive thoughts results in increased self confidence and will power.
 'What is the nature of the mind?'
What is called ‘mind’ is a wondrous power residing in the Self. It causes all thoughts to arise. Apart from thoughts, there is no such thing as mind. Therefore, thought is the nature of mind. Apart from thoughts, there is no independent entity called the world. In deep sleep there are no thoughts, and there is no world. In the states of waking and dream, there are thoughts, and there is a world also. Just as the spider emits the thread (of the web) out of itself and again withdraws it into itself, likewise the mind projects the world out of itself and again resolves it into itself. When the mind comes out of the Self, the world appears. Therefore, when the world appears (to be real), the Self does not appear; and when the Self appears (shines) the world does not appear. When one persistently inquires into the nature of the mind, the mind will end leaving the Self (as the residue). What is referred to as the Self is the Atman. The mind always exists only in dependence on something gross; it cannot stay alone. It is the mind that is called the subtle body or the soul (diva).
('Who Am I?', Question 8)
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3>=मन और विचार

: हमारा मन कई तरह के विचारों से भरा रहता है |इसमें कुछ सकारात्मक कुछ नकारात्मक विचार रहते हैं |नकारात्मक विचारों से मन में शंका व तर्क का निर्माण होता है, शंका से शक्ति बंटने लगती है व व्यक्तित्व विकास में बाधा पड़ती है |शंका से मन में द्वंद उत्पन होता है और द्वंद्वात्मक मन ही शत्रु की भूमिका की पूर्ति करता है |
. . . . सकारात्मक विचारों से व्यक्ति में आत्मविश्वास और संकल्प शक्ति का विकास होता है |विश्वास तथा संकल्प मिल कर निष्ठा का रूप धारण करते हैं |निष्ठा की परिपक्व अवस्था ही श्रद्धा निर्माण करती है |श्रद्धा की पूर्णता समर्पण में है

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4>प्रतिदिन स्मरण योग्य शुभ तथा कल्याणदायक स्तोत्र संग्रह :-

                *******प्रात: कर-दर्शनम्*******
             ॐकराग्रे वसते लक्ष्मी करमध्ये सरस्वती।
              करमूले तू गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम्॥

               *******पृथ्वी क्षमा प्रार्थना*******
              ॐसमुद्र वसने देवी पर्वत स्तन मंडिते।
              विष्णु पत्नी नमस्तुभ्यं पाद स्पर्शं क्षमश्वमेव॥


             ******* त्रिदेव सहित नवग्रह स्मरण*******
          ॐब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानु: शशी भूमिसुतो बुधश्च।
           गुरुश्च शुक्र: शनिराहुकेतव: कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥
                *******स्नान मन्त्र*******
            ॐगंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती।
          नर्मदे सिन्धु कावेरी जले अस्मिन् सन्निधिम् कुरु॥

              *******सूर्यनमस्कार*******
             ॐ सूर्य आत्मा जगतस्तस्युषश्च
        आदित्यस्य नमस्कारं ये कुर्वन्ति दिने दिने।
         दीर्घमायुर्बलं वीर्यं व्याधि शोक विनाशनम्
           सूर्य पादोदकं तीर्थ जठरे धारयाम्यहम्॥

                        ॐ मित्राय नम:
                        ॐ रवये नम:
                        ॐ सूर्याय नम:
                        ॐ भानवे नम:
                        ॐ खगाय नम:
                        ॐ पूष्णे नम:
                        ॐ हिरण्यगर्भाय नम:
                        ॐ मरीचये नम:
                        ॐ आदित्याय नम:
                        ॐ सवित्रे नम:
                        ॐ अर्काय नम:
                        ॐ भास्कराय नम:
                        ॐ श्री सवितृ सूर्यनारायणाय नम:

                   आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीदमम् भास्कर।
                   दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते॥

                       *******दीप दर्शन*******
                   शुभं करोति कल्याणम् आरोग्यम् धनसंपदा।
                   शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपकाय नमोऽस्तु ते॥

                   दीपो ज्योति परं ब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दनः।
                   दीपो हरतु मे पापं संध्यादीप नमोऽस्तु ते॥

                   *******गणपति स्तोत्र*******
                 गणपति: विघ्नराजो लम्बतुन्ड़ो गजानन:।
                 द्वै मातुरश्च हेरम्ब एकदंतो गणाधिप:॥
                 विनायक: चारूकर्ण: पशुपालो भवात्मज:।
                 द्वादश एतानि नामानि प्रात: उत्थाय य: पठेत्॥
                 विश्वम तस्य भवेद् वश्यम् न च विघ्नम् भवेत् क्वचित्।

                 विघ्नेश्वराय वरदाय शुभप्रियाय।
                 लम्बोदराय विकटाय गजाननाय॥
                 नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय।
                 गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥

                 शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजं।
                 प्रसन्नवदनं ध्यायेतसर्वविघ्नोपशान्तये॥

                  *******आदिशक्ति वंदना*******
                  सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
                  शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

                    *******शिव स्तुति*******
                      कर्पूर गौरम करुणावतारं,
                      संसार सारं भुजगेन्द्र हारं।
                      सदा वसंतं हृदयार विन्दे,
                      भवं भवानी सहितं नमामि॥

                    *******विष्णु स्तुति*******
                शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
                विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम्।
               लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्
               वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

                 *******श्री कृष्ण स्तुति*******
            कस्तुरी तिलकम ललाटपटले, वक्षस्थले कौस्तुभम।
            नासाग्रे वरमौक्तिकम करतले, वेणु करे कंकणम॥
            सर्वांगे हरिचन्दनम सुललितम, कंठे च मुक्तावलि।
             गोपस्त्री परिवेश्तिथो विजयते, गोपाल चूडामणी॥

              मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम्‌।
              यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम्‌॥

               *******श्रीराम वंदना********
             लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्।
             कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये॥

                *******श्रीरामाष्टक*******
            हे रामा पुरुषोत्तमा नरहरे नारायणा केशवा।
            गोविन्दा गरुड़ध्वजा गुणनिधे दामोदरा माधवा॥
            हे कृष्ण कमलापते यदुपते सीतापते श्रीपते।
            बैकुण्ठाधिपते चराचरपते लक्ष्मीपते पाहिमाम्॥

              *******एक श्लोकी रामायण*******
             आदौ रामतपोवनादि गमनं हत्वा मृगं कांचनम्।
              वैदेही हरणं जटायु मरणं सुग्रीवसम्भाषणम्॥
              बालीनिर्दलनं समुद्रतरणं लंकापुरीदाहनम्।
              पश्चाद्रावण कुम्भकर्णहननं एतद्घि श्री रामायणम्॥

              *******सरस्वती वंदना********
             या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
             या वींणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपदमासना॥
             या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।
             सा माम पातु सरस्वती भगवती
             निःशेषजाड्याऽपहा॥

               *******हनुमान वंदना*******
              अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहम्‌।
               दनुजवनकृषानुम् ज्ञानिनांग्रगणयम्‌।
               सकलगुणनिधानं वानराणामधीशम्‌।
               रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥

        मनोजवं मारुततुल्यवेगम जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं।
        वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणम् प्रपद्ये॥

                *******स्वस्ति-वाचन*******
                ॐ स्वस्ति न इंद्रो वृद्धश्रवाः
                स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
                स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्ट्टनेमिः
                स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥

               *******शांति पाठ*******
            ऊँ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्‌ पूर्णमुदच्यते।
            पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥

            ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष (गुँ) शान्ति:,
         पृथिवी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।
        वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,
     सर्व (गुँ) शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥

                  ॥ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥
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5>पूर्ण सफलता हेतु अपने दिन का सर्वश्रेष्ठ प्रयोग कैसे हो?

एक आध्यात्मिक व् सात्विक दृष्टि जो अति कल्याणकारी हो सकती है. भक्ति मार्ग या गृहस्थ जीवन ?


केवल अपने कार्य पर ध्यान लगाएं, ईश्वर के कार्य को अपना समझ जो भी करें पूरे मन से करें यही सबसे बड़ा सेवा कार्य है और श्रीहरि की उपासना भी. जब आप अपने को पूरी तरह ध्यान व् एकाग्रता में लगाएंगे ईश्वर अपनी ऊर्जा से आपकी आत्मा को विस्तारित करेगा। ये बात अपने मित्रो से साझा करें और ईश्वर शक्ति आपके साथ होगी. आप सुरक्षित रहेंगे और आपके सुकर्म का परिणाम अति उत्तम होगा.

यदि आप शिक्षा ले रहें हैं तो केवल और केवल शिक्षा के विषयो पर ध्यान रहे, किसी व्यक्ति, पुरुष, स्त्री के सम्बन्ध में सोचना अपना समय व्यर्थ करना है. ये समय लौटकर नहीं आएगा. केवल शिक्षा को अपना गंतव्य बना लें. आपको सफलता मिलेगी तो मन को शांति मिलेगी.


जो भी करना है उसे ईश्वरीय प्रसाद समझ कर करें, और पृष्ठभूमि में सोचें, के ये सब कार्य परम ईश्वर, परम-ज्योति स्वरुप श्रीहरि जी के लिया किया जा रहा है. ऐसा करने से आपकी ऊर्जा व् मानसिक शक्तियां बढ़ेंगी, आपका आत्मा प्रकाश चैतन्यता की ओर जायेगा और साथ साथ काम भी होता रहेगा, आप अपना आध्यात्मिक उत्थान व् सर्व-विकास करेंगे और इस जीवन की गति बढ़ेगी, कई जन्मो के काम इसी जन्म में हो जायेंगे. याद रखें ये सब सांसारिक काम जब अच्छे होंगे, हमारा वास्तविक ध्येय जो इस जीवन काल का है, उस पर भी काम होगा.


दूसरी चीज़ जो भी करना है इतनी एकाग्रता से करें के वो सर्वश्रेष्ठ और उत्तम हो. भाषा प्रयोग करें, शुद्ध, एक समय में केवल एक शुद्ध भाषा प्रयोग करे, खिचड़ी न पकाएं, कोई भी भाषा जो बोलें, उसके सबसे अच्छे शब्द प्रयोग करें, क्यूंकि ये आपके अचेतन पर प्रभाव डालते हैं. धीरे धीरे कम से कम बोलने की आदत विकसित करें और जो भी बोलें वो इतना सुन्दर, मीठा, उत्तम और हल्के स्वर में हो के जैसे आप किसी नन्हे से निर्मल मन बालक से बात कर रहें है.


आपकी हर बात एक आयाम में अभिलेख हो आलेखित हो रही है. एक समय में जब अशरीर होंगे तो ये सारे शब्द कर्णो में नाद करने वाले हैं. ये सभी बाते आपतक एक बहुत उच्च आयाम से आत्मिक जगत के प्रकाश द्वारा पहुँच रहीं है. इन्हे आलेखित कर लें, आपके बहुत काम आएंगी, एक समय जब हम उस आयाम में मिलने वाले हैं, आप कहेंगे के मैंने ठीक ही बताया था. तो अपने मुख्य कार्य पर कुछ घंटे लगाएं, शब्दों, भाषा का प्रयोग केंद्रित हो कर करना। आप सफलता की राह पर जायेंगे. कोई दुविधा न होगी.,जो चुनौती आएं जो की आएँगी , घबराएं नहीं वह केवल छोटे छोटे रोड ब्रेकर हैं जो इसलिए आते हैं ताकि हम अपनी गति कुछ समय के लिए कम कर लें, जैसे एक कठिन मोड़ आता है तो गति कम की जाती है ऐसे ही चुनौती और कठिन समय में मन की गति कम कर दें, अति दुर्गम समय में गति रोक दें. सब विचार निकाल दें, शांत हो कर मनन करें. कुछ समय बाद आपको कई विकल्प दिखेंगे, सबसे अच्छा चुनाव करें और आगे बढ़ें।


भक्ति मार्ग या गृहस्थ जीवन ?

गृहस्थ जीवन भक्ति का सर्वश्रेष्ठ मार्ग है. इसमें आप संतुलित जीवन यात्रा करते हुए, श्रीहरि के प्रकाशमय जगत के निकट पहुँच सकते हैं. कुसंग, कुशिक्षा,मोह पैदा करने वाले उपभोगों, उपभोक्तावाद, कचरा टेलीविज़न, फिल्मे, अश्लील संगीत से बचें, अपने शेष समय कम से कम ३० मिनट ध्यान पर और, २० से ४० मिनट कीर्तन या सात्विक मधुर भजन संगीत में लगाएं।

अपने मन को एकाग्र कर सबसे निर्मोह प्रेम से बात करें, एक समय में एक कार्य हाथ में लें, अपने शरीर, मन व् आत्मा को बाह्र्य मलिनता प्रदूषण से बचाने का भरपूर प्रयास करें, किसी की भी बुराई करने में समय निवेश करने की अपेक्षा, हर दिन ८ - १० मिनट अपनी बुराईयों को सामने लाएं और उन पर विस्तार से ध्यान लगाकर उनका उद्गम कारण जाने और प्रण करें के अगले ५ दिन तक एक बुराई या आदत पर काम करना है. उसे २ - ३ पंक्तियों में एक सफ़ेद पत्र पर लिखकर अपने सामने या कपडे की जेब में रखलें, और दिन में दो तीन बार उसे पढ़ें.

अपने मनन के समय सोने से पहले, उठने के बाद धन्यवाद दें सब लोगों की जिन्होंने आपको उस दिन सेवा प्रदान की. ऐसा करना अति आवश्यक है, सब हमें सेवा प्रदान करने वाले, चाहे वो पैसा लें या न लें, हमारे वास्तविक मित्र हैं. उन सेवाकार आत्माओं को नमस्ते करें, उनके लिए प्रार्थना करें. स्मरण रहे श्रीहरि जो परम ईश्वर ज्योत हैं अपने प्रकाश से हमें हमारी सेवा करने वालो को

हमारे पास भेजते हैं. जब आप उन्हें नमस्ते करें, उसका प्रताप व् ऊर्जा उन तक पहुंचेगी और श्रीहरि की कृपा अपने आप वृद्धि करती रहेगी. ऐसा न करने पर श्रीहरि की कृपा कम होती चली जाएगी. ऊर्जा कम होगी शरीर व् मन अस्वस्थ होगा और हमारा ह्रास होगा. इसीलिए जब ऐसा हो तो सब कुछ छोड़कर श्रीहरि से प्रार्थना करने का समय आ गया है, कीर्तन करें. श्रीहरि कीर्ति गान अति सुगम रास्ता है जो आपको प्रकाश से उज्ज्वलित पथ पर ले जायेगा।


श्रीहरि आपको मन की एकाग्रता प्रदान करे और आपका अंतकरण सदैव शुद्ध रहे.
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Friday, February 19, 2016

15>संसार समस्यानहीं+अंतकरणब की ज्योति को देखाजासकता ||

15=,>|| संसारसमस्यानहीं***( 1 to 4 )

1------------------------ संसार समस्या नहीं है
2-------------------------क्या अंतकरण की ज्योति को देखा जा सकता है ?
3-------------------------चमत्कार व् तप का भेद
4-------------------------गुरु हमारे ही अंतर में है
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1> संसार समस्या नहीं है

संसार समस्या नहीं है वह तो प्रकृति है जो माया जाल है समस्या केवल उसमे रहने वाले जीव की है जो हम हैं शरीर या शरीर के पर यानि अशरीर किसी भी स्थिति में हमें ही इस पहेली को समझना है और उसका हल भी
हमारे ही अपने अंदर है यदि आप कुछ सन्देश और पढ़े तो आपको इस प्रश्न का उत्तर मिलेगा - ऐसी मेरी आशा और प्रार्थना है
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2>क्या अंतकरण की ज्योति को देखा जा सकता है ?

ज्योत व् उसका प्रकाश ध्यान लगाने पर केवल अंतर्मन ही "देख" सकता है.

एक स्थिति ऐसी होती है जहाँ अंतर्मन ही कार्यरत होता है उस स्थिति में प्रकाशित ज्योति केवल अंतकरण के चक्षु ही देख सकते हैं. ज्योति अपने ही प्रकाश में इतनी प्रज्जवलित होती है के उसे देखने के लिए बाह्र्य आँखे काम नहीं करतीं।

प्रश्न ये नहीं के ज्योत दिखे या नहीं, क्यूंकि एक दिन अपने आप उसे अनुभूत कर सकते हैं, और कुछ अवस्थाओं में बाह्र्य संसार या अस्थायी माया अंधकार सा लगने लगता है. इस स्थिति में आप शून्यस्थ होते हैं पर शुद्धतम अवस्था केवल तभी सम्भव है जब मन में छिपी या रहने वाली मलिनता सम्पूर्ण रूप से स्वच्छ हो.

ध्यान कैसे लगाएं और इसके बाद क्या होता है?
ध्यान व् एकाग्रता के स्थायित्व होने पर क्या होता है, क्या परिवर्तन आते हैं हमारे जीवन में, इसका वर्णन अगले लेख में. ध्यान की प्रक्रिया और उसमें कैसे स्थापति हों इसकी पूर्ण व्याख्या दो तीन लेखो में होगी. कृपया प्रतीक्षा करें.
स्मरण रहे के ध्यान लगाने से पहले कुछ विशेष परिवर्तन अनिवार्य नहीं तो आवश्यक हैं जिनकी जानकारी कुछ दिनों में चर्चा करेंगे.
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3>चमत्कार व् तप का भेद

चमत्कारों की इस युग की कसौटी यह है कि कौन व्यक्ति , वस्तु या घटना किस हद तक सदुद्देश्यपूर्ण, मानवता की सेवा करने वाली एवं धर्म मर्यादा के अनुकूल है। पिछले समय में साधु महात्माओं के सम्बन्ध में भी इसी प्रकार की मान्यता जन साधारण में रही है कि जो जितना पहुँचा हुआ फकीर-सिद्ध, महात्मा होगा, वह उतना ही चमत्कार दिखला सकेगा। इस गलत कसौटी के कारण अनेक सत्पुरुष, जो अपनी सत्य निष्ठा पर कायम रहे, जनता में सम्मान प्राप्त न कर सके और न किसी पर अपना प्रभाव जमा सके। इस असफलता से खिन्न होकर कई सत्पुरुषों ने मौन स्वीकृति से अपने चमत्कार होने की बात स्वीकार कर ली, और अनेक अपने भक्तों द्वारा गुण गाथा गाये जाने से सिद्ध बन गये, कुछ ने तो जान बूझकर इस प्रकार का आडम्बर स्वयं बना लिया। धूर्तों की इस अज्ञानान्धकार में खूब बन आई। आज भी अनेक साधु और महात्मा नामधारी ऐसे ही अड्डे जगह-जगह लगाये बैठे हैं।
सौभाग्यवश यह अज्ञानान्धकार का युग अब धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है और महापुरुषों की महानता का मूल्याँकन दूसरी कसौटी पर किया जाने लगा है। चमत्कारों की पुरानी, खोटी कसौटी पर तो केवल अज्ञान और धूर्तता की वृद्धि होना ही संभव है।

तप एक विज्ञान है और प्रत्येक विज्ञान एक शक्ति उत्पन्न करता है। कोई भी साधारण साधक या विशेष तपस्वी यदि साधना करता है, तो निश्चित है कि उसे अपने परिश्रम के अनुकूल आत्मबल प्राप्त होगा। जिस प्रकार बुद्धिबल, बाहुबल, धनबल, संगठनबल, पुण्यबल आदि बलों के द्वारा अनेक प्रकार की सफलताएं और परास्त और समृद्धि को वरण किया जा सकता है, उसी प्रकार तप द्वारा उत्पन्न आत्मबल के बदले में भी भौतिक एवं आध्यात्मिक समृद्धियाँ प्राप्त की जा सकती हैं। जप, अनुष्ठान, यज्ञ, दान आदि का यही रहस्य है। तप-साधना का विज्ञान यही है कि कोई मनुष्य चाहे तो स्वयं परिश्रम करके तप-शक्ति एकत्रित करे, या कोई तपस्वी किसी के दुख पर द्रवित होकर अपना पुण्यफल उसे दान करके सुखी बना दे। बस इतनी ही तप-शक्ति की मर्यादा है।

जो व्यक्ति लोगों को आश्चर्य में डालने वाली करामातें दिखाते हैं वे या तो धूर्त या मूर्ख होते हैं। एक दो करामात दिखाने में ही वर्षों की संचित तपस्या व्यय हो जाती है। केवल बाजीगर जैसा कौतुक करने में कोई बुद्धिमान व्यक्ति अपनी तपस्या के फल को निरर्थक नष्ट करेगा यह बात समझ में नहीं आती। यदि कोई करता है तो उसे अवश्य महामूर्ख समझा जायगा। अन्यथा ऐसे व्यक्ति में धूर्तता का छिपा होना निश्चित है। इस प्रकार की अगणित घटनाओं का भंडाफोड़ होते रहने के कारण जनता अब बहुत सतर्क हो गई है और उसने अपने महानता नापने के गज को ठीक कर लिया है। अब जनता उन व्यक्तियों तथा कार्यों में महानता का दर्शन करना चाहती है जिनमें स्वार्थत्याग, आत्मसंयम, परोपकार, लोकहित का कुछ अंश पाया जाता है

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4> गुरु हमारे ही अंतर में है

i गुरु हमारे ही अंतर में है जो इस शरीर व् मन को चलाने वाला है. हम उस "सुप्त" गुरु को कैसे
आवेदन करें के वह हमारा मार्ग दर्शन करे - उसी क्रिया को क्रियान्वित करने के लिए यह पृष्ठ प्रकाशित किया गया है. गुरु जरुरी नहीं के आपके सामने ही हो या पुस्तको के माध्यम से आपके पास आये. जब आप जाग्रत होने की इच्छा रखेंगे गुरु जाग्रत होगा और आपके सम्मुख होगा.

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14>|| वास्तव में कौन सोता+कौन जागता+एकाग्रता व् ध्यान+ब्रह्म है+आप भी जाल में फंसी+बहुमूल्य वस्तु क्या

14>|| वास्तव में कौन सोता+कौन जागता***( 1 to 6 )

1---------------------वास्तव में सुख से कौन सोता है? कौन जाग्रत है?
2---------------------कौन जागता है अथवा जाग्रत है?
3----------------------मन की एकाग्रता व् ध्यान?
4----------------------प्रत्येक आत्मा का अंश अव्यक्त ब्रह्म है।
5----------------------क्या आप भी जाल में फंसी मकड़ी जैसे तो नहीं?
6----------------------जीवन की सबसे कीमती व् बहुमूल्य वस्तु क्या है ?
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1>वास्तव में सुख से कौन सोता है? कौन जाग्रत है?

वास्तव में सुख से कौन सोता है? कौन जाग्रत है?
दो प्रश्न हैं और उनका उत्तर है जिनकी संक्षिप्त व्याख्या दो भागो में करते हैं .
पहले प्रश्न पर चलते हैं, दोनों का उत्तर पढ़ना आवश्यक है इस पूरी स्थिति को समझने के लिए.
वास्तव में कौन है जो समाधि निष्ठ हो कर सुख से सोता है?

वही व्यक्ति अथवा सत्ता जो परमात्मा के स्वरुप में हमारे ही अंतकरण में स्थित या स्थापित है! परमात्मा का एक "स्वरुप" ही हम हैं और वह ही सब करता है. "हम" कौन हैं फिर? "मै जो जाग्रत अवस्था में सोचता है, करता है, जिसे भूख प्यास लगती है हमारा अहंकार है जो हमें इस शरीर से जोड़कर उसी को "मै - हम" बना देता है. पर आत्मिक ज्ञान होने पर जब सब दीखता है तो ज्ञात होता है के जिस सत्ता को हम "मै " समझते थे, वह तो केवल एक हाड मांस का एक शरीर है जिसे चलाने वाला वही अंतकरण में स्थापित देव मूर्त परम आत्मा है; जिसे हम अनदेखा कर, इस शरीर व् मायावी संसार के चक्कर में, पाप पर पाप करते चले जाते हैं. याद रखे के इसीलिए हम सुख से नहीं सो पाते, क्यूंकि हमने पापो का इतना बोझ पीठ पर लाद रखा है के हम दुःख में ही रहते हैं पर जब हम उस अंतर स्थित स्थापित सत्ता से जुड़ जाते हैं और इस संसार के मायावी रूप के लबादे को उतार कर, हलके फुल्के हो जाते हैं; अपने पाप कर्मो पर दृष्टि डालते हैं तब हम जिस स्थिति व् अवस्था में होंगे वहां न कोई चिंता होगी न किसी पाप कर्म का बोझ होगा न कभी न पूरी होने वाली इच्छाओ, स्वरूपी राक्षसो का भय होगा, तब हम अपने उस स्वरुप में सम्मलित होकर एक ही रूप में होंगे और वह ही हमारा वास्तविक रूप है, ये जो दीखता है वह तो उसी स्वरूप के भावो का प्रत्यक्ष प्रतिरूप है. जब इस बाहरी रुप को उस आंतरिक स्वरुप से जोड़ देंगे तो हमें इस संसार से कोई विशेष लालच ,मोह या जुड़ाव नहीं रहेगा. इसीलिए "मै " और "सत्ता" सुख से सोएँगे.

+ कौन जागता है के लिए दूसरा भाग पढ़े

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2>कौन जागता है अथवा जाग्रत है?

वही व्यक्ति जिसे सत्य व् असत्य का विवेक व् ज्ञान है. प्रश्न उठेगा के सत्य क्या है व् असत्य क्या है ?
जो जो दृश्य आँखों से दीखते हैं वो असत्य है !
वह जो हमारा आंतरिक स्वरूप व् अंतकरण में स्थित सत्ता देख रही है, वह ही सत्य है!

अब बाहरी दृश्य देखने वाला मन पूछेगा ये कैसे हो सकता है ये जो दिख रहा है - ये सत्य क्यों नहीं है? ये सत्य नहीं है, ये केवल दृश्य जगत का आभास है, प्रकृति है, जड़वत माया है; जो भौतिक, रासायनिक पदार्थो व् तत्वों का सम्मोहन मात्र है - इसे केवल एक अर्ध मूर्ख, आध्यात्मिक दृष्टिकोण से मूर्ख, ही सत्य कहेगा. जो आपको इस प्रकृति के दृश्यों को सच बताता हो, उसका आदर सत्कार करना पर उसकी बात को स्वीकार न करें.
सत्ता जो इस प्रकृति व् तत्वों के माया जाल को चलाती है, केवल वह ही सत्य देख पाती है.
तो उस सत्य को पहले देखना होगा, जब तक आप उस सत्य को न देख पाएं, आपको सब सच पता है इस अहंकार में पड़े रहने से आप अपने को सिद्ध न कर पाओगे।
ये सत्य नहीं है जो दिख रहा है.
जो घटित हो रहा है, और घटित करने वाली सत्ता ही सत्य है और जो कर्म व् परिवर्तन कर रही है वह ही सत्य है. जब तक आप उस सत्ता में स्थापित न होंगे, सत्य को देख पाने की बाते करना मूर्खता नहीं तो क्या है?
तो ये जो लोग अपने को सत्य - सच देखता बता रहें हैं उनमे और जड़वत वृक्ष, या ऊँठ, बैल या चिड़िया में कोई अधिक अंतर नहीं है.

अब आते हैं असत्य पर। असत्य क्या है? यहाँ तक यदि आपका चित "मेरे" साथ है तो असत्य को झूठ, फरेब; एक मूर्ख शरीर या जीवन की समझ न रखने वाले, "चिंतक" विचारक की दृष्टि से सांसारिक सच समझने वाले इस संसार के मूर्खो का सत्य है। बोलो स्वामी मूर्खानंद की जय. बोलो झूठे भगवन, ईश्वर, खुदा व् गॉड को बेचने वाले दुकानदारो की जय.

यह संसार जो हमारे आसपास घटित हो रहा है, ये जो आज हमें लग रहा है के कुछ चल रहा है या कुछ "हो" रहा है, परिवर्तनशील समय है जो मनुष्य के समय को नापने का एक उपकरण मात्र है, चित या चेतक सत्ताओ का कार्य शील मंच है, जो लगता है के जैसे वो हम हैं. ये कार्य शील कार्य रत्त चेतन या अचेतन इस प्रकृति में विचरण करते आत्मा हैं जो अपने पूर्व कर्मो के अनुसार, अपने उपयुक्त समय के अंश में, अपने निर्णय ले कर, जो करते हैं पर हमें ऐसा प्रतीत मात्र होता है के हम कर रहें हैं, ही असत्य है.
तो असत्य हमें दीखता है जिसे हम अपने द्वारा निर्मित या कार्यान्वित सत्य समझते हैं वह ही सत्य जैसा माया है, 'हमारी' स्थिति एक मकड़ी जैसी है जो लगातार जाल बुन रही है, यह जाल जितना अधिक गहरा और जटिल होगा, उतना ही जटिल उसमे से निकलना होगा।
हमें भूलना नहीं चाहियें के इस जीवन का उद्देश्य मूर्खतापूर्वक अपने को या किसी को भी किसी जाल में बुनना या फंसाना नहीं है अपितु इस बहुमूल्य जीवन रूपी विचरण व् अवस्था को अपने आप को जानने में लगाना है और सब जानकार अपने अंतर चित को ध्यान लगा कर अपने पूर्व कर्मो का समाधान ढूंढकर उनका प्रायश्चित करना है ताकि हम उन पूर्व कर्मो को, अच्छे या बुरे, अपने आत्मा के केंद्र से एक एक कर दूर करते रहें.

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3>मन की एकाग्रता व् ध्यान?

चित्त को एकाग्र करके किसी एक वस्तु पर केन्द्रित कर देना ध्यान कहलाता है। ध्यान एक क्रिया है जिसमें व्यक्ति अपने मन को चेतना की एक विशेष अवस्था में लाने का प्रयत्न करता है। ध्यान का उद्देश्य कोई लाभ प्राप्त करना हो सकता है या ध्यान करना अपने-आप में एक लक्ष्य हो सकता है। 'ध्यान' से अनेकों प्रकार की क्रियाओं का बोध होता है। इसमें मन को विशान्ति देने की सरल तकनीक से लेकर आन्तरिक ऊर्जा या जीवन-शक्ति, प्राण का निर्माण तथा करुणा, प्रेम, धैर्य, उदारता, क्षमा आदि गुणों का विकास आदि सब समाहित हैं।
ध्यान की अवस्था में ध्यान करने वाला अपने आसपास के वातावरण को तथा स्वयं को भी भूल जाता है। ध्यान करने से आत्मिक तथा मानसिक शक्तियों का विकास होता है। जिस वस्तु को चित मे बांधा जाता है उस मे इस प्रकार से लगा दें कि बाह्य प्रभाव होने पर भी वह वहाँ से अन्यत्र न हट सके, उसे ध्यान कहते है।
ध्यान से हमे अपने जीवन का उद्देश्य समझने में सहायता मिलती है। इसी तरह किसी कार्य का उद्देश्य एवं महत्ता का सही ज्ञान हो पाता है।
मन की यही प्रकृति है कि वह छोटी-छोटी अर्थहीन बातों को बडा करके गंभीर समस्यायों के रूप में बदल देता है। ध्यान से अर्थहीन बातों की समझ बढ जाती है; हम उनकी चिन्ता करना छोड देते हैं; सदा बडी तस्वीर देखने के अभ्यस्त हो जाते हैं।
मन शान्त होने पर उत्पादक शक्ति बढती है; शरीर की रोग-प्रतिरोधी शक्ति में वृद्धि, रक्तचाप में कमी, तनाव में कमी, स्मृति-क्षय में कमी (स्मरण शक्ति में वृद्धि), वृद्ध होने की गति में कमी जैसे लाभ होते हैं।

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4>प्रत्येक आत्मा का अंश अव्यक्त ब्रह्म है।

बाह्य एवं अन्तःप्रकृति को वशीभूत कर आत्मा के इस ब्रह्म भाव को व्यक्त करना ही जीवन का चरम लक्ष्य है

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5>क्या आप भी जाल में फंसी मकड़ी जैसे तो नहीं?

क्या आप भी जाल में फंसी मकड़ी जैसे तो नहीं? एक महत्वपूर्ण सूचना आपके भविष्य के लिए ?

भारत में १९९० तक सामाजिक आर्थिक व्यवस्था में उपभोग पर इतना जोर नहीं दिया जाता था क्यूंकि लोगो में अपनी प्राथमिक आवश्यकताओं को पूरा करने में ही अधिक समय लगता था. १९९१ के बाद भारत के लोगो को उपभोक्ता बनाने के लिए प्रयास शुरू हुए और अगर आप ध्यान लगाए तो देखेंगे के जो आदमी या परिवार उपभोग के चक्करव्यूह में एक बार फंसगया उसकी स्थिति जाल में फंसी मकड़ी जैसी हो जाती है।
आज भारत के ४० % लोग पूर्ण रूप से उपभोक्ता बन चुके हैं. रेडियो,टीवी व् छपा मीडिया व् झूट और अफवाहों द्वारा एक चित्र बनाया जाता है जिसमे आपको कुछ लुभावने दृश्य दिखाए जाते हैं के कैसे आपका जीवन एक मनोरम व् सुंदर आरामदायक स्वर्ग बन जायेगा, लेकिन याद रखें की हर चीज़, वस्तु व् सेवा का उपभोग अगर एक छोटी ख़ुशी देने का वायदा करता है , उसके बदले में वो ३ या ५ गुना दुःख भी देकर जाएगा।
यह याद रखे और प्रयास करें व् एक सूची तैयार करें और देखें के ८६% उपभोग के सामान व् सेवाएं आपको कभी भी कोई सुख नहीं दे पायीं बल्कि उनसे दुःख अधिक मिला है. ये छोटे छोटे सुख या "मजा" जो विज्ञापन प्रेरित करते हैं , ये केवल शरीर तक ही सीमित हैं
और इनसे कभी कोई "आनंद" प्राप्त नहीं होगा. यद्यपि आरम्भ में लगेगा के बहुत सुख और "मजा" आया लेकिन उसके पीछे छिपे दुःख आप कभी देख नहीं पाते। यदि आप चिरस्थायी अनंत आनंद को चाहते हैं तो आज से अपने को भोक्ता, उपभोक्ता व् चक्करव्यूह में फंसी मकड़ी बनाने की अपेक्षा, अपने को इन उपभोग के संसाधनो से दूर रखने की चेष्टा करें; आप देखेंगे के आपके जीवन की ८६% मुसीबते, दुःख व् गन्दी आदतो की समाप्ति होनी आरम्भ होगी.
भारत के लोगो को जिन झूठे सपनो को दिखाकर कुछ मक्कार व् चालाक लोग अपने आप को कुबेर बनाने में लगे हैं और ये पूरा तंत्र व् "सिस्टम" केवल आपको गुलाम, दास बनाकर आपसे जीवन भर कोल्हू के बैल, जिसके गले में फंदा डालकर १२ घंटे कोल्हू के चक्के को उठाकर, एक छोटे दायरे या परिधि में घुमा कर काम करवाया जाता था, की तरह काम लिया जायेगा. कृपया इस विषय पर विचार करे.
इन झूठे, चमकते लोगों, विज्ञापनों, टीवी के कार्यक्रमों व् कहानिओं को सच ना समझें, ये सब हमें भ्रमित कर हमें अपने चंगुल में फंसाने के उपाय हैं जो चालाक और पापी प्रवृति के लोगो द्वारा कल युग की अति माया वादी संस्कृति का तामसिक जाल हैं. कृपा कर इस पुरे प्रकरण को अपने जीवन का भाग नहीं बनाएं। इन सब संसाधनो व् व्यवस्था के ताने बाने में आपको कभी कोई संतोष या आनंद प्राप्त नहीं होगा.
आज से इस बात पर मनन करें के क्या आप एक उपभोक्ता बन चुके हैं या बनने की श्रेणी में हैं या आप इस पर पहले से ही प्रश्न कर रहे थे.
मैंने इस संसार के कई चक्कर लगाए, निर्धन से "अति विकसित" देशो व् समाजो को बहुत पास से देखा और मुझे आज तक कोई उपभोग में रचा बसा समाज खुश नहीं दिखा। भारत एक अति विकसित व् स्वयं निर्भर समाज था और इसे उपभोक्ता बनाकर जो जाल बुना जा रहा है
उसका अंत बहुत बुरा होगा। आज जो अपने को विकसित व् बहुत उन्नत हैं उन समाजो की दरिद्रता केवल एक अंतर्मन से जाग्रत आत्मा ही देख
सकता है. आज जितने भी महा विकसित कहे जाने वाले देश हैं वह कर्जे में दबे, बीमारियो के शिकार, अति दुखी उपभोक्ता हैं जहाँ ख़ुशी को भौतिक सामान व् वस्तुओं में तलाशने के प्रयास किये जाते हैं, परन्तु वहां अँधेरे, नाकामी, अवसाद, निराशा व् शक्तिहीनता के अतिरिक्त कुछ भी नहीं मिलता।
अपने को इस माया जाल से मुक्त करें.
अपने शरीर को उपभोग व् भोग की वस्तुओं से छुटकारा दिलाएं और ऐसा करने पर आत्मा तक पहुँचने का रास्ता आसान होगा.
कृपया सोचें, अपने मित्रो व् प्रिय लोगो को इस सन्देश को पहुंचाए और अपने को इस मायावादी राक्षस भौतिकवाद निर्मित उपभोग संस्कृति
से मुक्त करें.

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6>जीवन की सबसे कीमती व् बहुमूल्य वस्तु क्या है ?

हमारे वर्तमान जीवन की एकमात्र संपत्ति समय है जिसे उतना ही पकड़ा जा सकता है जितना अपने हाथों में मुट्ठी भर पानी पकड़ सकते हैं.

अपने समय का दुरुपयोग न करें नहीं तो समय हमसे दुर्व्यवहार व् हमारा ही दुरूपयोग करेगा।

हो सकता है जो समय हम उपयोग में नहीं ला रहे वह समय का भाग शायद दोबारा वहां हो ही नहीं; जब हमें उसकी सख्त आवश्यकता पड़ेगी।
ये जो समय "हमारा" है ये हमारे हाथ में सदैव नहीं रहने वाला न ये कोई कीमती धातु या पत्थर की भांति किसी तिजोरी में बंद कर के रखा सकता है के चलो आज तो हम इसे रख दें या गवां दे, कल इसे फिर से प्रयोग में लाएंगे.. कल जो आने वाला है उसमे यह समय की पूँजी जो आज हाथ में है वहां नहीं होगी.
ये पूंजी केवल दिन में अर्थात आज के दिन में सिर्फ एक बार ही मिलेगी. ये जो आज है न ये बड़ा बेशकीमती है ये जमाने व् दुनिया भर की दौलत भी नहीं खरीद पायेगी। इसकी कीमत व् मूल्य सिर्फ वह ही जान सकता है जिसने सिर्फ कुछ मिनटों या घंटो के कारण अपना बहुत या सब कुछ खो दिया हो. इससे ज्यादा कीमती व् बहुमूल्य वस्तु आप के हाथ कभी नहीं आ सकती।
आज जो प्रेम अपने अंदर है आज जो सोच, विचार व् अच्छा अवसर हमारे मन या हाथ में है कल वो वहां नहीं मिलने वाला।
इसलिए उठो अपनी एकमात्र मूल्यवान परिसंपत्ति का मूल्य जानो व् इसकी कीमत का आकलन करना सीखो। जिसका पूर्णअधिकार अभी अपने हाथ में है
ये जो पैसा रुपया, कीमती चीज़े या आदमी की बनाये वस्तुएं हैं ये तो कभी भी खरीदी जा सकती हैं और सदैव कहीं न कहीं से प्राप्त हो जाएंगी पर मूल्यवान समय कहीं नहीं मिलेगा किसी भी कीमत पर.
मात्र सस्ते या महंगे मनोरंजन, बेकार गतिविधियों, चीजों के संग्रह, या कब्जे या अस्थायी सपनों का या किसी सुन्दर सूरत का पीछा करते हुए इस जीवन के कीमती मोती बरबाद मत करो। यह सब जल पर बहते अस्थायी बुलबुले हैं.
इस जीवन को और इस आज के इस पल व् टाइम, वक़्त या समय को जीवन को देखने व् समझने के लिए एक अवसर के रूप में देखें अब तक की गलत या अवांछनीय शिक्षाओं को अपने अंतर्मन से निकाले कर फेंके, जो गुजर चुका , अच्छा या बुरा उसे भुला दें, और फिर ध्यान देते हैं अंतर्मन के ध्यान पर जिसका वास्तविक लक्ष्य जीवन में आध्यात्मिक उन्नति के लिए नजर डालना हैं। आत्मा का ज्ञान ही असली ज्ञान है. शेष जो भी है वो यूँ ही गुजर जाएगा जिसका कोई वास्तविक मूल्य न रहेगा, पर आत्मिक ज्ञान प्राप्त होने पर जीवन में एक खजाना मिलेगा जो आपकी स्थायी पूंजी व् निधि होगी जो कभी
कोई भी न चुरा सकेगा न मिटा सकेगा. अगर आप अपने जीवन में सम्पूर्ण बदलाव लाने के लिए उत्सुक हों तो मेरे साथ विचार व् मनन करें और धीरे धीरे आपको एक ज्योति दिखने लगेगी जो अंतकरण की यात्रा करते हुए ब्रह्म ज्ञान तक भी ले जा सकती है.
इस आध्यात्मिक प्रक्रिया को करने से आप अपने सारे लक्ष्य सिद्ध कर सकते हैं और अपने और अपने आसपास के वातावरण को अर्थपूर्ण बना सकते हैं.

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13>परमात्मा कौन++जड़भरत

13>***परमात्मा कौन***( 1 to 5 )

1---------------------यह परमात्मा कौन है?
2---------------------उसने तो सब कुछ दिया था मगर मेरे ही हाथ छोटे निकले
3---------------------सुंदरता किसी रंग में नहीं होती
4---------------------बुद्धि से ईश्वर प्राप्ति हो सकती है यदि
5---------------------जड़भरत नामक एक अति आध्यात्मिक पुरुष
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1>यह परमात्मा कौन है?

महान आत्मा के रूप में जाना जाता है यह आत्मा का वास्तविक स्वरुप ही है

ये कहाँ है?

स्वयं के चेतन मन से थोड़ा दूर आप के भीतर आपसे अनजान आपके अंतकरण में ही है.

इसे कैसे देखते हैं?
भौतिक शरीर की आँखें इसे नहीं देख पाती यद्द्पि इसका विस्तार प्रति क्षण दीखता रहता है. अंतकरण, अपने भीतर की आंख है , अथवा भीतर आत्मा की आँखें, अपनी बाहरी आँखे बंद करें, जब आप बाहरी विस्तार और भौतिक पदार्थ की दुनिया से निकल जाए तो एक छोटा सा रास्ता एक बहुत ही शांत और ठन्डे हरे भरे वातावरण में ले जायेगा जहाँ नीले और बैंगनी प्रकाश के ऊपर अंत में एक सफ़ेद प्रकाश का एक मंदिर होगा जहाँ पहुँच कर सब अति शांत हो जाता है मन यहीं समाप्त होगा और आत्मा का स्वरुप प्रकट होता है ।
यहाँ का विस्तार बहुत विशाल और अंतहीन है और यहाँ सशरीर विचरण तभी सम्भव है जब आप अंतकरण को जागृत रखें.

इस संसार रूपी अपार समुद्र में मुझ डूबते के लिए कौन सा आश्रय है?
सम्पूर्ण जगत के परमात्मा के केंद्र के अप्रकाशित प्रकाश का एक छोटा सा अंश भी एक नौका के समान है जो एक बार पकड़ ले तो आपको कभी डूबने नहीं देगा।

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2>उसने तो सब कुछ दिया था मगर मेरे ही हाथ छोटे निकले 

उसने तो सब कुछ ठीक ही किया था // मै ही अपने रस्ते से हटता दिशा बदलता रहा

उसने तो कोई बेवफाई न की थी मगर // मेरी ही मोहब्बत में कमी रहती रही

लीला लौकिक अलौकिक उसी की थी // मै उसे अपना चमत्कार समझता रह गया
मै मूर्ख समर्पित न कर सका उसे सब कुछ // एक खाली बर्तन जैसा रह गया

वहां से तो निर्मल झरने जैसे निकला था // हर रास्ते में गंदगी उँड़ेलता रह गया
तूने मुझे अपनापन दिया प्रेम से भरे रखा // मै ही नफरत के जहर पी पी कर बेहोश होता रह गया

तूने जगत के हर कण में जगमग भर दी // मै अपने अंधेरो में ही फंसा रह गया
तूने संसार के हर कोने को संगीतमय कर दिया // एक बांसुरी से लाखो सुर निकले
इक तार से हजार स्वर निकले // कण कण में वाद्य हर बूँद में गीत छिपे
तेरे पल पल में लय और सुर ताल है // मै बेसुरे राग अलाप्ता रह गया

तूने अपनी रहमत और दया की बारिश कर दी लेकिन // मै ही बेजान चीज़ो से घर भरता रहा
दरवाजे पर आये भिक्षुक रूप को भगाता रह गया // तूने कितने रूप दिखाकर मुझ भटके को रास्ता दिखाना चाहा
मै आत्मा पर बड़े बोझ तले दबा सा रह गया

तूने मुझे पंख दिए उड़ने को उंचाईयो पर /मै संसार की गहराईओं में उड़ना सीखता ही रह गया
तू तो स्वयं ही मुझ में समाया था हर पल हर समय // मै ही मंदिरो मस्जिदो में माथा रगड़ता रह गया।

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3>सुंदरता किसी रंग में नहीं होती

रंग केवल आंतरिक आत्मिक सुंदरता को परिभाषित करते हैं. // सुंदरता किसी व्यक्ति, समय, स्थान में नहीं होती
वह केवल हमारी आत्मा की आँखों में होती है // जिसे हम सुंदरता समझते हैं वह हमारी उस समय की
आवश्यक्ता व् लालसा होती है, इसलिए बाहरी सुंदरता के पीछे भागना // मूर्खता का बोध है।
सुंदरता को बाहरी दो आँखों से कभी ना देखें // अपने अंदर की सुंदरता को खोजने के लिए ध्यान लगाएं
पहले कृष्ण अंधकार को समझे और उसकी स्थायी सुंदरता को देखें
तत्पश्चात लाल रंग को लाएं, फिर नारंगी रंग को देखें // उसके बाद पीतवर्ण, सुवर्ण पीले रंग को ध्यान में लाएं
धीरे धीरे कुछ दिनों के बाद आपको पीले से हरे सब्ज रंग में जाना है
इसके बाद समुद्र और आकाश के नीले रंग को ध्यान में लाएं // एक फूल की पँखुडिओ और उनकी चमक को देखें
केंद्रित मन से आप अपने अंदर छिपी सुंदरता को जब देखना आरम्भ
करेंगे तो बाहर फैली सुंदरता ऐसे दिखेगी जैसे कहीं मिटटी गारे में दबा हीरा // छिप्पा होता है.

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4>बुद्धि से ईश्वर प्राप्ति हो सकती है यदि


भाई जी बुद्धि से ईश्वर प्राप्ति हो सकती है यदि आप को ज्ञान और ज्ञान व् अविद्या का भेद पता हो. आज जितने भी कथित धर्म जो बेचे जा रहें हैं ये सब मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट यानि बनाये गए उत्पादन हैं जो पहले से ही जड़ व्यक्ति को और अधिक जड़ बनाते हैं. इसी बुद्धि को दुरूपयोग में ला ये मजहब रिलिजन व् धर्म बेचने वाले साधारण मनुष्य को मूर्ख सिद्ध करते हैं. इसलिए बुद्धि पर भरोसा नहीं किया जा सकता। वास्विक गहन ज्ञान जब होगा तो बुद्धि यदि आत्मिक अंश
को समझ उसे अनुभूत करने का प्रयास करे तो ऐसा संभव है. आत्मिक चैतन्य मनुष्य की साधारण बुद्धि से बहुत पर एक अलग डायमेंशन या संसार है
जहाँ स्थूल विचार व् दृश्य या झूठ मूठ के धर्म आदि न हों और इसमें प्रवेश करने के लिए सत्यत बुद्धि के छोटे से दायरे से निकलना बहुत आवश्यक भी है और
आवश्यकता भी. इसलिए बाह्र्य व् झूट मूठ के इस संसार के अधिकतर प्रपंच आदमी को और जड़ बनाने के लिए कुछ मूर्ख प्राणिओ द्वारा रचित नाटक हैं
जो लगते तो सच हैं पर वो खोखले व् मिटटी के ढेर जैसे हैं. इसीलिए आत्मिक यात्रा को शरीर व् इसी साधरण बुद्धि से तुलनात्मक रूप में भी नहीं देखा जा सकता. ये एक ऐसा प्रश्न है जिस पर हम सभी को बहुत मनन करना है और आडम्बरो से लिप्त इस प्लास्टिक सुंदरता वाले संसार से पीछा छुड़ाना है.

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5> जड़भरत नामक एक अति आध्यात्मिक पुरुष

एक दूसरे युग में जड़भरत नामक एक अति आध्यात्मिक पुरुष हुए. जैसे शराब का नशा तामसिक और अन्न का नशा रजस उसी तरह वैराग्य व् अध्यात्म का नशा सात्विक होता है. जड़भरत के परिवार व् मित्र उन्हें नकारा समझते थे, वह कैसे उनकी दुनिया को समझ सकते थे ! एक बार जड़भरत जी अपने वैराग में कहीं चले जा रहे थे और कुछ डाकू उन्हें बलि देने के लिए जबरदस्ती पकड़ कर अपने सरदार के पास ले गए । जड़भरत जी ने कोई विरोध नहीं किया पर उनके मुख से तेज व् प्रकाश के होने से उन्होंने सोचा के इन्ही महापुरुष से दिखने वाले व्यक्ति की बलि देने से देवी खुश होगी।
डाकू के पुरोहित बने ठग ने उन्हें मारने के लिए, भद्रकाली देवी को पुकारा, प्रार्थना कर एक भयानक कटार निकाली, जड़भरत जी ने इस पर भी कोई प्रार्थना नहीं की, और वह मुस्कुराते रहे के चलो ईश्वर के दर्शनों का समय आया है, आत्मा के तेज प्रकाश की ज्वाला इतनी तीव्र थी की देवी तक उनका तेज पहुँच गया और उसी समय देवी प्रकट हो गयी और उन्हें उन मूर्ख व् जड़बुद्धि बलि देने वालो को अपने क्रोध से श्राप दिया और अपने उच्च ज्वलित रूप से उन्होंने सारे दुष्ट दस्यु गिरोह के शरीरो को समाप्त कर दिया। देवी ने जड़भरत जी से कोई वरदान मांगने को कहा तो उन्होंने सोचा और मना करने लगे; तब देवी के कहने पर उन्हें उन डाकुओ को जीवित करने का वरदान माँगा। देवी जो धरती जैसे मानवीय गृह में इस प्रकार के देव पुरुष को देख कर चकित थी, उसने मांगे गए वरदान को पूर्ण किया.
अपने प्राण लेने वाले दुष्टो के प्रति यह दया व् सद्भावना देखकर सभी डाकू दहाड़े मार मार कर बालको की तरह रो पड़े, अपने अपने हथियार फेंके और साध लिया के उस समय पश्चात कोई अपराध या किसी को भी दुःख नहीं देंगे, उनके पैरो पड़े और क्षमा मांगी।
भगवत गीता में भी जड़भरत की चर्चा की गई है.
इन्ही त्यागी जड़भरत जी एक बार एक राजा के यहाँ नौकरी के लिए रखे गए और उन्हें राजा की पालकी उठाने वाले कहार का काम दिया गया अब एक आध्यात्मिक जगत में रहने वाले बेचारे साध को किसी बात की चिंता नहीं थी जो भी मिलता ठीक था.
एक बार राजा की पालकी लिए कहार चले तो जड़भरत जी नीचे देख देख कर चल रहे थे कहीं कोई जीव पैरो तले न दब जाये इस प्रकार वे देख देख कर चलने के कारण बाकी कहारों से उनकी चाल से मेल न होने से पालकी उलटी सीधी होने लगी और डगमगा उठी.
अब राजा को ये देख बहुत बुरा लगा और क्रोध में आ कर कहार को बुरा भला कहा और उसे मार डालने की धमकी दी। जड़भरत जी पर राजा की क्रोध पूर्ण बात का कोई असर न हुआ और बोले : " हे राजन, कौन ऊपर है कौन नीचे है , मुझ पर पालकी है, और आप पालकी पर, आप पर छत , और छत पर आकाश, मारेंगे तो किसे मारेंगे ? आत्मा तो अजर अमर है और ये शरीर तो नाशवान है "
राजा रहुगुण जी इन शब्दों को सुनकर अपनी पालकी से वहीँ कूद पड़े, और उन्हें आगे कुछ बात की और उन्हें पता लगा के बहुत गलती हो गयी है ये तो महात्मा हैं कहार के रूप में और झट से उनके चरणो में गिर पड़े और ज्ञान की भीक देने की प्रार्थना की।
जड़भरत जी को राजा पर दया व करुणा आई और उन्हें उपदेश दिया, राजा को आत्मिक भेद व अध्यात्मिक जीवन की गहराईओं का ज्ञान हुआ और राजा ने वैराग्य लेकर परम आत्मा की प्राप्ति की.
इस संसार के पदार्थो में आसक्ति ना होना ही वैराग्य होता है. वैराग का अर्थ केवल घर संसार छोड़ना या पीले, भगवे वस्त्र पहनना नहीं है बल्कि इस संसार के सभी सुखो, साधनो व् पदार्थो के होने या न होने या होते हुए भी उनमे आसक्ति व मोह का ना होना ही वास्तविक वैराग्य है.

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12>जीवनका मूल्य+বিশ্বাসই বড়োধন+क्रोधाग्नि+गरीबीकेकारण+उपायघरमेंसुखसमृद्धि+आध्यात्मिकशिक्षा+येहीसत्यहैं+

12 >|| *जीवनकामूल्य+বিশ্বাসইবড়োধন+क्रोधाग्नि***( 1 to 8)

1---------------------जीवन का मूल्य :
        1/a>प्राण क्या है , प्राण किसे कहते है ?
2----------------------বিশ্বাসই বড়ো ধন
3----------------------क्रोधाग्नि=क्रोध भी ज़रूरी, किन्तु समयसे।
4----------------------आज आपको गरीबी आने के कुछ कारण बताता हु ।
5-----------------------उपाय जो आपके घर में लाएंगे सुख-समृद्धि
6----------------------आध्यात्मिक शिक्षा का महत्व
7------------------------ |||||| "ये ही सत्य हैं" |||||
8------------------------जीवन का लेखा जोखा........

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 1>जीवन का मूल्य :
एक आदमी ने गुरुनानक साहब से पुछा : गुरूजी, जीवन का मूल्य क्या है?
गुरूनानक ने उसे एक Stone दिया और कहा : जा और इस stone का  मूल्य पता करके आ , लेकिन ध्यान रखना stone को बेचना नही है I
वह आदमी stone को बाजार मे
एक संतरे वाले के पास लेकर गया और बोला :
इसकी कीमत क्या है? संतरे वाला चमकीले stone को देख कर बोला, "12 संतरे  लेजा और इसे मुझे दे जा। "
आगे एक सब्जी वाले ने
उस चमकीले stone को देखा और कहा "एक बोरी आलू ले जा और  इस stone को मेरे पास छोड़ जा"
आगे एक सोना बेचने वाले के पास गया
उसे stoneदिखाया सुनार उस चमकीले stone को देखकर बोला, "50 लाख मे बेच दे" l
उसने मना कर दिया तो सुनार बोला "2 करोड़ मे दे दे या बता इसकी कीमत जो माँगेगा वह दूँगा तुझे..
उस आदमी ने सुनार से कहा मेरे गुरू ने इसे बेचने से मना किया है l
आगे हीरे बेचने वाले एक जौहरी के पास गया उसे stone दिखाया l
जौहरी ने जब उस बेसकीमती रुबी को देखा , तो पहले उसने रुबी के पास एक लाल कपडा  बिछाया फिर उस बेसकीमती रुबी की परिक्रमा लगाई माथा टेका l फिर जौहरी बोला ,
"कहा से लाया है ये बेसकीमती रुबी? सारी कायनात , सारी दुनिया को बेचकर भी इसकी कीमत  नही लगाई जा सकती ये तो बेसकीमती है l"
वह आदमी हैरान परेशान होकर सीधे गुरू के पास आया l
अपनी आप बिती बताई और बोला "अब बताओ गुरूजी, मानवीय जीवन का मूल्य क्या है?
गुरूनानक बोले : संतरे वाले को दिखाया उसने इसकी कीमत "12 संतरे" की बताई l
सब्जी वाले के पास गया उसने इसकी कीमत "1 बोरी आलू" बताई l आगे सुनार ने "2 करोड़" बताई l
और जौहरी ने इसे "बेसकीमती" बताया l अब ऐसा ही मानवीय मूल्य का भी है l तू बेशक हीरा है..!!
लेकिन, सामने वाला तेरी कीमत, अपनी औकात - अपनी जानकारी - अपनी हैसियत से लगाएगा।
घबराओ मत दुनिया में.. तुझे पहचानने वाले भी मिल जायेगे।
Respect Yourself, You are very Unique..
-----------------------------------------------------
1/a>प्राण क्या है , प्राण किसे कहते है ?

 हमने बहुत बार अपने जीवन में व्यवहारिक रूपसे “प्राण” शब्द का उपयोग किया है

, परंतु हमे प्राण की वास्तविकता के बारे मे शायद ही पता हो , अथवा तो हम भ्रांति
से यह मानते है की प्राण का अर्थ जीव या जीवात्मा होता है , परंतु यह सत्य नही
है , प्राण वायु का एक रूप है , जब हवा आकाश में चलती है तो उसे वायु कहते है
, जब यही वायु हमारे शरीर में 10 भागों में काम करती है तो इसे “प्राण” कहते
है , वायु का पर्यायवाचि नाम ही प्राण है ।
मूल प्रकृति के स्पर्श गुण-वाले वायु में रज गुण प्रदान होने से वह चंचल ,
गतिशील और अद्रश्य है । पंच महाभूतों में प्रमुख तत्व वायु है । वात् , पित्त
कफ में वायु बलिष्ठ है , शरीर में हाथ-पाँव आदि कर्मेन्द्रियाँ , नेत्र -
श्रोत्र आदि ज्ञानेन्द्रियाँ तथा अन्य सब अवयव -अंग इस प्राण से ही शक्ति पाकर
समस्त कार्यों का संपादन करते है . वह अति सूक्ष्म होने से सूक्ष्म छिद्रों
में प्रविष्टित हो जाता है । प्राण को रुद्र और ब्रह्म भी कहते है ।
प्राण से ही भोजन का पाचन , रस , रक्त , माँस , मेद , अस्थि , मज्जा , वीर्य ,
रज , ओज , आदि धातुओं का निर्माण , फल्गु ( व्यर्थ ) पदार्थो का शरीर से बाहर
निकलना , उठना , बैठना , चलना , बोलना , चिंतन-मनन-स्मरण-ध्यान आदि समस्त स्थूल
व् सूक्ष्म क्रियाएँ होती है . प्राण की न्यूनता-निर्बलता होने पर शरीर के अवयव
( अंग-प्रत्यंग-इन्द्रियाँ आदि ) शिथिल व रुग्ण हो जाते है . प्राण के बलवान्
होने पर समस्त शरीर के अवयवों में बल , पराक्रम
आते है और पुरुषार्थ , साहस , उत्साह , धैर्य ,आशा , प्रसन्नता , तप , क्षमा
आदि की प्रवृति होती है .
शरीर के बलवान् , पुष्ट , सुगठित , सुन्दर , लावण्ययुक्त , निरोग व दीर्घायु
होने पर ही लौकिक व आध्यात्मिक लक्ष्यों की पूर्ति हो सकती है . इसलिए हमें
प्राणों की रक्षा करनी चाहिए अर्थात शुद्ध आहार , प्रगाढ़ निंद्रा , ब्रह्मचर्य
, प्राणायाम आदि के माध्यम से शरीर को प्राणवान् बनाना चाहिए .
परमपिता परमात्मा द्वारा निर्मित १६ कलाओं में एक कला प्राण भी है . ईश्वर इस
प्राण को जीवात्मा के उपयोग के लिए प्रदान करता है . ज्यों ही जीवात्मा किसी
शरीर में प्रवेश करता है , प्राण भी उसके साथ शरीर में प्रवेश कर जाता है तथा
ज्यों ही जीवात्मा किसी शरीर से निकलता है , प्राण भी उसके साथ निकल जाता है .
श्रुष्टि की आदि में परमात्मा ने सभी जीवो को सूक्ष्म शरीर और प्राण दिया जिससे
जीवात्मा प्रकृति से संयुक्त होकर शरीर धारण करता है । सजीव प्राणी नाक से
श्वास लेता है , तब वायु कण्ठ में जाकर विशिष्ठ रचना से वायु का
दश विभाग हो जाता है । शरीर में विशिष्ठ स्थान और कार्य से प्राण के विविध नाम
हो जाते है ।
प्रस्तुत चित्र में प्राणों के विभाग , नाम , स्थान , तथा कार्यों का वर्णन
किया गया है .
मुख्य प्राण ५ बताए गए है जिनके नाम इस प्रकार है ,
१. प्राण ,
२. अपान,
३. समान,
४. उदान
५. व्यान
और उपप्राण भी पाँच बताये गए है ,
१. नाग
२. कुर्म
३. कृकल
४. देवदत
५. धनज्जय
मुख्य प्राण :-
१. प्राण :- इसका स्थान नासिका से ह्रदय तक है . नेत्र , श्रोत्र , मुख आदि
अवयव इसी के सहयोग से कार्य करते है . यह सभी प्राणों का राजा है . जैसे राजा
अपने अधिकारीयों को विभिन्न स्थानों पर विभिन्न कार्यों के लिये
नियुक्त करता है , वैसे ही यह भी अन्य अपान आदि प्राणों को विभिन्न स्थानों पर
विभिन्न कार्यों के लिये नियुक्त करता है .
२. अपान :- इसका स्थान नाभि से पाँव तक है , यह गुदा इन्द्रिय द्वारा मल व
वायु को उपस्थ ( मुत्रेन्द्रिय) द्वारा मूत्र व वीर्य को योनी द्वारा रज व गर्भ
का कार्य करता है .
३. समान :- इसका स्थान ह्रदय से नाभि तक बताया गया है . यह खाए हुए अन्न
को पचाने तथा पचे हुए अन्न से रस , रक्त आदि धातुओं को बनाने का कार्य करता है
.
४. उदान :- यह कण्ठ से सिर ( मस्तिष्क ) तक के अवयवों में रहेता है ,
शब्दों का उच्चारण , वमन ( उल्टी ) को निकालना आदि कार्यों के अतिरिक्त यह
अच्छे कर्म करने वाली जीवात्मा को अच्छे लोक ( उत्तम योनि ) में , बुरे
कर्म करने वाली जीवात्मा को बुरे लोक ( अर्थात सूअर , कुत्ते आदि की योनि )
में तथा जिस आत्मा ने पाप – पुण्य बराबर किए हों , उसे मनुष्य लोक ( मानव योनि
) में ले जाता है ।
५. व्यान :- यह सम्पूर्ण शरीर में रहेता है । ह्रदय से मुख्य १०१ नाड़ीयाँ
निकलती है , प्रत्येक नाड़ी की १००-१०० शाखाएँ है तथा प्रत्येक शाखा की भी
७२००० उपशाखाएँ है । इस प्रकार कुल ७२७२१०२०१ नाड़ी शाखा- उपशाखाओं में
यह रहता है । समस्त शरीर में रक्त-संचार , प्राण-संचार का कार्य यही करता है
तथा अन्य प्राणों को उनके कार्यों में सहयोग भी देता है ।
उपप्राण :-
१. नाग :- यह कण्ठ से मुख तक रहता है । उदगार (डकार ) , हिचकी आदि कर्म
इसी के द्वारा होते है ।
२. कूर्म :- इसका स्थान मुख्य रूप से नेत्र गोलक है , यह नेत्रा गोलकों में
रहता हुआ उन्हे दाएँ -बाएँ , ऊपर-नीचे घुमाने की तथा पलकों को खोलने बंद करने
की किया करता है । आँसू भी इसी के सहयोग से निकलते है ।
३. कूकल :- यह मुख से ह्रदय तक के स्थान में रहता है तथा जृम्भा ( जंभाई
=उबासी ) , भूख , प्यास आदि को उत्पन्न करने का कार्य करता है ।
४. देवदत्त :- यह नासिका से कण्ठ तक के स्थान में रहता है । इसका कार्य
छिंक , आलस्य , तन्द्रा , निद्रा आदि को लाने का है ।
५. धनज्जय :- यह सम्पूर्ण शरीर में व्यापक रहता है , इसका कार्य शरीर के
अवयवों को खिचें रखना , माँसपेशियों को सुंदर बनाना आदि है । शरीर में से
जीवात्मा के निकल जाने पर यह भी बाहर निकल जाता है , फलतः इस प्राण
के अभाव में शरीर फूल जाता है ।
जब शरीर विश्राम करता है , ज्ञानेन्द्रियाँ , कर्मेन्द्रियाँ स्थिर हो जाती है
, मन शांत हो जाता है । तब प्राण और जीवात्मा जागता है । प्राण के संयोग से
जीवन और प्राण के वियोग से मृत्यु होती है ।
जीव का अंन्तिम साथी प्राण है ।
प्राण के नाम,स्थान और कार्य–विवरण को संक्षिप्त जानकारी के लिए कृपया संलग्न
चित्र को देखे ।
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2> বিশ্বাসই বড়ো ধন
শ্রী শ্রী চন্ডি তে "মা " বার বার বলেছেন -
তিনি আমাদের অন্তরেই আছেন --তবু আমরা তা অনুভব করার চেষ্টা করিনা
শুধু তাঁকে নিজের মধ্যে স্বরণ করলে ,আমাদের যুদ্ধ আমাদের হয়ে তিনিই  লড়ে দেবেন একি কম আশ্বাস ?
কিন্তু এর জন্য চাই বিশ্বাস।
প্রবল বিশ্বাসই বড় ধন ,
প্রবল বিশ্বাসই অসম্ভব কে সম্ভব করতে পারে।
সকল বড় বড় কার্যের জনক বিশ্বাস।
তথাপি অসাবধানী তথা ক্ষণিকের জন্যও অবিশ্বাসি কে কেউই রক্ষা  করতে পারেনা। এমনকি কোনও দেবতার আশির্বাদও তাঁকে রক্ষা  করতে পারেনা। সেই কারণেই সদা সর্বদা সচেতন ও নিজের প্রতি নিজের বিশ্বাস বিশেষ প্রয়োজন। ক্ষণিকের অসাবধানী যে কোনো মুনি, ঋষি রও  তপস্যা ভঙ্গ করে দিতে পারে এবং তাঁকে গভীর অতল গওভরে নিক্ষেপ  করতে পারে।
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3> क्रोधाग्नि==क्रोध भी ज़रूरी, किन्तु समयसे।

क्रोध भी ज़रूरी, किन्तु समयसे।
: पितामह भीष्म के जीवन का
एक ही पाप था ,
कि उन्होंने समय पर क्रोध नहीं किया ।

और जटायु के जीवन का
एक ही पुण्य था,
कि उसने समय पर क्रोध किया ।
परिणामस्वरूप .....
एक को बाणों की शैय्या मिली,
और एक को प्रभु श्री राम की गोद ।

अतः क्रोध भी तब पुण्य बन जाता है,
जब " धर्म और मर्यादा"
के लिए किया जाए और,
" सहनशीलता " भी तब पाप बन जाती है,
जब धर्म और मर्यादा को बचा ना पाये ।

क्रोधाग्नि=
कैसे जन्म लेती है क्रोधाग्नि की ज्वाला
क्रोध, गुस्सा, आवेश, प्रज्जवलन जैसे शब्दों से आप क्या अनुमान लगाते हैं। ये बहुत साफ है कि ऐसे शब्द हमारे मन की उस अवस्था को बताते हैं, जहां हम आपा खो चुके होते हैं। हमारी बुद्धि-विवेक का ह्रास हो जाता है और हम मन के पूरी तरह नियंत्रण में आ जाते हैं। ऐसे में अक्सर आपा खो बैठने की हालत हो जाती है और अंतिम रूप से पश्चाताप के अलावे कुछ भी हाथ नहीं लगता है।
निश्चित रूप से यह एक दयनीय अवस्था होती है, जहां हम दूसरे को दुःख तो पहुंचाते ही हैं लेकिन इससे बुरी बात ये है कि इसमें अंतिम रूप से हमारा ही नुकसान होता है। व्यवहारिक जीवन में इससे बड़ा दुःख और कुछ नहीं हो सकता कि क्रोध की अवस्था में हम दूसरे को दुःख पहुंचाना चाहते हैं किंतु इसमें हमारा बहुत अधिक बिगड़ जाता है।

मानसिक संतुलन का इस तरह क्षरण कितना उचित है? भावावेश, भावातिरेक और मानसिक उद्देलन की अवस्थाएं खतरनाक होती हैं। अनियंत्रित तरीके से शरीर का रोम-रोम नकारात्मक रूप से प्रभावित होने के कारण निर्णय शक्ति खत्म हो जाती है। इस दशा में प्रायः गलत फ़ैसले हो जाते हैं, जो जीवन भर के लिए अभिशाप साबित होते हैं।
गहराई से देखा जाए तो क्रोध केवल भावातिरेक की स्थिति है। जब भी कोई डिमांड पूरी नहीं होती, अपेक्षा पर कोई खरा नहीं उतरता या फिर अहंकार को चोट पहुंचती है तब ऐसी अवस्था में क्रोध का जन्म होता है। ऊपरी तौर पर यह एक सहज-स्वाभाविक स्टेज मालूम होता है लेकिन हकीकत में ये सहजता से अलग बिल्कुल थोपी गई अवस्था है। क्रोध कभी भी सहज हो ही नहीं सकता वरन् ये अपेक्षाओं की प्रतिपूर्ति न होने का परिणाम होता है।
क्रोधाग्नि की ज्वाला भयंकरतम ज्वालाओं में शुमार है। इसका प्रभाव एकतरफा या एकपक्षीय न होकर बहुपक्षीय और बहुआयामी होता है। ये न सिर्फ कारक को नष्ट करने में सक्षम है बल्कि इसके आसपास जो भी होता है, उसे भी हानि पहुंचाने में सक्षम है। एक बार क्रोधाग्नि का शिकार बन जाने पर इससे बहुत कठिनाई से पिंड छूट पाता है।हमें इस तथ्य पर अवश्य चर्चा करनी चाहिए कि क्रोध का वास्तविक कारण क्या है तब कहीं जाकर इससे मुक्त होने की चर्चा सार्थक होगी।वस्तुतः सहज बोध को सबसे अधिक नुकसान वाह्य पर्यावरण से होता है।

●क्रोध पर विजय कैसे प्राप्त करें?

मनोविकारों पर विजय प्राप्त करने के लिए सबसे पहले उनके बारे में पूरी समझ का होना जरूरी है। बिना गहरी समझ के किसी भी दोष (विकार) पर सम्पूर्ण विजय प्राप्त करना सहज सम्भव नहीं होता। क्रोध विकार पर सम्पूर्ण विजय प्राप्त करने के लिए हमें यह जानना होगा कि क्रोध क्या है? क्रोध पर विजय पाना क्यों जरूरी है? क्रोध के आने के कारण क्या-क्या हैं। क्रोध से होने वाली हानियां क्या-क्या है,? क्रोध पर विजय प्राप्त करने के लिए उपाय क्या-क्या हैं?क्रोध क्या है?क्रोध और कुछ नहीं अपितु एक नकारात्मक भाव है। मानसिक पटल पर उभरी हुई किसी क्रिया की यह आक्रामक प्रतिक्रिया मात्र है। इस प्रतिक्रिया के कारण शरीर के समूचे स्नायविक तन्त्र (नर्वस सिस्टम) में आक्रामक भाव की तरंगें पैदा हो जाती हैं। यह प्रतिक्रिया अपने स्व के अस्तित्व की पूर्णतः विस्मृति की अवस्था में होती है। यह पूरी तरह बहिर्मुखी चेतना होती है। बहिर्मुखी वृत्ति ंिहंसात्मक होती है। बहिर्मुखी आत्म से अंहिसा की आशा नहीं की जा सकती। क्रोध प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हिंसा ही है। इस मानसिक अवस्था में आत्मा की बुद्धि किसी घटना, परिस्थिति, व्यक्ति या विचार से अत्यन्त सम्बन्द्ध हो जाती है। इसलिए बुद्धि की निर्णय शक्ति समाप्त हो जाती है। शरीर की सभी मुद्राऐं हिंसात्मक अर्थात् आक्रामक हो जाती हैं। मनोविज्ञान के अनुसार यह प्रतिक्रिया (क्रोध) अपनी तीव्रता या मंदता की अवस्था की हो सकती है।💐💐💐💐💐💐

●क्रोध से हानियां
क्रोध के प्रभाव से शरीर की अन्तःश्रावी प्रणाली पर बुरा असर पड़ता है। क्रोध से रोग प्रतिकारक शक्ति कम हो जाती है। हार्ट एटैक, सिर दर्द, कमर दर्द, मानसिक असन्तुलन जैसी अनेक प्रकार की बीमारियां पैदा हो जाती हैं। परिवार में कलह-क्लेश मारपीट होने से नारकीय वातावरण हो जाता है। सम्बन्ध विच्छेद हो जाते हैं। जीवन संघर्षों से भर जाता है। व्यक्ति का व्यक्तित्व (चरित्र) खराब हो जाता है। क्रोध से शारीरिक व मानसिक रूप से अनेक प्रकार की हानियां ही हानियां हैं।

●क्रोध के कारण
क्रोध के कारण क्या-क्या हो सकते हैं? जैसेः- जब कोई व्यक्ति इच्छा पूर्ति में बाधा डाले या असहयोग करे, तब होने वाली प्रतिक्रिया ही क्रोध का रूप होती है। यदि कोई व्यक्ति अधिक समय तक चिन्ताग्रस्त रहे, तब भी वह मानसिक रूप से विक्षिप्त हो जाता है। इस के कारण छोटी-छोटी बातों में क्रोध आता है। आहार का हमारे विचारों पर बहुत असर पड़ता है। जैसा आहार, वैसा विचार। तामसिक और राजसिक आहार का सेवन करने से शारीरिक रासायनों का सन्तुलन बिगड़ता है। हारमोन्स का प्रभाव असन्तुलित हो जाता है। इसका मस्तिश्क पर बुरा असर पड़ता है। प्रकृति के नेगेटिव ऊर्जा के प्रभाव के कारण विचार ज्यादा चलने लगते हैं। अनियंत्रित मानसिक स्थिति में क्रोध के शीघ्र आने की सम्भावनाएं बढ़ जाती है। नींद कुदरत का वरदान है। नींद से ऊर्जा के क्षय की पूर्ति होती है। अन्तःश्रावी ग्रन्थियों से निकलने वाले हारमोन्स संतुलित रहते हैं। शरीर की सभी कोशिकाएं तरोताजा हो जाती हैं। यदि अनुचित आहार, चिन्ता या अन्य किसी भी कारण से नींद गहरी नहीं होती है, तब कोशिकाएं ऊर्जा वान नहीं रहती। ऐसी स्थिति में भी क्रोध आने की सम्भावनाएं बढ़ जाती हैं। किसी भी ज्ञात या अज्ञात कारण से यदि शरीर से पित्त की वृद्धि हो जाती है, तब भी हारमोन्स असन्तुलित हो जाते हैं। यह राजसिक आहार के कारण भी हो सकता है। नेगेटिव दृष्टिकोण के कारण भी पित्त (एसिड) में वृद्धि हो सकती है। पित्त वृद्धि के कारण स्वभाव चिड़चिड़ा होने या क्रोध आने की सम्भावना बढ़ जाती है। अधिक समय से अस्वस्थ्य रहने से हाने वाली शारीरिक व मानसिक कमजोरी भी क्रोध आने का एक कारण बनती है। मैं ही ठीक हूं। मेरी बात ही ठीक है। यह अपनी बात मनवाने की मानसिकता क्रोध आने का कारण बनती है। जब हम दूसरों को जबरदस्ती कन्ट्रोल करना चाहते हैं। लेकिन कन्ट्रोल करने में असफल होते हैं तब क्रोध आने की सम्भावना रहती है। जब कोई झूठ बोलता है। इसने झूठ क्यों बोला? झूठ बोलने वाले पर गुस्सा आता है। झूठ को सहन नहीं कर सकने पर क्रोध आता है। न्याय न मिलने पर या अन्याय होने पर गुस्सा आता है। यदि व्यर्थ की टीका- टिप्पणी पसन्द नहीं है। कोई व्यर्थ ही टीका-टिप्पणी करता है, तब उस पर क्रोध आता है। कभी-कभी क्रोध ऐसे ही नहीं आता बल्कि हम पहले से ही अन्दर-अन्दर सोचकर प्रोग्रामिंग कर देते हैं। फलां आदमी ऐसे ऐसे कहेगा, तो मैं ऐसे ऐसे जवाब दूंगा। क्रोध पर विजय प्राप्त करने के लिए आध्यात्मिक और व्यवहारिक ज्ञान की बौद्धिक समझ के साथ साथ राजयोग के गहन अभ्यास का द्विआयामी पुरुषार्थ अनिवार्य है। आध्यात्मिक व व्यवहारिक बौद्धिक समझ:- इस विश्‍व नाटक में हर आत्मा का अपना अपना अविनाशी अभिनय है। वह अपना पार्ट ड्रामानुसार ठीक प्ले कर रही है। उसका सहयोग देना, न देना और अवरोध करना, वह इसमें भी स्वतन्त्र नहीं है। परतन्त्र परवश आत्मा के साथ क्रोध की प्रतिक्रिया का क्या औचित्य? स्वयं की शक्तियों को पहचान कर आत्मनिर्भरता में विश्‍वास करना चाहिए। अनावश्‍यक अपेक्षाओं को मन में नहीं पालना चाहिए। अपने चिन्तन को श्रेष्‍ठ बनायें। चिन्ता वे ही करतें है, जिनके जीवन में कोई परिस्थिति विशेष हो और जिन की गहरी समझ नहीं हो। आध्यात्मिक व्यक्तित्व की धनी आत्माएं कभी चिन्ता नहीं करती अपितु वे तो एकाग्र चिन्तन करती हैं। आध्यात्म के सैद्धान्तिक ज्ञान के मनन-मंथन से मानसिक विक्षिप्तता हो नहीं सकती। शरीर की आयु और कर्मयोगी जीवन की परि पक्वता के आधार पर नींद की आवश्‍यकता कम-ज्यादा होती है। आवश्‍यकता के अनुसार नींद का औसतन समय 5 से 6 घंटे हो सकता है। औसतन समय जो भी हो लेकिन एक बात का ध्यान रखना है कि नींद गहरी होनी चाहिए। इसके लिये काम और विश्राम (नींद) दोनों का सन्तुलन रखना चाहिए। शरीरिक या बौद्धिक कार्य की थकान के बाद गहरी नींद आ सकती है। नींद की जितनी गहराई बढ़ती है। उतनी ही लम्बाई घटती है। सामान्यतः एक कर्मयोगी को सात्विक आहार के सेवन के महत्व को समझ कर अपने आहार को सात्विक और सन्तुलित रखना चाहिए। ऐसे आहार का परित्याग कर देना चहिए जो रासायनिक प्रक्रिया के बाद तेजाब (ऐसिड) ज्यादा बनाता हो। आहार को सात्विक और सन्तुलित रख पित्त को बढ़ने नहीं देना चाहिए। दृष्टिकोण सदा पाॅजिटिव ही रखना चाहिए। अशुभ (नेगेटिव) शुभ का शत्रु न मानें। नेगेटिव तो पाॅजिटिव का अवरुद्ध है और कुछ नहीं। नकारात्कता, सकारात्मकाता की अनुपस्थिति है। समय प्रति समय अपनी शारीरिक जांच कराते रहना चाहिए। स्वयं की प्रकृति की पूरी समझ होना आवश्‍यक है। स्वयं को प्रकृति से अलग समझ प्रकृति के साथ सद्भाव सामंजस्य का भाव रखना चाहिए। व्यायाम आदि के द्वारा स्वयं को शारीरिक रूप से स्वस्थ रखना चाहिए। किसी एक ही बात को देखने समझने के अनेक दृष्टिकोण हो सकते हैं। किसी हद तक हर आदमी अपनी बात को ठीक समझ कर ही अपने दृष्टिकोण बनाता है। लेकिन यह जरूरी नहीं कि सभी दृष्टिकोण सदा ही ठीक या मान्य समझें जायें इसलिए दृश्टिकोण को ठीक ठहराने की जिद्द ना करते हुए स्वयं को शान्त रखना चाहिए। अपनी दृष्टि का कोण बदल समाधान की भाषा में सोचना चाहिए। यह याद रखना चाहिए कि झूठ के पैर नहीं होते। झूठ अधिक समय तक चल नहीं सकता। अन्तिम विजय सत्य की ही होती है। इस विश्‍व नाटक में अन्याय में भी कहीं ना कहीं न्याय छिपा होता है। वह दिखाई न देने पर भी कहीं न कहीं मौजूद रहता है। यह याद रखें कि ईश्‍वर के दरबार में देर हो सकती है लेकिन कभी अन्धेर नहीं होती। सांच को आंच नहीं के सिद्धांत पर अटल रहना चाहिए। किसी भी परिस्थिति में तुरन्त प्रतिक्रिया नहीं करने की आदत बना लेनी चाहिए। परिस्थिति विशेष में न कोई क्रिया और न प्रतिक्रिया की साक्षीपन की स्थिति के क्रोध आदि किसी भी मनोविकार पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। व्यवहार में आत्मीयता है, तो क्रोध की स्थिति ही पैदा नहीं होती। अपनेपन की भावना रख आपस में एक दूसरे को ठीक ठीक समझना चाहिए। अनुमान, शंका, संदेह से सदा दूर रहना चाहिए। पारस्परिक विचारों और भावनाओं का सम्प्रेशण सही समय पर सही व्यक्ति के साथ होना चाहिए। व्यर्थ और नकारात्मक भावनाओं को पनपनें ही नहीं देना चाहिए। किसी भी बात को ज्यादा गम्भीरता से नहीं लेना चाहिए। बातों को हल्के रूप से लेकर उनका निरा-करण करना चाहिए।राजयोग के अभ्यास द्वारा अपने चिन्तन को यथार्थ और सकारात्मक बनायें। स्वयं से स्वयं की बातें करनी चाहिए। मैं कौन हूं? मेरा यथार्थ परिचय क्या है? मैं किस स्थान पर हूं? मेरे कर्तव्य क्या-क्या हैं? मुझे करना क्या है? अपनी महानताओं और सम्भावनाओं को याद करना चाहिए। अन्तर्मुखी होकर अपनी आध्यात्म जगत की महानताओं के चित्रांकन द्वारा उन्हें यथार्थ रूप से महसूस करना चाहिए। आत्म केन्द्रित हो अपनी आत्म ज्योति को अपने मस्तक सिंहासक भृकुटि में देखने को अभ्यास करना। इस अभ्यास को प्रातः व सायं कम से कम 6 महीने तक करना चाहिए। परमात्म ज्योति को देखने और उसके साथ भावनात्मक रूप से (कम्बाइन्ड) एकाकार होने का अभ्यास करना। यह अभ्यास भी प्रातः व सायं कम से कम 6 महीने तक करना चाहिए। आत्मा के मूल गुण पवित्रता का चिन्तन और अनुभूति का लक्ष्य रखकर राजयोग का अभ्यास करना। बुद्धि रूपी नेत्र से देखना कि पवित्रता की सफेद किरणें मेरे सिर के ऊपर से उतर रही हैं और मैं आत्मा शीतलता का अनुभव कर रही/रहा हूं। कम से कम 6 महीने दिन में 4 बार अभ्यास करना चाहिए। इस प्रकार यथार्थ बौद्धिक समझ और राजयोग के विधि पूर्वक अभ्यास के द्वारा क्रोध पर सम्पूर्ण विजय सम्भव है।

●जानिए! कैसे डालें अपने क्रोध पर काबू

अगर आप कार चला रहे हैं और कोई गाड़ी आपको गलत साइड से ओवरटेक कर दे तो क्या आप गुस्से से तिलमिला जाते हैं? यदि घर पर आपके बच्चे या फिर आपका जीवन साथी सहयोग न करें तो क्या आपका पारा बढ़ जाता है। यदि दफ्तर में कोई अधीनस्थ कर्मचारी बिना बताए छुट्टी पर चला जाए तो क्या आपका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच जाता है।
क्रोध एक सामान्य और स्वस्थ भावना है, लेकिन इससे एक सकारात्मक तरीके से निपटना बहुत महत्वपूर्ण है। अनियंत्रित क्रोध आपके स्वास्थ्य और रिश्तों दोनों पर बुरा प्रभाव डाल सकता है। क्रोध शब्द आते ही माथे पर तनाव से उभर आने वाली लकीरें एकाएक दिमाग के पर्दे पर पदर्शित होने लगती हैं। ना तो क्रोध करने वाला और ना ही उसके सामने वाला इस अवस्था से प्रसन्न होता हैं। ये एक ऐसी अभिव्यक्ति है, जो कोई पसन्द नहीं करता लेकिन ऐसा हो जाता है। इसके नुक्सान से हम सब वाकिफ हैं और इसके प्रभाव से हम सब बचना चाहते हैं। क्रोध समस्या तब बनता है, जब अकारण हो और किसी पर अकारण ही निकले। ये एक चैन रिएक्शन की तरह पहले आप से फिर आपके पास के लोगों में परिवर्तित होता है।

जैसे कि पहले ही बताया गया है कि ये एक सामान्य प्रक्रिया है। मनोवैज्ञानिकों के विचार से क्रोध एक तरह से क्षुब्ध भावनायों का क्षय है। इस प्रकार से जो विचार अन्तः मन में दबे हुए हैं – वो क्रोध के जरिए बाहर निकल आते हैं। यदि क्रोध को लिया जाए तो क्रोध बौद्धिक विकास के लिए आवश्यक है। क्रोध एक उर्जा है और यदि यही उर्जा सही तरीके से उपयोग मे लाई जाए तो कठिन से कठिन कार्य भी सुगम हो जाता है। जैसे कि फ्लॉरेन्स नाइटिंगल को क्रोध था लेकिन वो क्रोध रोगों के लिए था, ना कि रोगियों के लिए। अतः उन्होंने उस क्रोध की उर्जा को रोगियों की सेवा में लगाकर अपना और समाज का विकास किया।

क्रोध की ऊर्जा को सही तरीके से सही जगह पर उपयोग करना ही इसका सदुपयोग है। कहना बहुत आसान है परंतु इस ऊर्जा का सही उपयोग करना भी आना चाहिए, जैसे हमारे मनोविज्ञान एवं धर्म ग्रंथों में विस्तार से बताया गया है। किसी भी क्रिया का ब्रह्माण्ड में सामंजस्य लाने के लिए ऊर्जा से संयोग ही योग है। इसी को योगी परमशक्ति से मिलन कहते हैं।
भगवद्गीता संसार में जीने के लिए सुगम पथ से मार्गदर्शन करने हेतु उत्तम ग्रंथ है। भगवद्गीता के अनुसार आसन, प्राणायाम जैसी क्रियाएं करने वाले को योगी नहीं कहा जा सकता। गीता के अनुसार, जब नियंत्रित किया हुआ शरीर, अपने आप में स्थित हो जाता है और सभी कामनाओं से दूर हो जाता है, तब ऐसे चित्त वाले व्यक्ति को युक्त कहा जाता है। योगी वही है, जिसका चित्त किसी भी कामना में नहीं लगता।

ऐसा तो है नहीं कि दुख ना आए- दुख शरीर के कष्ट से होता है और व्यथा मन के कष्ट से और क्रोध के ये ही दो कारण होते हैं। क्रोध की उत्पत्ति दुख अथवा व्यथा से होती है। जब किसी के मानस पटल पर कोई दुख हो या फिर कोई परेशानी हो तो क्रोध आना स्वाभाविक है। क्रोध का निर्माण आस पास की परिस्थितयों के कारण होता है। अब उन परिस्थितयों को बदला नहीं जा सकता और यदि बदला जा सके तो इसके लिए प्रयत्न करना होगा। इसलिए अध्यात्मिक साधनों का लक्ष्य शोक या रोग मिटाना नहीं है, अपितु ऐसी स्थिति प्राप्त कर लेना, जिसको बड़े से बड़े दुख भी विचलित ना कर पाए। इसलिए हमें अपने मन को ऐसा बनाना पड़ेगा, जिससे परेशानियों का प्रभाव मन पर ना पड़े। हम हमेशा प्रसन्न और निश्चिंत रह सकें। इस स्थिति को प्राप्त कर लेना ही योग है। चित्तवृत्ति के निरोध का यही परम परिणाम है कि वहां स्थित होने के बाद ज्ञानी दुख से विचलित नहीं होते और इस स्थिति से बड़ा लाभ दूसरा कुछ नहीं होता है।

इस अवस्था में स्थित होकर उस आत्यंतिक सुख का अनुभव करते हैं जो इंद्रगम्य नहीं है। केवल बुद्धि से उसे जाना जा सकता है, उसका अनुभव किया जा सकता है। इस प्रकार यह स्थिति केवल दुख की निवृत्ति रूप नहीं है। यदि आप क्रोध को काबू करना चाहते हैं तो अपने मन को सुदृढ़ बनाना पड़ेगा। उसके लिए अनेक मनोवैज्ञानिकों ने सरल उपाए दिए हैं, जिसे आप क्रम से ग्रहण कर सकते हैं।

सर्वप्रथम एक आदत अपना लें- बोलने से पहले सोचें, गुस्से में व्यक्ति हमेशा उन शब्दों को चुनेगा और बोलेगा, जो दूसरे को चुभे, परंतु ऐसा करते समय भूल जाता है कि जब क्रोध की अवस्था समाप्त हो जाती है तो ये चुभे हुए शब्द तीर की भांति सीने में गढ़ जाते हैं जो आगे दूसरे व्यक्ति में क्रोध का रोपण करते हैं। वो ही क्रोध फिर कभी ना कभी मौका पाकर अवश्य निकलता है। इसलिए इस चेन को रोकने के लिए आवश्यक है कि क्रोध में भी संयम बनाए रखें। कभी भी क्रोधित अवस्था में कोई भी बात ना करें। अपने विचार या क्रोध तब दर्शाएं, जब आप संयमित अवस्था में हों।

जब भी क्रोधित हों तो अपने क्रोध कि उर्जा को किसी शारीरिक व्यायाम या फिर शारीरिक कार्य द्वारा जैसे कि बागवानी कर के या फिर घर की सफाई कर के अथवा उस स्थान से हट कर किसी बाज़ार मे चहलकदमी कर ले जिस से ध्यान भी बटेगा और मन शांत भी हो जायेगा। कोई कोई तो कुछ देर बगीचे मे बैठ कर बच्चो को देख कर संयमित हो जाते हैं। यदि कुछ ना हो सके तो किसी ग्रंथ का पाठ करना आरंभ कर लेना चाहिए इससे उचित मार्गदर्शन का लाभ भी मिलेगा।

इस बीच में आप अपनी समस्या को पहचानें- इससे आपका क्रोध काफी हद तक संभल जाएगा। याद रखिये कि किसी भी समस्या को पहचान लेना आधी लड़ाई जीतने के बराबर होता है। जब आप समस्या को पहचान लेंगे तो स्वतः ही समाधान का कोई ना कोई रास्ता निकल आएगा। हमेशा इस बात को याद रखिये कि क्रोध किसी समस्या का समाधान नहीं अपितु क्रोध तो आग में घी का काम करता है।

●माफी एक शक्तिशाली उपकरण है।

यदि आप क्रोध और अन्य नकारात्मक भावनाओं को अपने विचारों में आने की अनुमति देते हैं, तो आप अपने आपको अपनी खुद की कड़वाहट या अन्याय की भावना द्वारा निगल सकते हैं। यदि आप किसी को माफ कर सकते हैं तो आप अपने लिए तो अच्छा करते ही हैं अपितु दूसरे व्यक्ति के लिए भी उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। हर कोई आप के अनुरूप ही व्यवहार करें – ऐसा तो हो नहीं सकता। हम अपने विचार के फ्रेम में दूसरे व्यक्तियों के स्वभाव को रखते हैं और जब वो फिट नहीं बैठता तो क्षुब्ध हो जाते हैं।
इस के अलावा किसी भी धार्मिक ग्रंथ से यदि अपनी समस्या का समाधान ढूँढे तो अवश्य मिलेगा। यदि आप ऊपर बताए गए मार्ग पर चलें तो अवश्य लाभ होगा। इसके साथ यदि आप सुबह उठकर शुद्ध मन से पद्मासाना या फिर सिद्धासन में बैठकर शांत मुद्रा में ध्यान लगाएं तो पाएंगे कि आपका जीवन के प्रति बड़ा ही सरल नज़रिया होता जा रहा है।

मंत्रों में बड़ी शक्ति होती है। क्रोध शांति का ये मंत्र आपको अवश्य लाभ प्रदान करेगा।

ओम शांते प्रशान्ते मॅम क्रोध पश् नीन स्वाहा

इस मंत्र को पढ़ने के बाद थोड़े से पानी में फूंक मारें – ऐसा २१ बार दोहराएं और फिर इस पानी को पी जाएं। आप पाएंगे कि धीरे धीरे आपका क्रोध शांत हो गया है।
इसके अलावा निम्नलिखित दो मंत्र हैं, जिन्हें आप अपनी सुविधा अनुसार उपयोग कर सकते हैं।

1. दैहिका दैविका भौतिका तापराम राजा नहीं कहू ब्यापा
2. भारत चरिता करी मांऊ तुलसईजे सादर सुनहिंसिया राम पड़ा प्रेमा आवासी होई भवा रासा बिराती
याद रखिए मंत्र भी तभी काम करेंगे, जब आप मन से इनको स्वीकार करेंगे और क्रोध शांति का प्रयास करेंगे।
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4>आज आपको गरीबी आने के कुछ कारण बताता हु ।

घर में गरीबी आने के कारण..

1=रसोई घर के पास में पेशाब करना ।
2=टुटी हूई कन्घी से कंगा करना ।
3=टूटा हुआ सामान उपयोग करना।
4= घर में कूडा-करकट रखना।
5=रिश्तेदारो से बदसुलूकी करना।
6=बांए पैर से पैंट पहनना।
7=सांध्या वेला मे सोना।
8=मेहमान आने पर नाराज होना।
9=आमदनी से ज्यादा खर्च करना।
10=दाँत से रोटी काट कर खाना।
11=चालीस दीन से ज्यादा बाल रखना
12=दांत से नाखून काटना।
13=खडे खडे पेशाब करना ।
14=औरतो का खडे खडे बाल बांधना।
15 =फटे हुए कपड़े पहनना ।
16=सुबह सूरज निकलने तक सोते रहना।
17=पेंड के नीचे पेशाब करना।
18=बैतूल खला में बाते करना।
19=उल्टा सोना।
20=श्यमशान भूमि में हसना ।
21=पीने का पानी रात में खुला रखना
22=रात में मागने वाले को कुछ ना देना
23=बुरे ख्याल लाना।
24=पवित्रता के बगैर धर्मग्रंथ पढना।
25=शौच करते वक्त बाते,करना।
26=हाथ धोए बगैर भोजन करना ।
27=अपनी औलाद को कोसना।
28=दरवाजे पर बैठना।
29=लहसुन प्याज के छीलके जलाना।
30=साधू फकीर को अपमानित करना या उस से रोटीया फिर और कोई चीज खरीदना।
31=फूक मार के दीपक बुझाना।
32=ईश्वर को धन्यवाद किए बगैर भोजन करना।
33=झूठी कसम खाना।
34=जूते चप्पल उल्टा देख करउसको सीधा नही करना।
35=हालात जनाबत मे हजामत करना।
36=मकड़ी का जाला घर में रखना।
37=रात को झाडू लगाना।
38=अन्धेरे में भोजन करना ।
39=घड़े में मुंह लगाकर पानी पीना।
40=धर्मग्रंथ न पढ़ना।
41=नदी , तालाब में शौच साफ करना और उसमें पेसाब करना ।
42=गाय , बैल को लात मारना ।
43=माँ-बाप का अपमान करना ।
44=किसी की गरीबी और लाचारी का मजाक उडाना ।
45=दाँत गंदे रखना और रोज स्नान न करना ।
46=बिना स्नान किये और संध्या के समय भोजन करना ।
47=पडोसियों का अपमान करना , गाली देना ।
48=मध्यरात्रि में भोजन करना ।
49=गंदे बिस्तर में सोना ।
50=वासना और क्रोध से भरे रहना ।
51= दूसरे को अपने से हीन समझना !।
शास्त्रों में है कि जो दूसरो का भला करता है । ईश्वर उसका भला करे
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5>उपाय जो आपके घर में लाएंगे सुख-समृद्धि

अगर आप जिंदगी में सुख-समृद्धि से परिपूर्ण हैं और फिर भी सब कुछ सही नही लग रहा, तो उसके लिए हम अभी आपको कुछ ऐसे वास्तु पे निर्भर करने वाले उपाय बता रहे हैं। जिनसे आपकी जिंदगी काफी हद तक बेहतर हो सकती है।
पानी की टंकी घर के ऊपर न रखें। यह मनोबल को कमजोर करती है।
घर की छत पर चौखट, अनावश्यक सामान, टीन-कबाड़ इत्यादि न रखें। इससे आकस्मिक परेशानियां आती हैं। छत को हमेशा साफ रखें।
आपके मकान के मेंन गेट पर गणेश जी या किसी इष्ट देवता की मूर्ति लगा लेवे । लेकिन इनका मुख अंदर की ओर रखें। इससे घर में सुख-समृद्धि की वृद्धि होती है।
अगर कभी सड़क पर चलते हुए पैसा मिल जाए तो उसे धोकर पूजा करे, कहते हे इससे धन में वृद्धि होती है।
आपका घर चौकोर या आयताकार हो, लंबाई-चौड़ाई समान हो अथवा चोड़ाई से लंबाई दोगुनी हो तो यह अति शुभ होता है। यदि ऐसा नहीं है तो इसे वास्तु दोष कहते हैं। इस दोष को दूर करने के लिए भवन के बाहर आग्नेय की ओर अनार का पौधा लगाना उचित होता है।
जरुरी बात, घर में कोई सी भी सफाई करने वाली वस्तु न तो खड़ी अवस्था में रखी जाएं और न ही यह सामने दिखाई दें। इससे नकारात्मक ऊर्जा पैदा होती है। इन्हें लिटाकर या बिछाकर ही रखें।
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6>आध्यात्मिक शिक्षा का महत्व

ऋषियों ने इसको शिक्षा का आधार माध्यम वर्णन किया है-
आध्यात्म में तीन प्रकार की शिक्षाएॅ हैं ।
1⃣ ईश्वर का विश्वास
ईश्वर की पूजा नहीं,ईश्वर का विश्वास ।
कयोकि ईश्वर की पूजा और विश्वास में जमीन-आसमान का फर्क है । डाकू भी पूजा करते हैं पर वे विश्वासी नहीं हैं वरन पूजा करते हैं ।
इसीलिए पुजारियों और ईश्वरविश्वासियों में भी वही फर्क होता है ।
ईश्वर के विश्वास की शिक्षा हमारे धर्मग्रंथों और वेदशास्त्रों में है ।

2⃣ दूसरी बात है अपनी अंतरात्मा के ऊपर मल,आवरण और विक्षेप की जो परतें जमा हो गई हैं,उन्हें साफ किया जाय ।
भीतर जो ब्रह्म का तेज है वह चमक पड़े मानो हम साक्षात् भगवान हैं ।
मनुष्य तो भगवान का नमूना है ।मनुष्य भगवान की कृति है ।
भगवान ने एक मूर्तिवान नमूना बनाया और वह है-------इंसान

3⃣ तीसरी शिक्षा आध्यात्म के ग्रंथों और धर्मग्रंथों में मनुष्य को उदार होना बताया गया है ।
मनुष्य का जन्म ही महान उद्देश्य के लिए होता है । स्वार्थी नहीं परमारथी होकर आत्मबोध का ज्ञान हो जाय तो उसका जीवन सफल हो जाय ।
आत्मबोध को ही ज्ञान का सार कहते हैं,अपने आप को जानना कहते हैं
अगर इन शिक्षाओं को मनुष्य जीवन में अमल कर ले तो सच्ची भक्ति ईश्वर की प्राप्त हो सकती है ।
मनुष्य का जीवन ईश्वर भक्ति में लीन होकर राममय वातावरण में समाहित हो सकता है ।
जिसके अंदर बाहर राम ही दिखाई देंगे ।

जैसा कि गोस्वामी जी ने लिखा है
सीय राममय सब जग जानी =//=करउॅ प्रनाम जोरि जुग पानी
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7> |||||| "ये ही सत्य हैं" |||||
Qus→ जीवन का उद्देश्य क्या है ?
Ans→ जीवन का उद्देश्य उसी चेतना को जानना है - जो जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है। उसे जानना ही मोक्ष है..!!
Qus→ जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त कौन है ?
Ans→ जिसने स्वयं को, उस आत्मा को जान लिया - वह जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है..!!
Qus→ संसार में दुःख क्यों है ?
Ans→ लालच, स्वार्थ और भय ही संसार के दुःख का मुख्य कारण हैं..!!
Qus→ ईश्वर ने दुःख की रचना क्यों की ?
Ans→ ईश्वर ने संसारकी रचना की और मनुष्य ने अपने विचार और कर्मों से दुःख और सुख की रचना की..!!
Qus→ क्या ईश्वर है ? कौन है वे ? क्या रुप है उनका ? क्या वह स्त्री है या पुरुष ?
Ans→ कारण के बिना कार्य नहीं। यह संसार उस कारण के अस्तित्व का प्रमाण है। तुम हो, इसलिए वे भी है - उस महान कारण को ही आध्यात्म में 'ईश्वर' कहा गया है। वह न स्त्री है और ना ही पुरुष..!!
Qus→ भाग्य क्या है ?
Ans→ हर क्रिया, हर कार्य का एक परिणाम है। परिणाम अच्छा भी हो सकता है, बुरा भी हो सकता है। यह परिणाम ही भाग्य है तथा आज का प्रयत्न ही कल का भाग्य है..!!
Qus→ इस जगत में सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है ?
Ans→ रोज़ हजारों-लाखों लोग मरते हैं और उसे सभी देखते भी हैं, फिर भी सभी को अनंत-काल तक जीते रहने की इच्छा होती है..इससे बड़ा आश्चर्य ओर क्या हो सकता है..!!
Qus→ किस चीज को गंवाकर मनुष्यधनी बनता है ?
Ans→ लोभ..!!
Qus→ कौन सा एकमात्र उपाय है जिससे जीवन सुखी हो जाता है?
Ans → अच्छा स्वभाव ही सुखी होने का उपाय है..!!
Qus → किस चीज़ के खो जानेपर दुःख नहीं होता ?
Ans → क्रोध..!!
Qus→ क्या चीज़ दुसरो को नहीं देनी चाहिए ?
Ans→ तकलीफें, धोखा..!!
Qus→ क्या चीज़ है, जो दूसरों से कभी भी नहीं लेनी चाहिए ?
Ans→ इज़्ज़त, किसी की हाय..!!
Qus→ ऐसी चीज़ जो जीवों से सब कुछ करवा सकती है?
Ans→ मज़बूरी..!!🌸
Qus→ दुनियां की अपराजित चीज़ ?
Ans→ सत्य..!!
Qus→ दुनियां में सबसे ज़्यादा बिकने वाली चीज़ ? Ans→ झूठ..!!💜
Qus→ करने लायक सुकून काकार्य ?
Ans→ परोपकार..!!🌸
Qus→ दुनियां की सबसे बुरी लत ?
Ans→ मोह..!!💝
Qus→ दुनियां का स्वर्णिम स्वप्न ?
Ans→ जिंदगी..!!🍀
Qus→ दुनियां की अपरिवर्तनशील चीज़ ?
Ans→ मौत..!!💜
Qus→ ऐसी चीज़ जो स्वयं के भी समझ ना आये ?
Ans→ अपनी मूर्खता..!!🌸
Qus→ दुनियां में कभी भी नष्ट/ नश्वर न होने वाली चीज़ ?
Ans→ आत्मा और ज्ञान..!!💝
Qus→ कभी न थमने वाली चीज़ ?
Ans→ समय..
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8>जीवन का लेखा जोखा........

एक गिलहरी रोज अपने काम पर समय से आती थी और अपना काम पूर्ण मेहनत तथा ईमानदारी से करती थी !

|गिलहरी जरुरत से ज्यादा काम कर के भी खूब खुश थी क्यों कि उसके मालिक .......
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जंगल के राजा शेर नें उसे दस बोरी अखरोट देने का वादा कर रक्खा था !
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गिलहरी काम करते करते थक जाती थी तो सोचती थी कि थोडी आराम कर लूँ ....
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वैसे ही उसे याद आता था :- कि शेर उसे दस बोरी अखरोट देगा - गिलहरी फिर काम पर लग जाती !
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गिलहरी जब दूसरे गिलहरीयों को खेलते - कूदते देखती थी तो उसकी भी ईच्छा होती थी कि मैं भी enjoy करूँ !
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पर उसे अखरोट याद आ जाता था !
और वो फिर काम पर लग जाती !
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शेर कभी - कभी उसे दूसरे शेर के पास भी काम करने के लिये भेज देता था !
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ऐसा नहीं कि शेर उसे अखरोट नहीं देना चाहता था , शेर बहुत ईमानदार था !
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ऐसे ही समय बीतता रहा....
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एक दिन ऐसा भी आया जब जंगल के
राजा शेर ने गिलहरी को दस बोरी अखरोट दे कर आजाद कर दिया !
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गिलहरी अखरोट के पास बैठ कर सोचने लगी कि:-
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अब अखरोट हमारे किस काम के ?
पूरी जिन्दगी काम करते - करते दाँत तो घिस गये, इसे खाऊँगी कैसे !
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यह कहानी आज जीवन की हकीकत बन चुकी है !
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इन्सान अपनी इच्छाओं का त्याग करता है, और पूरी जिन्दगी नौकरी में बिता देता है !
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58/60 वर्ष की उम्र जब वो रिटायर्ड होता है तो उसे उसका फन्ड मिलता है !
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तब तक जनरेसन बदल चुकी होती है, परिवार को चलाने वाला मुखिया बदल जाता है ।
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क्या नये मुखिया को इस बात का अन्दाजा लग पायेगा की इस फन्ड के लिये : -
कितनी इच्छायें मरी होगी ?
कितनी तकलीफें मिली होंगी ?
कितनें सपनें रहे होंगे ?
- - - - - - - - - - - - - - - - - - - - क्या फायदा ऐसे फन्ड का जिसे
पाने के लिये पूरी जिन्दगी लगाई जाय और उसका इस्तेमाल खुद न कर सके !
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"इस धरती पर कोई ऐसा अमीर अभी
तक पैदा नहीं हुआ जो बीते हुए समय
को खरीद सके ।
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*भविष्य की चिन्ता छोड़ो, भुत को कंधो पर मत लादो।
वर्तमान को भोंगे.......
*Enjoy the TODAY*

Accounting of life........
A squirrel on your daily work time was perfect and hard work and honesty were!
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Squirrel needs to work more than the well was happy because his owner.......
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King of the jungle lion in ten bori walnut promise of giving the whole country!
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Squirrel work was do tired but think that it can rest....
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Just remember it could be :- That Lion ten bori walnut - squirrel will then take on the job!
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Squirrel when other gilaharīyōṁ to play she was singing, he was also the mood that I will enjoy myself!
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It Nut was missing!
And then she goes to work!
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Lions sometimes it lion near work was sent!
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It does not befit the lion to not nut it was a very honest, Lion!
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There moving quickly at the same time....
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A day came when the jungle
Lion King has squirrel ten bori and nut free!
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Squirrel Nut Sat with herself :-
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Our Walnut now how work?
Full life - work, dentist wont tear it how khā'ūm̐gī!
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This is the story of life today has become a reality!
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Human sacrifice, their own desires, and fulfill the job in my life!
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58/60 years of age when he retired, he gets his phanḍa!
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So far have changed janarēsana, family-run leader gets changed.
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New head to measure will take this for phanḍa: -
How Icchāyēṁ Mari?
How got them?
Sapanēṁ Kitanēṁ.?
- - - - - - - - - - - - - - - - - - - - what benefits of which such phanḍa
Perfect for getting placed in my life and use it for yourself you will not be able to!
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" no one on this earth so rich right now
Not long been past that
To be able to buy.
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* worried for the future, the son fell to the mat. Lādō
The current bhōṅgē.......
*Enjoy the TODAY*

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